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Dadi mithoo ji

दादी मिट्ठू – अनुभवगाथा

आप 14 वर्ष की आयु में माता-पिता सहित यज्ञ में समर्पित हुईं। आपको अव्यक्त नाम मिला ‘गुलजार मोहिनी’। आप यज्ञ स्थापना के समय पाँच चिड़ियाओं में एक थीं। आप हारमोनियम के साथ गाकर सभी को मुग्ध कर देती थीं। आप सभी प्रकार के कपड़ों की सिलाई में बहुत होशियार थीं तथा यज्ञ में स्टाफ नर्स होकर भी रहीं। आपको, आपकी भावनानुसार बाबा से भाई रूप का विशेष स्नेह मिला इसलिए बाबा आपको मिट्ठू बहन कहकर बुलाते थे। आपने लुधियाना, पटियाला में रहकर पंजाब, हरियाणा के कई स्थानों जैसे जींद, हिसार, सिरसा, डबवाली, तोशाम आदि में सेवाकेन्द्र खोले। आप बहुत ही इकानामी वाली, स्वच्छता पसंद, स्थूल- सूक्ष्म पालना देकर भरपूर करने वाली यज्ञ की आदिरत्न थीं। आपकी निर्णय शक्ति बहुत तेज़ थी। फैसला एक सेकंड में लेती थीं। आपने 3 मार्च 1983 में पुरानी देह का त्याग कर बापदादा की गोद ली।

जींद सेवाकेन्द्र की निमित्त संचालिका ब्र.कु. विजय बहन दादी जी के बारे में इस प्रकार सुनाती हैं:

सन् 1963 से 1975 तक दादी मिट्ठू के अंग-संग रहने का तथा सन् 1975 से सन् 1983 तक उनके कनेक्शन में सेवारत रहते हुए उनकी पालना लेने का मुझे सौभाग्य मिला। दादी 14 साल की आयु में ज्ञान में आईं। हारमोनियम बजाती थीं। गला बहुत सुन्दर था। लौकिक जीवन में भी हारमोनियम बजाकर गुरुद्वारे में जब गाती थीं तो सबकी आँखों में पानी आ जाता था। दादी, मम्मा के साथ भी गाती थीं। माता-पिता की इकलौती संतान थीं। माता-पिता तन-मन-धन सहित यज्ञ में समर्पित हो गये। पिताजी बाद में यज्ञ से चले गये थे। दादी स्टाफ नर्स होने के नाते होशियारी से सभी पेशेन्ट को संतुष्ट करती थीं। तन की भी नब्ज़ देख लेती तो मन की भी। बाबा के साथ लौकिक नाते से भी मेल-जोल था।

बाबा बन गए ‘भाई’

मिट्ठू दादी का जन्म उनके माता-पिता के 14 साल के इंतजार के बाद हुआ। सभी की आश थी कि बच्चा हो और मिट्ठू दादी का जन्म हुआ। जब वे यज्ञ में आईं तो उन्होंने बाबा को कहा कि बाबा, मुझे भाई नहीं है। बाबा ने उन्हें श्रीकृष्ण का साक्षात्कार कराया और कहा, मैं तुम्हारा भाई हूँ। बाबा ने उनकी भाई की आश पूरी की। इसके बाद बाबा ने सदा ही उन्हें मिट्ठू बहन कहकर संबोधित किया।

बाबा की रमणीक बात

जब हम लुधियाना में थे तो बाबा दादी से गर्म कपड़े मँगवाते थे, जुराब, मफलर, मंकी कैप आदि। एक बार दादी ने ऐसे बहुत-से कपड़े भेज दिए और बाबा को कहा, बाबा, मैंने सैम्पल भेज दिये, फैक्ट्री में जाकर देखा नहीं। तो बाबा ने कहा, बुरके वाली बीबी हो क्या, जो देखा नहीं। इस तरह बाबा ने दादी से बड़ी रमणीकता से बात की। दादी यज्ञ के अनेक प्रकार के कारोबार में आगे आती थीं। दादी योग में पावरफुल दृष्टि देती थीं, डेड साइलेन्स में ले जाती थीं। आत्मिक दृष्टि से देखने का अभ्यास पक्का था। दादी का त्याग तथा तपस्या बहुत थी। सादा जीवन था। दादी चन्द्रमणि, दादी मनोहर तथा दादी मिट्ठू पंजाब की सेवाओं में स्नेही सखियों के रूप में रहे।

