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Dadi bholi ji

दादी भोली – अनुभवगाथा

आपका लौकिक नाम ‘देवी’ था। बाबा ने आपको ‘अथक भव’ का वरदान दिया था और ‘भोली भण्डारी’ कह महिमा करते हुए मुरली में याद करते हैं। आप लौकिक में अनेक सितम सहन करती हुई बंधनों को तोड़ कर अपनी छोटी बच्ची मीरा सहित यज्ञ के प्रारंभ काल में करांची में समर्पित हुईं। पहले-पहले आप छोटे बच्चों की संभाल के निमित्त बनी और बाद में बाबा ने भण्डारे की पूरी ज़िम्मेवारी आपको सौंप दी जिस जिम्मेवारी को आपने अंतिम श्वास तक, सबको संतुष्ट करते हुए, सबकी दुआयें लेते हुए निभाया। आप 9 फरवरी, 2007 को भौतिक देह त्याग अव्यक्त वतनवासी बन गईं।

ब्र.कु.भूपाल भाई, भोली दादी के साथ के अनुभव इस प्रकार सुनाते हैं: मीठे-प्यारे यज्ञ में भोली दादी का बहुत बड़ा महत्व रहा। बाबा उन्हें प्यार से भोली भण्डारी कहते थे। दादी जानकी ने बताया था कि मैं और भोली दादी एक ही दिन समर्पित हुए। भोली दादी आदिरत्न थीं। बाबा ने उस आत्मा के गुणों को देखते हुए भण्डारे की इतनी बड़ी जिम्मेवारी दी। मुझे भी करीब 40 साल उनके साथ रहने का भाग्य प्राप्त हुआ।

आना सबसे पहले, जाना सबके बाद

विश्व किशोर दादा के अव्यक्त होने के एक-दो साल बाद हम भी यज्ञ में आए। बाहर के कारोबार में दादा चन्द्रहास तथा दादा आनन्द किशोर के साथ मैं तथा एक-दो भाई और भी रहते थे। मुझे भी विशेष सारी खरीदारी का, बाहर के कारोबार का चांस मिला। मेरा भोली दादी से बहुत कनेक्शन रहा। भोली दादी अमृतवेले भण्डारे में सबसे पहले आती थीं और सबके बाद में जाती थीं। उस आत्मा की इतनी बड़ी विशेषता रही जो बापदादा, दादियों की आज्ञा से भोजन बनाती और मर्यादापूर्वक भोग लगाने के बाद वो भोजन सबको मिलता।

बाबा ने सन्देशी को वापस भेजा

एक बार बाबा ने सन्देशी को वापिस भेजा कि बच्ची, भोली से पूछकर आओ, भोजन टेस्ट किया। दादी ने भोजन टेस्ट किया तो पाया कि नमक नहीं था। भोली ने बोला, बाबा, आपसे पहले मैं भोजन कैसे टेस्ट करूं? बाबा ने कहा, बच्ची, आपको बापदादा की छुट्टी है कि पहले टेस्ट करो, भोजन में कोई बात की कमी ना हो, कोई चीज़ डालना भूल ना गई हो। इतना बड़ा महत्व था उस आत्मा का जो बाबा से भी पहले भोजन टेस्ट कर फिर भोग लगाती थीं। यह भाग्य सबको नहीं था केवल निमित्त को था। इतना उत्तम भोजन दिल से, प्यार से बनाती थींं। यदि कोई उदास हो जाए, मूँझ जाए और कितना भी बड़ा महारथी उसे समझाए, भाषण करे तो उसका मन बड़ी मुश्किल से बदलता है लेकिन भोजन में इतनी शक्ति है कि यह आत्मा के विचारों को बदल देता है, आत्मा को शक्तिशाली बना देता है। ऐसे भोजन के निमित्त आत्मा को कितनी दुआएं मिली होंगी!

कभी ‘ना’ नहीं कहा

भोली दादी में यह विशेष गुण था कि कभी भी किसी को ‘ना’ नहीं कहा। कई बार हम देरी से आते थे, रात को 9 या 10 बज जाते थे। यदि किसी कारण से भोजन कम पड़ जाता, हम चारों तरफ चक्कर लगाते और दादी को बोलते, दादी भोजन तो है ही नहीं, तो दादी कहती, नहीं भाऊ, क्यों नहीं है, देखो बहुत है, आओ, आओ। फिर दादी यहाँ-वहाँ चक्कर लगाएगी, यह पतीला, वो पतीला खोलेगी, देखेगी, फिर बाईचांस नहीं है तो बड़े प्यार से, लाड से कहेगी, भाऊ मलाई से खा लो ना। उनकी बातों से ही पेट भर जाता था। भूख चली जाती थी, सन्तुष्टता आ जाती थी, ऐसा उनका जवाब होता था। बहुत बार का हमारा ऐसा अनुभव रहा है।

कभी नाराज़ होते नहीं देखा

दादी अपना भोजन बिना नमक का रखती थीं, छोटी डब्बी में। कभी किसी के लिए यदि कुछ भी ना हुआ तो उसी को छोंककर खिला देती थीं और स्वयं नमक से या किसी चीज़ से चुपचाप खा लेती थीं। किसी को कहती नहीं थीं। मैंने कभी उस आत्मा को नाराज़ होते नहीं देखा। सेवाधारी भाई सभी चले जाते थे, कोई नहीं रहता था फिर भी वो अकेली बैठी रहती थीं लास्ट घड़ी तक, सन्तुष्ट करती थीं। कोई भी कार्यक्रम हो, दादी-दीदियों से पूछकर बहुत तरीके से, बड़ी सफाई से सब कार्य करती थीं।

भोजन की कमी नहीं होने दी

उनके साथ एक बहन और थी सती भोली। देखो बाबा ने नाम भी भोली रखा। कोई बहुत पढ़ा-लिखा, होशियार, बुद्धिमान हो, ऐसा भी कामयाब नहीं होता ना। जिसका नाम भोली भण्डारी रखा, उसकी कितनी बड़ी महानता होगी। भोली थी मन और दिल से साफ। बुद्धिवाली नहीं, दिल वाली थीं। शुरू-शुरू में तीन कमरे का भण्डारा था, छोटा-सा। उस ज़माने में बरसात भी बहुत होती थी। महीना भर नहीं रुकती थी। लकड़ियाँ गीली हो ज़ाती थीं। रात को दो बज़े चूल्हे पर रखते थे, धीमे-धीमे रात की बची आग से सूखती थीं। तब जाकर वो थोड़ी-थोड़ी जलती थीं, उनसे भोजन बनता था। हैण्डपम्प चलाकर भण्डारे का पानी इकट्ठा करते थे। मधुबन में एक ही नल था जहाँ अब बर्तन धुलाई होते हैं। वहाँ से भोली दादी अपने लिए बाल्टी भरकर ले जाती थीं। कोई सेवाधारी नहीं। एक बार मैंने कहा, दादी, मैं ले जाता हूँ, बोली, नहीं। बाबा बोलते हैं, सेवा नहीं लेनी। वह खुद कितनी सेवा करती थीं! तो दादी को मैं देखता था, वहाँ से बाल्टी भरकर, पुराने बाबा के भवन में, छोटे-से कमरे में जहाँ रहती थीं, वहाँ ले जाती थीं। दादी का दिन भर का, पौना टाइम भण्डारे में गुज़रता था। जब भण्डारा काला हो जाता था, महीने, दो महीने बाद सफाई करते थे। ऐसे कम साधनों के समय में, दादी ने बहुत मीठा, प्यारा पार्ट बजाया।

