ब्रह्माकुमारीज़ नेविगेशन
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बी के सिस्टर एलिज़ाबेथ – अनुभवगाथा

ब्र.कु.एलिज़ाबेथ बहन का जन्म अफ्रीका के एक कृषक परिवार में हुआ। आपके माता-पिता कैथोलिक क्रिश्चियन थे। आपने मेडिकल लैबोरेटरी टेक्नोलॉजी की पढ़ाई की है। ज्ञान मिलने से पहले आप क्रिश्चियन नन थीं। सन् 1981 में ईश्वरीय विश्वविद्यालय के सम्पर्क में आयीं। फिर लौकिक नौकरी करते हुए सेवाकेन्द्र पर रहकर ईश्वरीय सेवा भी करती रहीं। वर्तमान समय आप सेवानिवृत्त हैं और अफ्रीका के नाकरू सेवाकेन्द्र पर पूर्ण रूप से ईश्वरीय सेवा में संलग्न हैं।

सन् 1951 में केन्या के एक छोटे से गाँव में मेरा जन्म हुआ। मेरे माता-पिता कैथोलिक क्रिश्चियन थे। पिताजी कृषक थे, माताजी गृहिणी थी। मुझे चार भाई थे और तीन बहनें थीं। बचपन से ही मेरा लक्ष्य था कि मैं चर्च में एक प्रीस्ट (प्रवादी) बनूँ। लेकिन बाद में पता पड़ा कि क्रिश्चियन धर्म में नारी प्रवादी नहीं बन सकतीं। जब मुझे सेकेण्डरी एजुकेशन पढ़ना था तो मेरे पिताजी ने मुझे एक कॉन्वेण्ट (महिला क्रिश्चियन मठ) में भर्ती कराया। जब मैं वहाँ गयी तो मुझे महसूस होने लगा कि यह स्थान मेरे लिए नहीं है। फिर भी मुझे उस स्थान पर बारह सालों तक रहकर नन बनने की पढ़ाई करनी पड़ी।

इसके बाद मैं कॉलेज में गयी मेडिकल लैबोरेटरी टेक्नोलॉजी की पढ़ाई करने के लिए। यह पढ़ाई पूरी होने के बाद फिर से मुझे उस कॉन्वेण्ट में जाना पड़ा। मुझे वहाँ रहने में असुविधा महसूस होती थी। वहाँ रहने का दिल नहीं होता था। बार-बार विचार आता था कि यह स्थान मेरे योग्य नहीं है। फिर मुझे उच्च शिक्षा प्राप्त करने के लिए नैरोबी शहर जाना पड़ा। वहाँ में गॉड से बात करती थी कि मुझे अपने जीवन को बदलना है, इस जीवन में कोई उन्नति नहीं हो रही है, मुझे आप रास्ता दिखाओ।

उन दिनों पूर्व की फिलासॉफी (Eastern Philosophy) से आकर्षित होकर मैंने हठयोग सीखा था और उसका अभ्यास भी करती थी। लेकिन उससे भी मुझे सन्तुष्टता नहीं मिल रही थी क्योंकि मुझे जो चाहिए था वो नहीं मिला था। बार-बार मैं परमात्मा से प्रार्थना करती थी कि मुझे योग्य रास्ता दिखाओ, मुझे कहाँ जाना है, बताओ। यह जीवन मेरे लायक नहीं है, इसमें मुझे अच्छा नहीं लग रहा है। इसके कुछ दिनों बाद,मुझे स्वप्न में सफ़ेद वस्त्रधारी बहनें दिखायी पड़ीं। उनको देख मैं बहुत आश्चर्य चकित हुई कि ये कौन हैं? सफ़ेद वस्त्र देखकर समझा कि ये नन्स हैं लेकिन ये तो अलग हैं, साड़ी और ब्लाऊज पहना है! ये कौन हैं, कहाँ रहती हैं यह सोचने लगी। फिर मैंने निश्चय किया कि इनके पास नहीं जाना है। ये कोई दूसरे धर्म वाली लगती हैं, जो मुझे पसन्द नहीं। दूसरी बार, जब मैं प्रेयर करने बैठी, वे बहनें फिर दिखायी पड़ीं। तीसरी बार,जब मैं कुछ आध्यात्मिक नोट्स पढ़ने बैठी, वे नज़र आयीं। मेरे साथ एक बहन थी सिस्टर जोन, उसने अपने कमरे में रेडियो ऑन किया था। उसमें एक विज्ञापन आया कि ब्रह्माकुमारीज़ राजयोग संस्था द्वारा “मन की शान्ति” विषय पर एक कॉन्फ्रेन्स होने वाली है। उसने आकर मुझे कहा कि चलो, ब्रह्माकुमारीज़ के पास चलते हैं। तुम शारीरिक योग करती हो ना, उनके पास मानसिक योग है।