छोटी-सी बात के माध्यम से शिक्षा दी

दादी जी में निर्भयता का विशेष गुण था। बहादुर दिल वाली थीं। पुरुषत्व के संस्कार थे, सभी भाई-बहनें उन्हें भाई जैसा मानते थे। निर्णय शक्ति, परखने की शक्ति उनमें बहुत ज्यादा थी। मैं तो छोटेपन में ही दादी जी के पास आ गई थी। उन्होंने हमें बचपन से ही माता-पिता जैसी पालना दी। उन दिनों सारा किचन का काम चूल्हे या अंगीठी द्वारा होता था तो दीदी ने मेरे से कहा कि चूल्हे को मिट्टी लगाओ। मैंने कहा, दादी जी, मैने तो कभी मिट्टी लगाई नहीं, तो दादी ने कहा, झाड़, त्रिमूर्ति क्या पहले समझाया था, समझने से सीख गई ना। इस प्रकार दादी ने छोटी-सी बात के माध्यम से शिक्षा दी कि हमें किसी सेवा में ना नहीं करना चाहिए। हर कार्य में कहना है, हाँ जी, आप सिखाओ तो हम ज़रूर करेंगे। इस तरह पालना देते आगे बढ़ाया। जब हम किसी को कोर्स कराते और बाद में जब भोजन पर बैठते तो दादी जी पूछते थे, आज आपसे क्या प्रश्न पूछे और आपने क्या उत्तर दिये। फिर अगर कोई ग़लती होती तो हमें समझाते थे कि किसी प्रश्न का कैसे उत्तर देना है।

मंथन करना सिखाया

इसी तरह मुरली की भी हर प्वाइंट पर मंथन करना सिखाया। एक-एक सिद्धांत को सिद्ध करने के लिए दो ग्रुप बना देते थे जैसे कि परमात्मा सर्वव्यापी नहीं है, यह सिद्ध करना है। एक ग्रुप कहता, सर्वव्यापी है। दूसरा कहता, नहीं है। इसके ऊपर मंथन करना सिखाते थे। इसी तरह अन्य प्रश्न जैसे कि गीता का भगवान कौन है तथा मनुष्य के 84 जन्म कैसे आदि पर मंथन करना सिखाया। साकार बाबा के जीवन के अनेक दिव्य अनुभव व यज्ञ की हिस्ट्री सुनाकर हमें मज़बूत करते रहते थे।

हिसार सेवाकेन्द्र की निमित्त संचालिका ब्र.कु.रमेश बहन दादी मिट्ठू के बारे में अपना अनुभव इस प्रकार सुनाती हैं:

सन् 1975 में मिट्ठू दादी से मेरा संपर्क हुआ। मैं चंडीगढ़ से मधुबन में आई थी। बड़ी दीदी मनमोहिनी ने मुझे मिट्ठू दादी के हवाले कर दिया। मिट्ठू दादी ने तीन-चार दिन पटियाला में रख मुझे हिसार सेवाकेन्द्र की ज़िम्मेवारी सौंप दी और सबसे पहले सेन्टर को सेट करने की कला सिखाई। यज्ञ की एक-एक वस्तु की संभाल, एक-एक भाई से स्नेह तथा आत्मिक दृष्टि से बात करना सिखाया। सर्व के प्रति कल्याण भावना रख, यज्ञ को बहुत ऊँची श्रेष्ठ नज़र से देखते हुए, इसे आगे बढ़ाने के लिए छोटी वस्तु को भी वेस्ट ना कर, बेस्ट रीति से प्रयोग करना सिखाया। दादी कहती थी, कितनी भी समस्यायें आयें, कभी हिम्मत नहीं हारना। बाबा को सामने रखते हुए अमृतवेले अपनी सारी बातें बाबा को बताना। बाबा अपने आप शक्ति और रहम की दृष्टि से रहमत बरसाता रहेगा। जब हिसार में मकान की नींव रखी तो कम खर्च बालानशीन बनने की विधि सिखाई। गरीबी में भी यज्ञ को महत्त्व देते हुए कभी घबराना नहीं, सफलता हर कदम में मिलेगी, यह सिखाया। उनकी विशेषताओं को धारण करते हुए आज हिसार में उनकी कृपादृष्टि से बहुत बड़ा सेवाकेन्द्र है। सभी प्रकार का सहयोग चारों तरफ से प्राप्त है। अभी भी सूक्ष्म में उनके स्नेह-सहयोग के वायब्रेशन आते हैं।