मनइच्छित फल सबको मिलता

पहले-पहले हमारे पास बैलगाड़ी होती थीं। सामान तो बैलगाड़ी में जाता था और लोग पैदल जाते थे। धीरे-धीरे हमने किराए की गाड़ी लेना शुरू किया। सब्जियाँ नीचे से ऊपर जाती थीं। जब सब्जियाँ पहुँचती थीं, बड़े प्यार से चेक करती थीं, बनाती थीं। दादी ने कभी इस कारण अभाव नहीं होने दिया कि आज लकड़ी नहीं है, सेवाधारी नहीं है। कोई नहीं होता तो खुद ही लग जाती पर समय पर भोजन तैयार मिलता। पार्टियाँ भी आती-जाती थीं, सबको सन्तुष्ट करके भेजती थीं। मनः इच्छित फल सबको मिलता था। कभी तबीयत खराब हो जाती थीं, तो भी अपनी छोटी-सी पीढ़ी पर आके बैठ जाती थीं। हम कहते थे, दादी आपकी तबीयत खराब है, कहती थीं, नहीं, बाबा बैठा है। बुखार में भी बैठ जाती थीं। उस आत्मा ने खराब तबीयत में भी किसी से सेवा नहीं ली। मुझे उससे बहुत प्यार है क्योंकि लौकिक माँ ने तो 17-18 वर्ष पालना की पर भोली दादी ने तो 40 वर्ष पालना की। असली माँ तो हमारी यही भोली दादी थीं जिसने पाल-पोस कर इतना बड़ा किया। हमारा टाइम ऐसा ही होता था बाहर जाने का। देरी से आना, सवेरे-सवेरे जाना। जब सूचना होती थी तो भोजन अलग से रखती थीं, अच्छा भोजन देती थीं। पूछती थीं, भाऊ क्या ले जाओगे आज। दादा चन्द्रहास, दादा विश्व किशोर सबसे पूछकर, अच्छा बनाकर, प्रोग्राम प्रमाण देती थीं। उस समय सेन्टर तो थे नहीं, टिफिन में दो-तीन टाइम का भोजन भी ले जाना होता था। आज तो हर 50 कि.मी.पर सेन्टर हैं; पानी, भोजन सब मिलता है। उस समय नहीं होता था। विश्व किशोर दादा को भी हमने एक-दो बार देखा, पाली जाते थे, उनके पास किट थीं, भोली दादी उसमें चावल-दाल, नमक, मिर्च सब कुछ रख देती थीं और बताती थीं, यदि भोजन में लेट हो जाओ तो इसमें यह यह, ऐसे-ऐसे डालकर खिचड़ी बन जाएगी। बाद में दीदी ने वो किट हमें दिया।

एक दाना भी व्यर्थ नहीं

भोली दादी एक दाना भी व्यर्थ नहीं जाने देती थीं। रात की रोटी बचती थीं, सेलमानी बनाती थीं। बची हुई हर चीज़ को सम्भाल कर रखती थीं। भोली दादी, बाबा की आज्ञा प्रमाण पार्टियों को प्रोग्राम देती थीं भोजन बनाने का। मान लो दिल्ली की पार्टी को भोजन की सेवा मिली, वो अपने तरीके से और पसंद से भोजन बनाते थे पर दादी सबके भोजन को इस तरह सेट कर देती थीं कि दिल्ली वालों का बनाया भोजन महाराष्ट्र वालों को भी पसंद आए। अन्न का दाना भी कभी फेंका हो, मैंने कभी देखा नहीं।

दधीचि समान हड्डियाँ सेवा में लगाईं

दधीचि ऋषि मिसल अन्त तक सेवा की। जैसे बड़े-बड़े भाषण करने वालों को बाबा याद करता है, ऐसे भोली भण्डारी को भी बाबा मुरली में कितना याद करता है। शुरू में हम कम थे, काम बहुत करते थे। भोली दादी मुझे कहती थीं, भाऊ, मुझे दादी-दीदी ने कहा है, तीन बार आपको मक्खन खिलाना है। मैंने कहा, दादी, सबको तो छाछ भी नहीं मिलती पर मेरे को एक बार तो ज़रूर खिलाती थीं। ऐसी आत्माओं से हमें कितनी प्रेरणा लेनी चाहिए। समय बीतता जाता है। पुराने महारथी अपनी कर्मातीत अवस्था को पाते जा रहे हैं। हमें भी अपनी हड्डियाँ दधीचि समान सेवा में लगानी हैं।

भोली दादी के साथ भण्डारे में लगभग 38 वर्षों तक सेवारत रहे, ब्र.कु.सूर्य भाई, उनके साथ का अनुभव इस प्रकार सुनाते हैं: 

जहाँ शान्ति स्तंभ है, वहाँ बाबा के शरीर का अंतिम संस्कार करना था। बड़ा भावुक सीन था। बहुत सारी बहनों को कमरों में बंद कर दिया गया था। कारण आप समझ सकते हैं। कई बहनों के मन पर दूसरी तरह का इफेक्ट हो गया था, भोली दादी के मन पर भी हो गया था। अव्यक्त बापदादा आये सन्तरी दादी के तन में। सवेरे का समय था। भोली दादी को ट्रीटमेंट के लिए अहमदाबाद ले जाया जा रहा था। उन दिनों जो भी जाते थे, बाबा से छुट्टी लेते थे। भोली दादी को बाबा के सामने लाया गया। हिस्ट्री हॉल में तीन गद्दियां होती थीं। एक पर बाबा विराजते थे, एक पर मम्मा और यदि किसी बच्चे को बिठाना हो तो एक तीसरी भी थी। बाबा ने वो एक गद्दी अपनी गद्दी से मिला दी और भोली दादी को अपने समीप बिठाया। एक सुन्दर सीन था। बाबा ने भोली दादी के सिर, मुँह, हाथ, पैर पूरे शरीर पर अपना हाथ फिराया। फिर भोली दादी को कहा, बच्ची, माया नगरी में जाती हो? तुमको वहाँ नहीं जाना है, बाबा तुम्हारे लिए वतन से दवाई भेजेंगे। दादी बोली, नहीं बाबा, मैं नहीं जाऊँगी। बाबा की दृष्टि और प्यार पाकर वो ठीक हो गई, अहमदाबाद नहीं गई।

दादी अथक थीं 

जैसे इतिहास में काल होता है, बुद्ध का काल, शंकराचार्य का काल, ऐसे ही यज्ञ में भी एक मम्मा-बाबा का काल था। उसके बाद दीदी का काल, फिर दादी का, ऐसे ही भोली दादी का भी बहुत सुन्दर काल था। करांची से लेकर आबू तक उन्होंने यज्ञ की ज़बर्दस्त सेवा की। आबू में भोली दादी के सहयोगी के रूप में मैं और बल्लभ भाई दोनों छोटे थे, मैं 19 का था, वो 20 या 21 का रहा होगा। हम थक जाते थे। वो हमें कहती थीं, मैं बूढ़ी थकी नहीं और तुम जवान थक गए। हममें फिर वही उमंग आ जाता था। सवेरे से उनकी सेवा चालू हो जाती थी। पहली चाय वही बनाती थीं, अमृतवेले 3 बजे उठकर। किचन के अलग-अलग विभाग उन दिनों नहीं थे। एक ही जगह भोजन, दूध, टोली सब रहता था। भोली दादी में वो सब क्वालिटीज़ थीं जिनके आधार पर भगवान किसी को प्यार करता है। आप सब जानते हैं, क्या हैं वो क्वालिटीज़? सरलता, भोलापन, निर्मलता, सत्यता, तेरा-मेरा न हो, छल-कपट न हो। किसी ने कभी उनके मुख से नहीं सुना, ‘मैं इतना काम करती हूँ, मुझे यह चाहिए, मुझे भी स्टेज पर बिठाया जाये, मेरा भी सम्मान हो।’ बहुत सेवा करने के बाद भी जैसे उन्हें यह आभास ही नहीं था कि वो कुछ करतीं हैं। यह बहुत बड़ी क्वालिटी थी।