उस सम्मेलन में दादी प्रकाशमणि जी ने भाग लिया था। हम दोनों वहाँ गयीं। यह थी सन् 1981 की बात। वहाँ जाकर मैंने देखा कि सब ब्रह्माकुमारियाँ भारतीय थीं। मैं रही कैथोलिक क्रिश्चियन, उनके साथ मेरा तालमेल कैसे होगा, यह सोचने लगी। मुझे याद आ गया कि ये लोग वही थे जो मेरे स्वप्न में आये थे। मुझे यह भी पक्का हो गया कि यही लोग भगवान का सच्चा रास्ता बतायेंगे। मन में संघर्ष चल रहा था। उस कॉन्फ्रेन्स में एक बिशप आये थे। कॉन्फ्रेन्स के बाद उनसे मिली और ब्रह्माकुमारियों के बारे में पूछा। तो उन्होंने कहा कि यह अच्छी संस्था है, आप इनसे सम्पर्क रख सकती हो। अगले दिन मैं दादी प्रकाशमणि जी से मिली। पहले दिन मुझे आत्मा के बारे में बताया गया, दूसरे दिन परमात्मा के बारे में बताया गया। मैं हॉस्टल जाकर उन लेसन्स को बाइबल में चेक करती थी। ब्रह्माकुमारी बहनों ने जो भी बताया था आत्मा, परमात्मा तथा चक्र के बारे में, वे सारी बातें मुझे बाइबल में मिलीं। फिर मैंने समझा कि ये लोग जो बताते हैं, वह सच है। बाकी रही खान-पान की बात। मैं तो हॉस्टल में रहती थी, वहाँ शाकाहार भी मिलता था। मैंने जाकर प्रिन्सीपल से कहा कि मुझे स्पेशल खाना चाहिए, तो मुझे रोज़ शाकाहारी भोजन मिलता रहा। इसलिए खान-पान में मुझे कोई दिक्कत नहीं हुई। लौकिक में मैं बहुत नाजुक थी। ज्ञान मिलने के बाद मेरे में बहुत बदलाव आया। मेरी सहपाठी भी कहती थी कि तुम बहुत बदल गयी हो।

नन्स हॉस्टल में रहते मुझे 12 साल हो गये थे। बारह सालों के बाद मैं घर गयी। पिताजी ने मेरे कॉलेज की पढ़ाई पूरी करने की खुशी में एक समारोह का आयोजन किया। उसमें बकरे के माँस का भोजन बनाया गया था। सब रिश्तेदार तथा मित्रों को बुलाया गया। उनके साथ मुझे भी भोजन करने बुलाया गया। मैंने कहा, मैं यह भोजन नहीं करूँगी, मुझे कुछ प्रॉब्लम है। आये हुए मेहमानों में से किसी एक ने कहा कि पहले क्यों नहीं बताया! मैंने कहा कि यह मेरे परिवार की निजी बात है। फिर वे कहने लगे कि तुमने अपने धर्म को छोड़ दिया है, हिन्दू धर्म को अपनाया है। मैंने कहा कि मैंने तो अपना धर्म छोड़ा ही नहीं है और मैं हिन्दू नहीं हूँ। आप कैसे कहते हो कि मैंने हिन्दू धर्म अपनाया है? उन्होंने कहा, तुम माँसाहार नहीं खाती हो तो हिन्दू धर्म स्वीकारा है ना! मैंने कहा, हाँ, माँस नहीं खाती लेकिन मैं हिन्दू नहीं हूँ। उन्होंने कहा कि अगर तुम हिन्दू नहीं हो तो माँस खाकर के सिद्ध करो कि तुम हिन्दू नहीं हो।