सिरसा स‌द्भावना भवन की निमित्त संचालिका व्र.कु.कृष्णा वहन (जिन्होंने सात वर्षों तक दादी के अंग-संग रहकर और कनेक्शन में सेवारत रहकर पालना ली), उनके बारे में अपने अनुभव इस प्रकार सुनाती हैं

सन् 1974 में हम ज्ञान में आये। सन् 1977 में सिरसा में मेला किया। शीला माता मेले की तैयारी की सारी ज़िम्मेवारी हमें देकर, किसी आवश्यक कार्य से लौकिक घर चले गये। तब दादी मिट्ठू मेले में आईं। हमने तब पहली बार उनको नज़दीक से देखा तथा उनके गुणों और शक्तियों का अनुभव किया।

प्रभु तुम बड़े दिल के…

एक बार बाबा-मम्मा पटियाला में आये थे। जब जाने लगे तो मिट्ठू दादी ने बाबा का हाथ पकड़ लिया। बाबा ने हाथ छुड़ाया तो दादी ने गीत गाया, ‘निर्बल मोहे जानके हाथ लियो छुड़ाए, जब जाओगे दिल से तब जानूँगी तोय।’ बाबा ने कहा, मिट्ठू बहन, बाबा को जाना है दिल्ली एक सप्ताह के लिए, मम्मा यहाँ रहेगी, सप्ताह बाद बाबा, मम्मा को ले जायेंगे। यह कहकर बाबा चले गये पर वहाँ जाकर बाबा ने, मम्मा को टेलीग्राम देकर बुला लिया। इस पर दादी ने एक रिकॉर्ड भरकर बाबा को भेजा। गीत के बोल इस प्रकार थे –

“प्रभु तुम बड़े दिल के कठोर निकले, 

चोरी-चोरी चल दिये बड़े चोर निकले। 

मैंने समझा था तुम बड़े दाता हो, 

दीन-दुखियों के भाग्य विधाता हो”।।

मुझे बंधनमुक्त किया

मैं बहुत बांधेली थी। बंधन तोड़ने के लिए बहुत प्यार से मार्गदर्शन देते थे। मेरे पिताजी ज्ञान के प्रति बहुत विरोध करते थे। दादी ने एक ब्रह्माकुमार भाई को, जो टीचर थे, पिताजी को ज्ञान समझाने के लिए गाँव में हमारे घर भेजा। उस द्वारा बताई गई बातों से दादी जी ने हमारे पिताजी की मनः स्थिति को अच्छे से समझा। बाद में हमारी माताजी दादी से मिले, कहा, कृष्णा का गंधर्वी विवाह सुभाष भाई (एक बांधेला कुमार) से हो जाए तो अच्छा है। मिट्ठू दादी ने कहा, कृष्णा मेरे साथ मधुबन चले, वहाँ दीदी मनमोहिनी से पूछेंगे। उन्होंने जब सारी बात बताई तो मनमोहिनी दीदी ने छुट्टी दे दी। फिर दादी ने भी छुट्टी दे दी। इस प्रकार हमारा गंधर्वी विवाह हुआ। इसके बाद भी दादी द्वारा कदम-कदम पर मार्गदर्शन मिलता रहा। उसी का प्रतिफल है कि बाबा की श्रीमत प्रमाण हम अब भी सफलतापूर्वक आगे बढ़ रहे हैं। गंधर्वी विवाह के तुरंत बाद मैं दादी के साथ पटियाला सेन्टर पर रहने लगी। इस प्रकार दादी मुझे बंधनमुक्त करने के निमित्त बनी।

नम्र और निरहंकारी

मिट्ठू दादी बहुत चुस्त थी, चाल बहुत तेज़ थी। सब जगह पैदल जाती थीं, रिक्शा नहीं करती थीं। दादी चलती थीं तो मुझे उनके साथ भागना पड़ता था। दादी जी पंजाब, हरियाणा के कई सेवाकेन्द्रों की संभाल के निमित्त थे। उनके साथ मैंने दो-तीन बार सब सेवाकेन्द्रों का टूर किया। वे हर कार्यक्रम में समय पर पहुँचते थे। इतने निरहंकारी थे जो छोटे-छोटे कार्यक्रमों में भी चले जाते थे। सिरसा के पास कूसर गाँव है। उन दिनों बस सुविधा बहुत कम थी। दादी उस गाँव में बैलगाड़ी में बैठकर चले गये। वे बहुत ही नम्र और निरहंकारी थे। दादी ने मेरे को भाषण करना सिखाया। दादी के लिए प्रसिद्ध था कि जो उनके साथ रह जाये, वो सब जगह रह सकता है। बीमारी के दौरान दादी मधुबन में तीन मास रहे। उन दिनों बाबा हफ्ते में एक बार आते थे। मैं दादी की सेवा में थी, उनकी ओर से बाबा के सामने जाती थी। बड़ी दीदी मुझे बाबा से मिलवाती थीं। बाबा मिट्ठू दादी के लिए स्पेशल टोली ‘अनार’ देते थे, कहते थे, बच्ची को खिला देना। बड़ी दीदी रोज़ उनके कमरे में उनसे मिलने, उनका हाल-चाल पूछने आती थीं।