बहुत निर्मलचित्त थीं

दादी में सभी को संतुष्ट करने की एक नेचुरल प्रवृत्ति थी, जैसे उन्हें कुछ करना नहीं था। वो किसी को संतुष्ट ना करे तो उनको परेशानी हो जाती थी। इसलिए संतुष्ट करने में जीवन लगाया। जाग रही हैं, नींद छोड़ दी है, दिन में सोती नहीं थीं, कुर्सी पर ही थोड़ी बहुत सो लेती थीं, फिर काम-काज में लग जाती थीं। जब हम आये तो हमको सबने कहना शुरू किया कि भोली दादी को थोड़ा सुख तो दो, थोड़ी ड्यूटी तुम ले लो। फिर हमने और वल्लभ भाई ने चाय की ड्यूटी, टोली की, स्टोर की, सब्जियों आदि की संभालनी शुरू की। अब तो स्टोर में सामान खरीदा जाता है। पहले मातायें-भाई थोड़ी-थोड़ी चीज़ें लाया करते थे। एक किलो चाय, हल्दी, लाल मिर्च इस प्रकार की चीज़ें आती थीं। दूसरे-तीसरे दिन हम इन चीज़ों को सेट करते थे। दादी बिल्कुल निर्मलचित्त थीं। हर बात में हाँ जी। कभी-कभी हम भी कह देते थे, दादी आप हर बात में ही हाँ जी कह देती हो। कभी-कभी तो लगता था कि बाबा या दादी उसे कह दें कि यह तारा जो आसमान में दिख रहा है, तोड़ लाओ, सब्जी बना दो तो वो यह नहीं कहेगी, नहीं बाबा। वो यह नहीं कहती थीं, यह काम नहीं हो सकता। और हम जानते हैं, जब हम हाँ जी करते हैं तो बाबा अपनी शक्तियाँ हमें दे देता है। हाँ जी का परिणाम यह होता है कि भगवान का प्यार भी और शक्तियाँ भी हमारी तरफ खिंची चली आती हैं।

किसी से सेवा नहीं ली

एक बार भोली दादी ने कहा, ‘बाबा, मैं तो और सेवा करती नहीं हूँ ज्ञान देने की।’ बाबा ने कहा, ‘बच्ची, तुम निश्चिन्त रहो, सेवा के सब्जेक्ट में तुम्हारे 100 मार्क्स हैं, तुम्हें कुछ और करने की ज़रूरत नहीं।’ धारणायें भी ऐसी थी उनकी। दो शब्द उनके मुख पर सदा रहते थे, एक, किसी से सेवा नहीं लो और किसी को दुख नहीं दो। सेवा नहीं लो, यह अंत तक देखा गया। चन्द्रिका बहन (नर्स) सुना रही थीं, अहमदाबाद ले जाने का प्रोग्राम बना, एक-दो माता या भाई को सेवा के लिए तैयार कर रहे थे, इतने में विदाई हो गई। तो जैसे जाते हुए भी किसी की सेवा नहीं ली, बहुत अच्छा रिकॉर्ड है यह।

बाबा बहुत प्यार करते थे उनसे

देहत्याग के चार दिन पहले उनको किचन में बैठे देखकर (सो गई थी वो, मैंने जगाया नहीं), मैंने बाबा से बात की, बाबा कितना अच्छा हो, यह यहाँ बैठी-बैठी चली जाये, आप बुला लो, आपका इस आत्मा से बहुत प्यार है, इस आत्मा का आपसे बहुत प्यार है। जाना तो सबको है, पर बिना कष्ट दिए चली गई। इतना अच्छा पार्ट बजाया। हाँ जी के कारण सदा भण्डारे भरपूर रहे। साकार बाबा उनको बहुत प्यार करते थे। बाबा से मिलने जाती थी। किचन का विशेष कपड़ा पहनती थीं, वो मैला हो जाता था तो बाबा के कमरे के बाहर ही खड़ी होकर बाबा से कुछ पूछती थीं। बाबा कहते थे, क्यों बच्ची, बाहर ही खड़ी हो? अंदर आओ। कहती थीं, ‘बाबा, मेरा वस्त्र गंदा है।’ बाबा कहते थे, ‘नहीं, नहीं, आओ।’ जैसे माँ-बाप बैठे है, बच्चा मैला-कुचैला कैसा भी हो, जूतों समेत भी उठा लेते हैं तो बाबा भी तो मात-पिता हैं, कहते थे, ‘नहीं बच्ची, आगे आओ’ और वहीं बाबा उससे गले मिल लेते थे। हालाँकि उसके कपड़ों में किचन के धुएँ की बदबू (लकड़ी जलती थी ना) हो जाती थी पर बाबा भी बाप है, बहुत प्यार था उनसे। बाबा कम से कम तीन बार किचन में जाते थे। सवेरे छह बजे रूम से निकलते थे, 6.10 पर क्लास में होते थे, 6.15 पर मुरली शुरू हो जाती थी। दस मिनट बाबा के चक्कर लगाने के होते थे। बगीचे से होके किचन में जाके, ठीक 6.10 पर क्लास में पहुँच जाते थे। ऐसा टाइम था बाबा का कि लोग अपनी घड़ियाँ मिलाते थे, बाबा निकला है कमरे से, अवश्य छह ही बजे होंगे, एक-दो सेकंड आगे-पीछे नहीं। बाबा जब आते थे भण्डारे में, उसे देखते थे, बहुत काम करती थी। सभी बताते थे कि दादी बहुत सेवा करती है, सबको संतुष्ट करती है। किसी को बुरा नहीं बोलती है। दादी जी भी तीन-चार बार किचन में आती थीं। 

कमल जैसा चित्त, पानी पड़ा और बह गया 

एक छोटी कन्या थी जो भोली दादी से बहुत लड़ती थी। लड़कर एक घंटे में आई, बोली, भोली, मुझे कुट्टी (चूरमा) खिला दो। दादी ने कहा, हाँ, हाँ, क्यों नहीं। उसको स्पेशल बनाकर दिया। हमको बड़ा आश्चर्य लगा कि अब तो लड़कर गई थी, फिर आ गई और चूरमा माँग रही है देशी घी का, भोली दादी भी कितना प्यार से खिला रही है। मैंने कहा, दादी, ये रोज़ लड़ती है, फिर तुम इसे बना-बनाकर देती हो। कहती थीं, ‘बाबा के बच्चे हैं, कहाँ जायेंगे, दिल होगी तो यहीं तो खायेंगे ना।’ स्थिति हो तो ऐसी हो। चित्त की निर्मलता है ना यह। अच्छे-अच्छे योगियों के चित्त पर नहीं रहती ऐसी निर्मलता। उसका चित्त कमल फूल की तरह था, पानी पड़ा और बह गया। हम सब भगवान को प्यार करते हैं पर कुछ ऐसे हैं जिन्हें भगवान प्यार करता है, उनमें से एक थीं हमारी भोली दादी।