तब मेरे लिए तो एक बाबा ही था। मैंने बाबा से कहा कि बाबा, अभी आप ही मुझे मदद करो, मैं क्या करूँ इस परिस्थिति में! मेहमानों को खुश करने के लिए एक टुकड़ा हाथ में लिया और मुँह में डाला और पानी पीने के बहाने से उस टुकड़े को एक कपड़े में छिपाकर रख दिया। सब खुश हो गये। मुझे वहाँ से मुक्ति मिल गयी। फिर रिश्तेदारों ने कहा कि अगले रविवार हम एक बैठक करेंगे, उसमें आप हमें यह बतायेंगी कि आपने कॉन्वेंट क्यों छोड़ा। इसके बहाने से वे मेरी शादी पक्की करना चाहते थे। मुझे अन्दर से प्रेरणा आ रही थी कि यह तुम्हारे रहने का स्थान नहीं है। यहाँ से निकल जाओ।

फिर मैंने अपने भाई को पत्र लिखा कि मैं घर में रहना नहीं चाहती हूँ, मैं ब्रह्माकुमारी सेन्टर पर रहना चाहती हूँ। अगले दिन मैं घर से निकली और टैक्सी लेकर नैरोबी चली गई कि वे मीटिंग के लिए बुलाते रहेंगे तो मैं वापस नहीं आऊँगी। रास्ते में चलते-चलते मैंने बाबा से कहा, बाबा,मैं तो आपकी शरण में आ रही हूँ, जो भी होगा, आप ही संभाल लीजिये। कैसे भी करके मैं सेन्टर पहुंच गयी।

मुझे देख वेदान्ती बहन आश्चर्यचकित हो गयी। उन्होंने मेरा स्वागत किया और मुझे सफ़ेद ड्रेस दी, नन्स की ड्रेस निकाल कर मैंने सफ़ेद ड्रेस पहनी। वेदान्ती बहन ने कहा कि आप बिना बताये आयी हो तो वे आपको फॉलो करेंगे इसलिए उनको एक सन्देश दे दो कि मैं यहाँ हूँ। मैंने कहा, आप चिन्ता मत कीजिये। हमारे समुदाय में अगर कोई घर से भाग जाते हैं तो उनको ढूँढ़ने की कोशिश नहीं की जाती। एक बार वे घर से निकल जाते हैं तो उनको दोबारा घर में आने नहीं देते। फिर वेदान्ती बहन ने मुझे अन्य बहनों के साथ सेन्टर पर रखा। मुझे इंडियन बहनों के साथ वहाँ रहने में कोई मुश्किल नहीं हुई।

नैरोबी में, हम सब बहनें दो बजे उठकर अमृतवेले योग करती थी। अमृतवेले का योग बहुत पॉवरफुल होता था। सच में, मुझे नैरोबी की ब्राह्मण फैमिली ने बहुत सहयोग दिया। मुझे प्यार तथा पालना देकर ईश्वरीय मार्ग में आगे बढ़ने के लिए बहुत ही मदद दी।