बाबा ने कहा, ‘ड्रामा’

शरीर छोड़ने से सात दिन पहले दादी को मधुबन से पटियाला ले गये और वहाँ हॉस्पिटल में भर्ती कर दिया गया। मैं राजेन्द्रा हॉस्पिटल में दादी के साथ रहती थीं। दादी के शरीर छोड़ने के दो घंटे पहले डॉक्टरों ने जवाब दे दिया था और कहा था, इन्हें चंडीगढ़ ले जाइये। उन दिनों मेरा ध्यान का पार्ट था। मुझे दीदी ने ध्यान में जाकर बाबा से पूछने के लिए कहा। वतन में मैंने एक दृश्य देखा, एक बहुत बड़े पर्दे पर लिखा था, ‘ड्रामा’। इसका अर्थ था कि चंडीगढ़ नहीं ले जाना है। आश्रम ही ले जाना है। उसी अनुसार दादी को चंडीगढ़ नहीं ले जाया गया। थोड़ी देर बाद दादी ने शरीर छोड़ दिया। दादी के शरीर छोड़ने के बाद मुझ आत्मा को दादी का भोग लगाने की सेवा मिली। ध्यान में मुझे दादी ने संदेश दिया कि शव शोभायात्रा को पैदल ही ले जाना है। शव शोभायात्रा सारे शहर में पैदल ही घुमाई गई जिससे बहुत सेवा हुई।

जाने से पहले छुट्टी लेना चाहती थीं

शरीर छोड़ने के एक दिन पहले की बात है। दादी डायरी में कुछ लिखना चाहती थीं पर लिख नहीं पाई थीं। दादी के शरीर छोड़ने के बाद मुझे ध्यान में भेजा गया तो मैंने दादी से पूछा, आप क्या लिखना चाहते थे? वतन में भी दादी ने डायरी-पेन माँगा। मेरे हाथ में डायरी दे दी गई। दादी ने लिखा, ‘मैं दादी-दीदी को लैटर लिखना चाहती थी और यह बताना चाहती थी कि जो सेवा आपने मुझे दी थी उसे ज़िम्मेवारी से निभाकर जा रही हूँ, आगे का आप जानें।’ जैसेकि दादी जाने से पहले छुट्टी लेना चाहती थीं। उनको अपने जाने का पहले पता पड़ गया था।

जब दादी का तेरहवाँ हुआ तो पंजाब-हरियाणा के सब ब्रह्मावत्स पटियाला में एकत्रित हुए। दादी चंद्रमणि तथा अचल बहन भी आये थे। सब बहन-भाइयों ने कहा, हमको दादी मिट्ठू से मिलना है। मुझे ध्यान में भेजा गया, मेरे तन में दादी की आत्मा आई। जैसे ही प्रवेशता हुई (जैसा कि मुझे बताया गया), मेरे हाव- भाव बदल गये। दादी चंद्रमणि ने पूछा, आप इतना जल्दी क्यों चले गये? मिट्ठू दादी ने उत्तर दिया, अभी मेरा शरीर कोई काम का नहीं रहा था। दादी चंद्रमणि ने कहा, हमें भी ले चलो ना अपने साथ वतन में। दादी मिट्ठू ने कहा, नहीं, आप जैसे शेरों की यहाँ ज़रूरत है।

दादी के होते पटियाला में लोकल कुमारियाँ ज्ञान में नहीं थी। दादी की बड़ी इच्छा थी कि कुमारियाँ ज्ञान में आएँ। दादी के जाते ही कुमारियों ने आना शुरू कर दिया। ऐसा लगता है कि दादी के अव्यक्त आह्वान से ही ये कुमारियाँ आईं।

भाई तथा बहन के अनुभव:

सन् 1959 से सन् 1983 तक मिट्ठू दादी की पालना लेने वाले ब्रह्माकुमार भ्राता दिलवाग सिंह तथा ब्रह्माकुमारी सतवंत बहन, उनके साथ का अनुभव इस प्रकार सुनाते हैं:

हमें ईश्वरीय ज्ञान की प्राप्ति पटियाला (पंजाब) में सन् 1959 में मिट्ठू बहन के द्वारा हुई। ज्ञान मिलने के छह मास बाद ही हमें प्यारे बापदादा से साकार में मधुबन में जाकर मिलाने वाला पण्डा आदरणीया मिट्ठू बहन ही बनीं। हम उनके बहुत आभारी हैं जो उन्होंने हमें जगदम्बा माँ से और पिताश्री ब्रह्मा (शिवबाबा के भाग्यशाली रथ) से मुलाकात, उनके कमरों में जाकर करवाई। मम्मा और बाबा के साथ बिठा कर हमें भोजन भी खिलाया। वह कितना सुन्दर और भावना से भरपूर दृश्य था। बाबा हमारे मुख में गिट्टी देते थे और हमने भी प्यारे बाबा को गिट्टी खिलाई। एकदम आनन्द विभोर हो गये हम। हमें दिलवाड़ा मन्दिर और सनसेट प्वाइंट भी दादी खुद जाकर दिखलाकर लाये। यह अनुभव तो कभी भूलने वाला नहीं है। दादी के उपकारों को हम गिनती नहीं कर सकते हैं।

मिट्ठू बहन को ईश्वरीय सेवा का बहुत शौक था। यूँ कहें कि दिन-रात उनकी बुद्धि में सेवा ही घूमती थी। हमको सेवा के प्लैन बना कर देते थे। फिर हमसे प्रैक्टिकल करवाते थे। हर छुट्टी वाले दिन आसपास के किसी शहर में ले जाकर प्रोजेक्टर या प्रदर्शनी से सेवा करवाते थे। खुद भी चक्कर लगाने जाते थे। जींद, रोहतक, हिसार, सिरसा आदि शहरों में जो सेन्टर खुले, वे सब उनकी ही मेहनत का फल है।

मिट्ठू बहन जी भाई-बहनों की व्यक्तिगत पालना में भी बहुत रुचि लेते थे। उनकी चाहना होती थी कि बाबा का हर बच्चा निश्चयबुद्धि बन, निर्विघ्न रह ईश्वरीय सेवा में समय देकर भविष्य प्रालब्ध बनाये। इसके लिए वे सिंध और करांची में बाबा-मम्मा संग प्राप्त अनुभवों को सुनाकर हमारी अवस्था को ऊँचा उठाते थे।

मिट्ठू बहन की विशेषतायें:

  1. जैसे बाबा-मम्मा ने चौदह वर्ष उनकी पालना की, उसी प्रकार वे हमको पालना देते थे। यज्ञ में इकॉनामी करना जैसे बाबा ने उनको सिखाया था, वह उनके जीवन में स्पष्ट देखने में आता था। वस्त्रों को टांका लगाकर जब तक काम दे सकते थे, वे ज़रूर प्रयोग करते थे।
  2. हमको भाषण सिखाकर, अपने साथ संदली पर बिठाकर हमसे भाषण करवाते थे।
  3. मधुबन में जाकर हमें कहते थे कि बाबा से मिलना है इसलिए नहा-धोकर पाउडर-सेंट आदि लगाकर जायें यानि आपसे अच्छी सुगंध आये। जिसके पास नहीं होता था, उसे अपने पास से पाउडर-सेंट देते थे। वे कहते थे कि ब्रह्मा बाबा अपने गुरु के लिए लैट्रिन में भी अगरबत्ती जलाते थे इसलिए हमको भी ऐसे ही बापदादा से मिलना है।
  4. कभी खाना खाते समय उनके पास जाना होता था तो वे बाबा की तरह हमारे मुख में गिट्टी (माही) ज़रूर डालते थे।
  5. जब कभी हमें रिश्तेदारी में गाँवों में जाना होता था तो उनसे दृष्टि लेते थे। कभी भी मिश्री/ इलायची देना नहीं भूलते थे और मुख मीठा कराकर बोलते थे कि बाबा की सेवा पर जा रहे हो तो बाबा को नहीं भूलना और सभी को संदेश देकर आना।

लुधियाना के ब्रह्माकुमार खुशीराम साहनी जी, मिट्ठू दादी के साथ के अनुभव इस प्रकार सुनाते हैं:

लुधियाना में आध्यात्मिक केन्द्र खोलने के लिए मिट्ठू बहन का आगमन सन् 1963 में एक बहन और एक भाई के साथ हुआ। लुधियाना में दस साल आध्यात्मिक सेवायें देकर वे पटियाला का सेन्टर संभालने के लिए चली गई। उनके अंदर ज्ञान-योग की धारणा पुरानी ब्रह्माकुमारी बहनों की तरह बहुत दृढ़ तो थी ही, उनकी अन्य भी बहुत-सी विशेषताएँ इस प्रकार थी:

  1. जो कोई भी उनके संपर्क में आता, उसके ऊपर अपने रूहानी स्नेह की छाप ऐसी लगाती कि उसको अपना सहयोगी बना लेती थीं।
  2. उनके सामने अनेक समस्यायें आईं, जिज्ञासुओं की ओर से रूठने और टूटने की, मकान मालिक से मुकदमेबाजी की, धन के अभाव और शारीरिक बीमारियों की मगर उनका मन कभी डोला नहीं। उन्होंने दृढ़ता से इनका मुकाबला किया और विजय पाई। एक बार उनके घुटने पर सख्त चोट आई थी, वे कई दिनों तक चारपाई पर रहीं मगर फिर भी जैसे-तैसे करके क्लास में आती और थोड़ा समय योग कराती थीं।
  3. बहन-भाइयों का स्नेह मिलन और ब्रह्मा भोजन हर महीने अवश्य करती थी। इसके अलावा पिकनिक कराने, कई प्रकार के नये-नये खेल सिखलाने के लिए तथा मनोरंजन के लिए बाहर खुले स्थान पर ले जाती थीं।
  4. उनके चेहरे पर उदासी या मायूसी की रेखायें कभी दिखाई नहीं देती थीं। वे सदा हर्षित रहती, दूसरों को भी हर्ष दिलाती और अपना यह गुण उनमें भी भरती रहती थीं।
  5. उनके अंदर खाली न बैठने का एक विशेष गुण था। जब उनके सामने यज्ञ की कोई सेवा न होती तो वे युगलों के घर चली जाती, उनको खाना अपने हाथों से बनाकर खिलाती और उनको कई गुणों की धारणा अपने जीवन के उदाहरण से करवा देती थीं।
  6. उनके खुशनुमा चेहरे, स्वभाव और मिज़ाज के कारण कई बहन-भाई उनके आगे-पीछे रहते मगर वे कभी किसी से अपने शरीर के प्रति कोई सेवा नहीं लेती थी बल्कि अपने सब काम ब्रह्मा बाबा की तरह अपने हाथों से करती थी और साथ-साथ दूसरों को अपना सहयोग भी देती थीं।
  7. वे माँ-बाप की इकलौती बेटी थी। उनकी कोई दूसरी बहन या भाई न था, इसलिए वे सब बहन-भाइयों के साथ बहन जैसा ही बनकर उनसे प्यार करती और प्यार करने का सबक सिखलाती थीं।
  8. जब किसी दूसरे केन्द्र में कोई खास कार्यक्रम होता तो वहाँ वे बढ़-चढ़ कर सहयोग देती थी और अपने केन्द्र के बहन-भाइयों को साथ लेकर चलती थीं।
  9. किसी बहन-भाई की कमी कमजोरी देखकर उनके मुँह पर कभी कुछ न कहती और न ही किसी दूसरे को बताती इसलिए कि कमी की बात सुनकर दूसरे के अंदर भी वह न आ जाये। अप्रत्यक्ष रूप से वे कमी की तरफ ध्यान खिंचवाती। उनको मेरी एक गलती का जब पता चला तो मुझे उसका एहसास तो कराया मगर मायूस नहीं होने दिया और ही गले लगाकर ऊपर उठाया जिसके कारण मैं अब तक भी उन्हें भूल नहीं पाया।
  10. दस वर्षों तक लुधियाना में सेवा करने के बाद वे पटियाला और जींद आदि कई सेवाकेन्द्रों पर चली तो गई मगर लुधियाना के बहन-भाइयों से अपना संबंध बनाये रखने के लिए उन्होंने, जहाँ और जब भी कोई विशेष कार्यक्रम किया या कराया तो उनको बुलाकर उनसे सेवा कराती रहीं। इस प्रकार, अलौकिक संबंध कभी टूटने नहीं दिया।

 

मुख्यालय एवं नज़दीकी सेवाकेंद्र

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अनुभवगाथा

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