बच्चों ने किया है श्रृंगार

भोली दादी के अव्यक्त होने के बाद संदेश में था कि वह सजी हुई बैठी थी बाबा के पास और बाबा को कह रही थी, बाबा, यह क्या है, यह श्रृंगार उतारो, मुझे अच्छा नहीं लग रहा है। बाबा ने कहा, यह श्रृंगार बाबा ने नहीं किया है, ये जो नीचे बच्चे हैं ना, वो स्नेह, प्यार, भावनायें, दुआऐं दे रहे हैं। यह वो श्रृंगार है। फिर दिखाया कि बाबा उसे अपने बाजू में बिठा रहे थे तो बोली, नहीं बाबा, मैं आपकी आँखों के सामने बैठूंगी, यहाँ थोड़े मैं आपको देख सकूँगी। फिर बाबा उनको भोग खिलाने लगे तो कहा, नहीं बाबा, मैं पहले आपको खिलाऊँगी। बाबा ने कहा, नहीं बच्ची, अब तो आप बाबा के निमंत्रण पर आई हो यहाँ इसलिए बाबा आपको खिलायेंगे। फिर बाबा ने उनको खिलाया और उन्होंने बाबा को खिलाया। फिर बाबा ने कहा, ‘बच्ची, बहुत समय से सोचती थी ना कि बाबा, अपने साथ रख लो मुझे। अभी तो आप रहो यहाँ आराम से बाबा के पास।’ तो इतना अच्छा संदेश था दादी का। बहुत अच्छा पार्ट बजाया उस आत्मा ने।

हर्षित काका ने दादी के साथ का अनुभव इस प्रकार सुनाया:

दादी ने भण्डारे में सब कुछ करना सिखाया

जब भी मधुबन में प्रवेश करते हैं तो पहले बाबा के कमरे में और फिर भोली दादी के बैठने का जो स्थान है, वहाँ उनके चरणों में ना बैठे तब तक दिल को आराम नहीं मिलता था। हमारी 67 साल की उम है फिर भी भोली दादी के सामने ऐसे ही महसूस होता रहा जैसे कि मैं उसका छोटा बच्चा हूँ। हम तो खिचड़ी पकाना भी नहीं जानते थे। दादी ने ही हमें पिछले 35 वर्षों से, भोजन, टोली कैसे बनाना है, लकड़ी कैसे जलानी है, जले हुए कोयलों को कैसे धुलाई करना है, उनमें से काले-काले कोयलों को कैसे चुनना है, उनको अंगीठी में कैसे जलाना है, इन सब बातों के साथ-साथ यज्ञ के एक-एक कणे-दाने का महत्त्व सुनाया। शिव भोलेनाथ के यज्ञ के भण्डारे के एक-एक कण को बचाते हैं तो कणे का घणा होता है और कणे-कणे का हिसाब भी होता है। दादी ने हमें इकॉनामी का पाठ, सबको संतुष्ट करने का पाठ, अथक रहने का पाठ सिखाया। हम लोग दो-दो बजे उठते थे। वो सिखाती थी, कभी किसी को ना नहीं कहना। जब तक मधुबन में रहे, रात का बचा हुआ खाना, इतना भी फेंका नहीं। रात को 11 बजे भी खाना गर्म करते थे और सुबह उसे मिक्स करके परांठे बनाते थे। बची हुई रोटियों की सेलमानी बनाते थे। टोली संभालना, अचार बनाना सब समझाया। उनके ही आशीर्वाद से बीस हजार तक का भी भोजन बना लेते हैं। यदि समय आयेगा और पचास हजार का भी बनाना पड़ेगा तो हमारे मन में यह नहीं आयेगा कि यह कैसे होगा। यह सारी शिक्षा-समझानी हमारी भोली माँ ने हमें दी और उसके आशीर्वाद से इस उम्र में भी हम भोलेनाथ के भण्डारे में सेवा कर रहे हैं। भोली दादी के देहत्याग के बाद दादी जानकी ने मुझे बुलाया, बोली, हर्षित भाई, भोली गई। मैंने कहा, दादी, मुझे बड़ी खुशी हुई क्योंकि हमारी भोली दादी को बिल्कुल पसंद नहीं था कि उसकी नाक में नलियाँ पड़े। उसने बिल्कुल सेवा नहीं ली। ग्यारह बजे तकलीफ हुई, पाँच बजे ब्लीडिंग हुई, उसे अहमदाबाद ले जाना था, बोली, मुझे अहमदाबाद नहीं, मधुबन में ही रहना है। फिर आई.सी.यू. में ले गये और बाबा ने वतन में बुला लिया। हमारी भोली दादी 84 जन्म ब्रह्मा बाबा के साथ-साथ पार्ट बजायेगी और सर्वश्रेष्ठ पद प्राप्त करेगी। ऐसी हमारी शुभभावना और शुभकामना है। दादी भी वतन में बैठकर हमें देख रहीं हैं और हम बच्चों को दुआऐं दे रहीं हैं। उसकी दुआ, हमारे जन्म-जन्म के पाप काट देगी, ऐसा मेरा अनुभव है।

ज्ञान सरोवर के सुभाष भाई जो लगभग 20 वर्ष तक भोली दादी के साथ किचन में सेवारत रहे, अपने अनुभव इस प्रकार व्यक्त करते हैं –

जिसे कोई उपमा न दी जाये, उसका नाम है ‘माँ’ 

जिसकी कोई सीमा नहीं, उसका नाम है ‘माँ’ 

जिसके प्रेम को कभी पतझड़ स्पर्श न करे, 

उसका नाम है ‘माँ’ 

हे महान आत्माओ, प्रभु को पाने की पहली सीढ़ी है ‘माँ’ 

ऐसी थी भोली और अलौकिक भोली दादी मेरी ‘माँ’

प्यार व दुलार देती थीं दादी

जब भी वो भोली-सी सूरत याद आती है.. सारी यादें स्मृति-पटल पर जाग उठती हैं और आनंद विभोर कर देती हैं। वो महान विभूति कौन थीं? जिसका दिल सागर समान अपार था.. जिसमें प्यार ही प्यार छलकता था.. वो मेरी अलौकिक माँ.. भोली दादीजी थीं। मैं स्कूल की छुट्टियों में मधुबन आया, वह सन् 1983 के गुड़ी पड़वे का दिन था जिसे महाराष्ट्र में नये साल के रूप में मनाते हैं। कुछ दिन सेवा में रुकने का सौभाग्य मिला। मेरे बड़े भाई तुलसाराम जी ने मेरा परिचय भोली दादीजी से कराया। पहली मुलाकात में दादीजी ने हमें इतना प्यार दिया, वात्सल्य का हाथ सिर पर रख दिया, पीठ थपथपाई और मानो सदाकाल के लिए अपना बना लिया। जब भी हम वहाँ से गुज़रते, दादीज़ी को ओमशान्ति ज़रूर करते। दादी जी आते-जाते कुछ-न-कुछ छोटी-मोटी सेवा बता देती थी जिसे हम पलक झपकते ही बड़े ही उमंग-उत्साह से पूरा कर देते थे। भोली दादीजी की वो ड्रेस, कुर्ता-पाजामा और ऊपर से कलर वाला कास्टमवाला झब्बा बड़ा ही सुहाना लगता था।