कुछ साल बाद, मैं एक बार लौकिक घर गयी। मेरे पिताजी मेरे से खुश नहीं थे। फिर पिताजी ने रिश्तेदारों की मीटिंग बुलायी। उस मीटिंग में मेरा भाई भी आया था। वह हमेशा मेरा समर्थक रहा। उस मीटिंग में मैंने कहा कि मैं तो एक आत्मा हूँ, मैं गॉड की तथा जनता की सेवा करना चाहती हूँ इसलिए मुझे शादी नहीं करनी है। उस बार मैं वहाँ से चली आयी, उसके बाद फिर एक बार गयी तो उस समय भी उन्होंने बैठक बुलायी। मैंने पिताजी से कहा कि अगर आप इस तरह की मीटिंग बुलाते रहेंगे तो मैं आपके पास आऊँगी ही नहीं। फिर पिताजी ने मीटिंग बुलाना छोड़ दिया। अभी उन्होंने भी सोच लिया कि जहाँ भी रहे, खुश रहे। अभी वे भी खुश हैं और मैं भी खुश हूँ।

प्रश्नः पहली बार कब मधुबन आयी थीं?

उत्तरः सन् 1983 में आयी थी जब पहली अन्तर्राष्ट्रीय कॉन्फ्रेन्स थी। मधुबन आने के बाद मेरा पहला चिन्तन यह चला कि मैं क्यों इस अफ्रीकन शरीर में हूँ? अगर मैं इंडियन शरीर में होती तो कितना अच्छा होता! एक बार मैं रातभर रोयी कि बाबा, आप यहाँ भारत में आते हो और मैं बाहर क्यों? साकार बाबा को देखने का सौभाग्य मुझे क्यों नहीं मिला? बाबा ने मुझे मेडिटेशन में अनुभव कराया कि बच्ची, तुम ब्रह्मा बाबा को मिस नहीं करोगी। दादियों में तुमको ब्रह्मा बाबा नज़र आयेगा। मुझे बहुत खुशी हुई कि बाबा ने मेरी बात सुन ली और उसका उत्तर भी दिया। फिर बाबा ने यह भी कहा कि बच्ची, तुम उस शरीर में वहाँ बाबा की सेवा करने गयी हो। तुम्हारे से वहाँ बहुत सेवा होनी है। तब मुझे तसल्ली हुई कि बाबा ने ही मुझे वहाँ भेजा है, ईश्वरीय सेवाअर्थ। यह मेरा मधुबन का पहला अनुभव था।

मधुबन से जाने के बाद मैं सेन्टर पर रहकर ईश्वरीय सेवा भी करती थी और लौकिक नौकरी भी। वर्तमान समय मैं नाकरू (Nakaru), पूर्व अफ्रीका सेन्टर पर रहती हूँ। मैं मेडिकल विभाग में नौकरी करती थी। लगभग 21 जिला अस्पतालों की लेबोरेटरियों की इंचार्ज थी। जनवरी, 2007 से मैं सेवानिवृत्त हो गयी हूँ।

प्रश्नः आपके इस मार्ग पर आगे बढ़ने का क्या कारण रहा?

उत्तरः मैं जो चाहती थी और ढूँढ़ रही थी वो सारी बातें यहाँ मिल गयीं। जैसे मुझे परमात्मा का सत्य परिचय चाहिए था, उसके साथ यथार्थ सम्बन्ध कैसे जोड़ें की विधि चाहिए थी। वे सब यहाँ मिल गये। जब मैं नन बनी थी, कान्वेण्ट में थी वहाँ भी गॉड के बारे में बताया जाता था लेकिन वहाँ उसके साथ सम्बन्ध जोड़ने की विधि ठीक नहीं थी। वे सिखाते थे लेकिन सही विधान नहीं था। जब मैं इस ज्ञान से जुड़ गयी तब मैंने अनुभव किया कि ज्ञान तथा प्रैक्टिकल जीवन में सम्बन्ध तथा समानता है। इस ज्ञान द्वारा परमात्मा के साथ सहज रूप में सम्बन्ध जोड़ सकते हैं क्योंकि परमात्मा के बारे में यह सत्य ज्ञान है।

प्रश्नः आपको कैसे विश्वास हुआ कि परमात्मा ब्रह्मा के तन में अवतरित होते हैं?