‘हाँ जी’ का पाठ पक्का कराया

सेवा करते-करते दो मास पूरे हो गये और वापस जाने का समय आ गया। परमात्मा बाप पर निश्चय, मधुबन के प्यार, दादियों के प्यार और भोली दादीजी के असीम प्यार ने मुझे गद्‌गद कर दिया था। भारी कदमों से रोते-रोते मैंने और मेरे भाई ने यहाँ से विदाई ली.. लेकिन जो नशा चढ़ा वो घर में भी नहीं उतरा.. सेवा का फाउण्डेशन भोली दादी जी ने इतना मज़बूत कर दिया कि जैसे ही परीक्षा पूरी होती, मैं मधुबन में दादीजी के पास सेवा में हाजिर हो जाता। भोली दादीजी ने मुझे धीरे-धीरे ऑलराउण्डर बना दिया। अलग-अलग प्रकार की सेवायें कैसे करनी हैं, यह दादीजी खुद करके सिखाती थीं। दादीजी ने 3.30 बजे अमृतवेले से पहले कोयले की सेगड़ी जलाना, सफाई करना, मक्खन निकालना, भोजन खिलाना आदि सब सिखाया। कभी-कभी कोई कार्य मुझसे ठीक तरह से नहीं होता था तो दादी बार-बार समझाती व सिखाती थीं। मुझे याद है, उस दिन बड़ी दादीजी का क्लास था, मैं क्लास की ओर जा रहा था। उसी समय कुछ मेहमान आये, उनके लिए कुछ बनाना था। मैंने भोली दादीजी से कहा, मैं क्लास में जा रहा हूँ। भोली दादीजी ने अपने पास बिठाया और समझाया कि कभी भी सेवा में ना नहीं करना चाहिए, मम्मा कभी भी ना नहीं करती थीं, ना माना नास्तिक, ना माना नाक कट जाती है। कभी ना नहीं, ‘हाँ जी’ का पार्ट बजाना चाहिए। यह सुनाते-सुनाते भोली दादीजी का दिल भर आया, बाबा की बातें बताते समय उनकी आँखों में आँसू आ गये, मैं पिघल गया और सदा ‘हाँ जी’ का पार्ट बजाने का मन-ही-मन दृढ़ संकल्प कर लिया। यह मेरा पहला दृढ़ संकल्प था, जो दादीजी द्वारा कराया गया था। कौन-सी परिस्थिति में कौन-से काम को ज्यादा महत्त्व देना चाहिए, कौन-से काम की ज्यादा ज़रूरत है और पहले कौन-सा काम करना चाहिए यह हमें भोली दादीजी से सीखने को मिला।

मेरे लिए सिफारिश करी

मधुबन में, सन् 1986 का रक्षाबंधन का दिन था, राखी बंधवाकर घर वापस जाने का मेरा प्रोग्राम पक्का था, तैयारी भी कर ली थीं लेकिन क्या पता था कि वो रक्षाबंधन का दिन मेरे जीवन की सबसे बड़ी खुशी का दिन होने वाला था। प्यारी प्रकाशमणि दादीजी ‘ओमशान्ति भवन’ की स्टेज पर राखी बाँध रही थीं। जब मेरी बारी आई तो दादी जी ने पावरफुल दृष्टि देकर, अपने हाथ में मेरा हाथ लेकर जोर से दबाया और कहा, ‘आज से तुम्हें कहीं नहीं जाना है, मधुबन में ही रहना है।’ यह सुनकर, खुशी के मारे मानो मेरे पैर धरती पर नहीं थे, मैं उड़ रहा था। मेरी तमन्ना थी कि मैं समर्पित हो जाऊँ, वो बाबा ने पूरी की। वहाँ से मैं भोली दादी के पास कब पहुँचा, पता ही नहीं चला। भोली दादीजी के सामने अपनी बात कैसे व्यक्त करूँ, समझ में नहीं आ रहा था। आँखों से खुशी के आँसू बह रहे थे। भोली दादी ने मुझे अपने गले से लगाया, सिर पर, पीठ पर प्यार भरे हाथों से थपथपाया और कहा, तुम पास हो गये। बाद में मुझे पता चला कि अमृतवेले के बाद भोली दादीजी भोजन का प्रोग्राम लेने बड़ी दादीजी के पास गयी तभी मेरी सिफारिश की थी बच्चा अच्छा है, योगी है, हार्डवर्कर है, सभी लोग चाहते भी हैं और हमें भोजन परोसने के लिए इसकी आवश्यकता भी है। भोली दादीजी ने मेरी इतनी जोरदार सिफारिश कर दी जो बड़ी दादीजी ने हमें रक्षाबंधन के अवसर पर इतना बड़ा तोहफा दिया। भोली दादी सदा ही गुप्त रही, उसको कभी स्टेज की माया ने स्पर्श तक नहीं किया, न कोई भाषण, न कोई मान-शान की इच्छा, बस इतना कहती थीं- ‘बाबा देखता है, बाबा मेरे साथ रहता है।’ जो दादीजी ने कहा मानो बाबा ने कहा। बस बाबा का मंत्र ही है, कभी ‘ना’ नहीं कहना, ‘हाँ जी’ का पाठ सदा पक्का करना। 

दादियों ने बनायी कढ़ी

मधुबन में भोजन खिलाने की सेवा भूरी दादीजी के पास थी। जब कभी भोजन कम पड़ता था, हम तुरन्त भोली दादीजी के पास पहुँच जाते और वे कहती, जाओ रोटी बनाने वाले को बुलाओ, माताओं को बुलाओ, भोजन कम होता तो कहती, देवू भाई को बुलाओ। जब तक भोजन बने, भोली दादीजी अपने पास जो कुछ होता था, सब दे देती थीं। भोली दादीजी के मन में रहता था कि बाबा के भण्डारे से कोई भूखा न जाये। एक दिन की बात है… भोली दादीजी भण्डारे में सगड़ी पर कढ़ी बनवा रही थीं, मुझसे एक-एक सामान मंगवा रही थीं, क्योंकि दाल कम पड़ जाये तो कढ़ी बनाना सहज होता है। करीब दो बजे का समय था, उधर से बड़ी दादीजी, गुलजार दादीजी, जानकी दादीजी, ईशू दादीजी, मुन्नी बहन, मोहिनी बहन, लच्छू दादी सभी दादियों का झुण्ड किचन में आया। बड़ी दादीजी ने पूछा, भोली क्या बना रही हो? भोली दादीजी ने कहा, दाल कम पड़ गयी है इसलिए कढ़ी बना रहे हैं। फिर क्या था, बड़ी दादीजी ने अपने हाथ में कड़छी ली, कोई दादी नमक डाल रही है तो कोई कुछ माना सभी दादियों ने मिलकर कढ़ी बनायी। सभी दादियाँ इतनी खुश दिखाई दे रही थीं.. सचमुच, वो देखने जैसा दृश्य था। बड़ी दादीजी ने कहा, हाँ, भोली, हमारे लिए इस लड़के के हाथ कढ़ी भेजना.. उस अन्नपूर्णा की देगची से कितने लोगों ने कढ़ी खायी.. सभी जो भी उधर थे.. जिन्होंने खाना खा भी लिया था उन्होंने भी कढ़ी पी इसलिए कि दादियों ने कढ़ी बनायी है। दूसरे दिन यह बात ओमशान्ति भवन की क्लास में सबके सामने सुनायी गई।

सही समय सही निर्णय

एक दिन की बात है, दिन का भोजन लिफ्ट से चढ़ाना था और लिफ्ट खराब हो गयी थी। हम सब उसे ठीक करने की कोशिश में लगे हुए थे लेकिन वो ठीक नहीं हुई। अब 12 बजने में पाँच मिनट बाकी थे। मैं भोली दादीजी के पास हाँफते-दौड़ते पहुंचा और लिफ्ट की बात सुनाई। भोली दादीजी खड़ी हुई, मेरा हाथ पकड़ा और कहा, जाओ.. बड़ी दादी के पास, यह बात सुनाओ। मैं बड़ी दादी जी के ऑफिस की तरफ दौड़ा, उस समय दादीजी कोई पत्र पढ़ रही थीं। जैसे ही मैं गया, दादीजी ने पूछा, बोलो, क्या हुआ? मैंने कहा, दादीजी लिफ्ट खराब हो गयी है, भोजन डायनिंग में पहुँचा नहीं है। दादीजी तुरन्त उठकर खड़ी हुई, मेरे साथ भण्डारे में आई और वहाँ मौजूद सभी भाइयों को कहा, चलो.. चलो.. पाण्डव.. जाओ, नीचे किचन से भोजन ऊपर लाओ। दादीजी का कहना और करीब 25 पाण्डव किचन में दौड़े, एक साथ पाँच मिनट में भोजन ऊपर पहुँचा दिया तथा ठीक 12 बजे भोजन खिलाने की तैयारी हुई। तब भोली दादीजी ने बड़ी दादीजी को कहा, थैंक्स दादी। बड़ी दादीजी ने भोली दादीजी को, छोटे बच्चे को जैसे गले लगाते हैं, वैसे गले लगाया। वो दृश्य भी बड़ा ही प्यारा, रमणीक और देखने जैसा था। कोई भी बात होती थी या कोई भी काम होता था या कोई गलती होती थी या फिर घर जाने की छुट्टी लेनी होती थी, हम भोली दादी को ही कहते थे। भोली दादीजी बड़ी दादीजी से बात कर हमारा काम आसान कर देती थीं।

लौकिक माँ से चिट-चैट

मेरी लौकिक माँ जब भी मधुबन आती थीं अनाज की छोटी-छोटी गठड़ियाँ ले आती थीं। एक बार की बात है, जब माँ मधुबन आयी तो साथ में 10-12 गठड़ियाँ ले आयीं जिनमें दालें, चावल, गेहूँ, चीनी आदि थे। मैं माताजी को भोली दादीजी के पास ले गया, उन्होंने वो गठड़ियाँ भोली दादीजी को दी। दादी बहुत खुश हुई, मेरी लौकिक माँ को बहुत प्यार किया और कहा, देखो, बुढ़िया बाबा को कितना प्यार करती है। फिर भोली दादीजी ने मेरा हाथ पकड़ा और कहा, बैठो। अपने पास बिठाकर मुझे भी बहुत प्यार किया और माताजी को चिढ़ाने लगी, सुभाष मेरा है, मैंने उसे इतना बड़ा किया है, ऑलराउण्डर बनाया है। भोली दादीजी देखना चाहती थीं, लौकिक माँ का मेरे में कितना मोह है। माँ ने कहा, यह तो बाबा का है, बाबा की सेवा करेगा। यह सुनकर भोली दादीजी बहुत खुश हुई। तब लौकिक माँ ने कहा, अच्छा, इसे बाबा के घर से इतना प्यार और दुलार मिलता है इसलिए इसे लौकिक घर की कभी याद नहीं आयी।

दादी मक्खन खिलाती थींं

मुझे दादीजी ने मक्खन निकालना सिखाया। पहले तो हम चित्रों में श्रीकृष्ण को मक्खन खाते हुए देखा करते थे लेकिन भोली दादीजी ने मुझे दही मथकर मक्खन निकालना सिखाया। कभी-कभी मक्खन निकलता ही नहीं था, मैं बहुत परेशान हो जाता था क्योंकि बार-बार रस्सी खींचने से बाँहें बहुत दर्द करने लगती थीं। तब स्वयं भोली दादी मेरे साथ बैठकर बड़े प्यार से मक्खन निकालती थीं। मुझे मक्खन अच्छा नहीं लगता था क्योंकि मैं निकालता था तो खाने की इच्छा नहीं होती थी। एक दिन भोली दादीजी ने अपने पास बिठाकर एक कटोरी में मक्खन और चीनी का बूरा मिलाकर कहा, लो, यह खा लो। मैंने कहा, दादीजी, मुझे मक्खन अच्छा नहीं लगता। दादीजी ने कहा, तुम अभी बच्चे हो… तुम्हें तो पहलवान बनना है, तुम मक्खन खायेगा तो ताकत आयेगी तब तो बाबा के घर की सेवा करेगा। फिर मैंने धीरे-धीरे मक्खन खाना शुरू किया, कभी चीनी के साथ तो कभी रोटी के साथ। कभी-कभी मैं मक्खन खाना भूल भी जाता था तो दादीजी बुलाकर कहती, आज मक्खन नहीं खाया? ऐसे भूलना नहीं। नहीं तो कमजोर हो जाओगे।

सुप्रीम सर्जन बाबा

एक बार की बात है, भोली दादीजी बहुत बीमार हुई। यह सन् 1990 की बात होगी। दादीजी को डॉक्टर ने अहमदाबाद ले जाने के लिए कहा लेकिन भोली दादीजी मधुबन से दूर नहीं जाना चाहती थीं। उस समय अव्यक्त बापदादा आये हुए थे। भोली दादीजी को बापदादा से मिलाने लेकर गये। भोली दादी बापदादा से गले मिली और बाबा को कहा, बाबा, मुझे अहमदाबाद मत भेजो और दादी की आँखों से आँसू बहने लगे। बापदादा ने भोली दादीजी को बहुत प्यार किया, सिर पर हाथ फेरा और कहा, बच्ची, तुम्हें कहीं जाने की ज़रूरत नहीं। बाबा ने दादी के हाथ में टोली दी और कहा, इसे खा लो, ठीक हो जाओगी। और सचमुच दूसरे दिन सुबह दादीजी एकदम पहले जैसी ठीक हो गईं। सच बात तो यह थी कि भोली दादी का बापदादा से इतना प्यार और उनमें इतना विश्वास था कि स्वयं बाबा भी दिल के प्यार में बँधा हुआ था और टोली में इतनी शक्ति और प्यार भरा जो दादीजी एकदम ठीक हो गई क्योंकि बाबा तो सुप्रीम सर्जन है।

किसको क्या चाहिए, दादी जी सबका ध्यान रखती थीं

जल में निर्मलता, चंदन में शीतलता देखी, सागर में गंभीरता, पर्वत में अटलता देखी, हर एक में कोई न कोई खासियत होती है, किंतु ये सारी विशेषताएं हमने, प्यारी भोली दादी जी आपमें देखी। कौन शुगर का पेशेन्ट है, किसको किस चीज की परहेज़ है, किसको क्या अच्छा लगता है, कोई गेस्ट आया है तो उसे क्या भोजन देना है, इस प्रकार भोली दादीजी पूरा ध्यान रखती थीं। रास्ते का भोजन भी देती थीं। सबको पूछती थीं, भोजन किया… कुछ चाहिए? एक बार की बात है, एक पार्टी सुबह 6 बजे बस स्टैण्ड पर पहुंची क्योंकि बस 6 बजे की थीं। उस समय भोजन तैयार नहीं हुआ था। जब रास्ते का भोजन तैयार हुआ तो भोली दादीजी ने मुझे भोजन देकर एक साइकिल पर बस स्टैण्ड भेजा। वहाँ पहुँचा तो सभी लोग बस में बैठे चुके थे। मैंने कहा, भोली दादीजी ने रास्ते का भोजन भेजा है तो सब इतने खुश हुए कि उनकी आँखों से खुशी के आँसू बहने लगे और कहा, दादीजी को और बाबा को थैंक्स देना। अव्यक्त बापदादा ने एक मुरली में विशेष रूप से भोली दादीजी को याद किया। मुझे बहुत खुशी हुई। बाबा ने कहा, जैसे बड़ी दादियों से लोग मिलते हैं वैसे ही भोली दादीजी को भी मिलते हैं। उनकी सेवा की विशेषता के कारण दादियों के साथ-साथ भोली दादीजी का भी नाम आता है।

बिछुड़ने के दिन

देखते ही देखते, 10-12 वर्ष मधुबन व दादियो के संग, भोली दादीजी की छत्रछाया में यूँ ही बीत गये और अब समय आया बिछुड़ने का क्योंकि सालगाँव में ज़मीन ली थी और काम भी शुरू हो गया था। वहाँ सन् 1995 में जब किचन की नींव डालनी थी तब भोली दादीजी को साथ लाये थे। फिर किचन भी बनकर तैयार हो गया। मैं रोज़ ज्ञान सरोवर आता था और निर्माण कार्य की जो ज़रूरी बातें भोली दादीजी व सूर्यभाई बताते थे, वे हम इन्जीनियर को बता देते थे। जब किचन का उद्घाटन होने वाला था तब किचन, डायनिंग आदि सजकर मानो आलीशान महल लगने लगे। इस सुहावने समय में सभी किचन वालों ने खास रिक्वेस्ट भोली दादीजी से की कि आपको चलना ही है। सभी के आग्रह से भोली दादीजी भण्डारे में आई तो देखती ही रह गयी। वाह! कितना अच्छा बनाया, मैंने तो कभी सोचा ही नहीं था। ऐसे सुन्दर अवसर पर सभी महारथियों की उपस्थिति थी, सभी दादियाँ, बड़ी दादीजी की खुशी का ठिकाना नहीं था। सभी ने बहुत ही उमंग-उत्साह से किचन का उ‌द्घाटन किया, उसके बाद भोली दादीजी कभी ज्ञानसरोवर नहीं आयी। कई बार चलने के लिए कहने पर वो कहती थीं, बस, बाबा ने जहाँ बिठाया है, वहीं ठीक है। भोली दादीजी ज्ञान सरोवर को शालिग्राम कहती थीं। पहले तो सालगाँव उसके बाद शालिग्राम कहने लगी। कभी-कभी कहती थीं, मेरे अच्छे-अच्छे हैण्डस शालिग्राम ले गया है। क्योंकि सूर्य भाई के साथ कुछ किचन के पुराने भाई यहाँ की व्यवस्था संभालने के लिए आये थे, जो वहाँ जिम्मेवारी अच्छी सम्भालते थे। हम जब भी मधुबन जाते, भोली दादीजी को अवश्य मिलते। कभी भूल से या अन्य किसी कारण से नहीं मिल पाते तो मन खाता था। भोली दादी नहीं तो सती दादीजी से ही मिलकर आते थे। जब भी भोली दादी से मिलते, वे कुछ न कुछ ज्ञान सरोवर किचन के लिए देती थीं और कहती थीं, मेरा लुडना वापस लाना और याद रहने के लिए एक चिमटी लगाती। जब दादीजी के पास समय होता तो वो अपने पास बिठाती और किचन के बारे में सब बातें पूछती। जब उसका दिल भर आता तो पूछती, तुम्हारा मन वहाँ लगता है? तुम्हारा मन नहीं लगता तो मेरे पास आना। शुरू-शुरू में मेरा मन भी ज्ञान सरोवार में नहीं लगता था। बीच-बीच में मधुबन भाग जाता था। करीब दो साल तक मैं मधुबन में रात्रि सोने के लिए जाता था। अमृतवेला कर फिर सुबह वापस ज्ञान सरोवर आता था। लेकिन जैसे-जैसे सेवाओं का फोर्स बढ़ा, मधुबन जाने का समय ही नहीं मिल पाता था। काफी दिन के बाद जब मधुबन भोली दादीजी के पास डरते-डरते जाता तो भोली दादी मुझे झिड़ककर कहती, दूर जाओ, दूर जाओ, यहाँ तुम्हारा क्या है? यहाँ तुम्हारा कोई नहीं है और उसकी आँखों में पानी आता, वो देख मेरी आँखें भी भर जाती। फिर दादीजी अपने गले लगाती और प्यार से पीठ पर, गाल पर हल्के हाथों से थपथपाती, जैसे छोटे बच्चे को प्यार करते हैं। फिर कहती, तुम बहुत कठोर हो गये हो, तुम्हें संग तो अच्छा है ना? तुम मेरे पास नहीं, बाबा के कमरे में तो आया करो। ऐसी काफी रूहरिहान होती थी, फिर कुछ खिलाती थी, कुछ सेवा होती तो बताती थीं  फिर कुछ सब्जी आदि देकर भोजन कराकर ही भेजती थीं । सच, ऐसी माँ कहाँ मिलेगी? जिसका दिल सागर समान अपार हो।

भोली दादीजी की अन्तिम अवस्था

कुछ आँसू ऐसे होते हैं, जो बहाए नहीं जाते, 

कुछ नगमे ऐसे होते हैं, जो गाए नहीं जाते। 

कुछ दिन ऐसे होते हैं, जो भुलाए नहीं जाते।।

किसी ने सोचा भी नहीं होगा, इतनी महान आत्मा चलते-फिरते बाबा के पास इतना जल्दी जायेगी। कभी-कभी हमें भी संकल्प चलता था कि भोली दादीजी ने इतनी सेवा की है उनकी अन्तिम घड़ियाँ सुखद होनी चाहिएँ। उन्हें किसी प्रकार की तकलीफ ना हो। अचानक एक दिन भोली दादीजी की तबीयत ज्यादा खराब हुई। दादीजी को तुरन्त ग्लोबल हॉस्पिटल में भर्ती कराया गया। तबियत नाज़ुक थी लेकिन तुरन्त इलाज के कारण नॉर्मल हुई। मधुबन किचन के देवु भाई जब भोजन बनाकर एक बजे भोली दादी से मिलने गये तो दादीजी का दिल भर आया। देवु भाई का जोर से हाथ पकड़कर कहा, देवु.. मुझे अहमदाबाद नहीं जाना.. नहीं जाना.. नहीं जाना..। मानो भोली दादीजी को अपने अन्तिम समय का एहसास हुआ हो। फिर भी डॉक्टर लोगों ने मिलकर निश्चित किया कि कल सुबह दादीजी को लेकर अहमदाबाद जायेंगे। शाम तक दादीजी बिलकुल ठीक हुई, सभी को प्यार से मिलती, हाथ में हाथ मिलाती, किसी के गाल पर हाथ घुमाती, थैंक्स थैंक्स कहतीं…. देवु भाई ने दादीजी को प्यार से समझाया कि दादी जी, बस जाना और आना, अहमदाबाद में ज्यादा समय नहीं लगेगा। अन्दर से दादीजी का मन नहीं मान रहा था। शाम को 07.30 बजे भोली दादी जी को अहमदाबाद ले जाने के लिए एम्बुलेन्स में चढ़ाने की तैयारी हो गई। लेकिन दादीजी के दिल की पुकार थी कि मेरा शरीर यहीं छूट जाये, सो एम्बुलेन्स चलने के पहले दादीजी को उल्टी हुई। तुरन्त उन्हें उतारा गया और इस पावन धरा से पंछी उड़कर बाबा की गोद में समा गया। मानो दादीजी को पता ही नहीं चला कि वो शरीर छोड़कर सदा के लिए वतन में उड़ गई। कितनी बड़ी बात है! कई लोग शरीर के बन्धन से निकलने के लिए पुकारते हैं, बाबा बस करो, अब मुझे ले चलो और यहाँ भोली दादीजी चलते-फिरते, हंसते-खेलते, किसी की सेवा लेने से भी मुक्त मानो प्रकृति पर जीत पाकर बाबा के सच्चे सपूत बच्चे का सबूत देकर चली गई। आज भी मधुबन जाते हैं तो लगता है कि उस छोटी-सी गली में दादीजी उपस्थित है लेकिन सत्य तो सत्य है। वो प्यारी-प्यारी भोली दादीजी सदा के लिए बाबा की गोद में समा गईं।

मुख्यालय एवं नज़दीकी सेवाकेंद्र

अनुभवगाथा

Bk pushpal didi

भारत विभाजन के बाद ब्रह्माकुमारी ‘पुष्पाल बहनजी’ दिल्ली आ गईं। उन्होंने बताया कि हर दीपावली को बीमार हो जाती थीं। एक दिन उन्होंने भगवान को पत्र लिखा और इसके बाद आश्रम जाकर बाबा के दिव्य ज्ञान से प्रभावित हुईं। बाबा

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Dadi rukmani ji anubhavgatha 2

रुकमणी दादी, वडाला की ब्रह्माकुमारी, 1937 में साकार बाबा से मिलीं। करांची से हैदराबाद जाकर अलौकिक ज्ञान पाया और सुबह दो बजे उठकर योग तपस्या शुरू की। बाबा के गीत और मुरली से परम आनंद मिला। उन्होंने त्याग और तपस्या

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Bk satyavati didi anubhavgatha

तिनसुकिया, असम से ब्रह्माकुमारी ‘सत्यवती बहन जी’ लिखती हैं कि 1961 में मधुबन में पहली बार बाबा से मिलते ही उनका जीवन बदल गया। बाबा के शब्द “आ गयी मेरी मीठी, प्यारी बच्ची” ने सबकुछ बदल दिया। एक चोर का

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Bk brijmohan bhai ji anubhavgatha

भारत में प्रथा है कि पहली तनख्वाह लोग अपने गुरु को भेजते हैं। मैंने भी पहली तनख्वाह का ड्राफ्ट बनाकर रजिस्ट्री करवाकर बाबा को भेज दिया। बाबा ने वह ड्राफ्ट वापस भेज दिया और मुझे कहा, किसके कहने से भेजा?

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Bhau vishwakishore ji

बाबा के पक्के वारिस, सदा हाँ जी का पाठ पढ़ने वाले, आज्ञाकारी, वफादार, ईमानदार, बाबा के राइट हैण्ड तथा त्याग, तपस्या की प्रैक्टिकल मूरत थे। आप लौकिक में ब्रह्मा बाबा के लौकिक बड़े भाई के सुपुत्र थे लेकिन बाबा ने

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Dadi brijindra ji

आप बाबा की लौकिक पुत्रवधू थी। आपका लौकिक नाम राधिका था। पहले-पहले जब बाबा को साक्षात्कार हुए, शिवबाबा की प्रवेशता हुई तो वह सब दृश्य आपने अपनी आँखों से देखा। आप बड़ी रमणीकता से आँखों देखे वे सब दृश्य सुनाती

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Dadi allrounder ji

कुमारियों को दादी ऐसी पालना देती थी कि कोई अपनी लौकिक कुमारी को भी शायद ऐसी पालना ना दे पाए। दादी कहती थी, यह बाबा का यज्ञ है, बाबा ही पालना देने वाला है। जो पालना हमने बाबा से ली

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Bk pushpa mata ambala

अम्बाला कैंट से पुष्पा माता लिखती हैं कि 1959 में ज्ञान प्राप्त किया और चार बच्चों सहित परिवार को भी ज्ञान में ले आयी। महात्मा जी के कहने पर आबू से आयी सफ़ेद पोशधारी बहनों का आत्मा, परमात्मा का ज्ञान

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Bk jagdish bhai anubhavgatha

प्रेम का दर्द होता है। प्रभु-प्रेम की यह आग बुझाये न बुझे। यह प्रेम की आग सताने वाली याद होती है। जिसको यह प्रेम की आग लग जाती है, फिर यह नहीं बुझती। प्रभु-प्रेम की आग सारी दुनियावी इच्छाओं को

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Bk ramesh bhai ji anubhavgatha

हमने पिताश्री जी के जीवन में आलस्य या अन्य कोई भी विकार कभी नहीं देखे। उम्र में छोटा हो या बड़ा, सबके साथ वे ईश्वरीय प्रेम के आधार पर व्यवहार करते थे।इस विश्व विद्यालय के संचालन की बहुत भारी ज़िम्मेवारी

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Dadi sandeshi ji

दादी सन्देशी, जिन्हें बाबा ने ‘रमणीक मोहिनी’ और ‘बिंद्रबाला’ कहा, ने सन्देश लाने की अलौकिक सेवा की। उनकी विशेषता थी सादगी, स्नेह, और ईश्वर के प्रति अटूट निष्ठा। उन्होंने कोलकाता, पटना, और भुवनेश्वर में सेवा करते हुए अनेकों को प्रेरित

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Bk amirchand bhaiji

चण्डीगढ़ से ब्रह्माकुमार अमीर चन्द जी लिखते हैं कि उनकी पहली मुलाकात साकार बह्या बाबा से जून 1959 में पाण्डव भवन, मधुबन में हुई। करनाल में 1958 के अंत में ब्रह्माकुमारी विद्यालय से जुड़कर उन्होंने शिक्षा को अपनाया। बाबा का

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Bk raj didi nepal anubhavgatha

काठमाण्डु, नेपाल से ब्रह्माकुमारी “राज बहन” जी लिखती हैं कि उनका जन्म 1937 में एक धार्मिक परिवार में हुआ था। भौतिक सुख-सुविधाओं के बावजूद, उन्हें हमेशा प्रभु प्राप्ति की इच्छा रहती थी। 1960 में पंजाब के फगवाड़ा में, उन्हें ब्रह्माकुमारी

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Dadi gange ji

आपका अलौकिक नाम आत्मइन्द्रा दादी था। यज्ञ स्थापना के समय जब आप ज्ञान में आई तो बहुत कड़े बंधनों का सामना किया। लौकिक वालों ने आपको तालों में बंद रखा लेकिन एक प्रभु प्रीत में सब बंधनों को काटकर आप

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Dadi chandramani ji

आपको बाबा पंजाब की शेर कहते थे, आपकी भावनायें बहुत निश्छल थी। आप सदा गुणग्राही, निर्दोष वृत्ति वाली, सच्चे साफ दिल वाली निर्भय शेरनी थी। आपने पंजाब में सेवाओं की नींव डाली। आपकी पालना से अनेकानेक कुमारियाँ निकली जो पंजाब

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