उत्तरः यह तो बहुत सहज है। क्रिश्चियन धर्मग्रंथ में लिखा हुआ है कि गॉड ने आकर मनुष्यों के साथ बात की है, जैसे मोसिस, क्राइस्ट इत्यादि के साथ। इसलिए परमात्मा के आगमन पर मुझे कभी संशय नहीं हुआ। हाँ, कोर्स लेते समय मैंने ब्रह्मा बाबा का चित्र नहीं देखा। मैं सोचती थी कि मेरे और गॉड के बीच में कोई देहधारी नहीं होना चाहिए। मेरा सीधा सम्बन्ध उस गॉड से ही होना चाहिए। जब बाबा ने मुरली में कहा कि ब्रह्मा तुम बच्चों की बड़ी माँ है, तब से मैंने ब्रह्मा बाबा के चित्र की तरफ़ देखना शुरू किया और ब्रह्मा बाबा से मेरा सम्बन्ध जुट गया। यह शायद ज्ञान में आने के एक साल बाद हुआ। तब तक मैं सिर्फ एक निराकार को ही मानती थी।

जब बाबा से मिलने मधुबन आयी थी, उस समय मैंने बाबा से कहा कि बाबा, आप कैसे मनुष्य तन में प्रवेश करते हैं, मुझे देखना है। बाबा ने मुझे दिखाया। बाबा ने मुझे दो लाइट दिखायी गुलज़ार दादी के तन में। एक लाइट थी बहुत प्रकाशमान, दूसरी थी उससे कम प्रकाशमान। उसके बाद बाबा ने मुझे एक तरफ शिव बाबा और दूसरी तरफ़ ब्रह्मा बाबा को दिखाया। उसके बाद मुझे यह पक्का निश्चय हुआ कि ब्रह्मा बाबा,शिव बाबा का रथ है। दोनों मिलकर गुलज़ार दादी का तन लेते हैं।

प्रश्नः ईश्वरीय पढ़ाई के चार विषयों में आपका अति प्रिय विषय कौन-सा है?

उत्तरः योग का। ज्ञान, धारणा तथा सेवा भी मुझे पसन्द हैं लेकिन मेरी रुचि ज़्यादा योग में है।

प्रश्नः पहली बार जब आपने योग किया, परमात्मा से बुद्धियोग जोड़ा उस समय का क्या अनुभव रहा?

उत्तरः मन एकदम शान्त था, बुद्धि स्थिर थी क्योंकि मन-बुद्धि को ठिकाना मिल गया था। मन पूरा सन्तुष्ट था क्योंकि जो मैं ढूँढ रही थी वह मिल गया था। ज्ञान मिलने से पहले मन में बहुत प्रश्न थे। वे सब समाप्त हो गये थे। इसलिए मन में पूर्ण रूप से सुख मिश्रित शान्ति थी। पिता परमात्मा से सम्बन्ध जुड़ गया तो असीम खुशी थी।

प्रश्नः बापदादा से आपको व्यक्तिगत रूप से कोई वरदान मिला है?

उत्तरः हाँ, अनेक वरदान मिले हैं। जब पहली बार बापदादा से मिली थी, उस समय बाबा ने कहा था कि बच्ची, आपसे बहुत सेवा होगी। बाबा ने यह भी कहा कि बच्ची अपने घर जल्द से जल्द पहुँच गयी। बाबा के इन महावाक्यों ने मुझे पक्का निश्चय करा दिया कि मैं इससे पहले यहाँ भारत में थी; क्योंकि बचपन में, इस जन्म के माँ-बाप का प्यार देखकर मुझे लगता था कि यह प्यार वो नहीं है, जो मैंने पहले पाया था। मैं बचपन में बहुत रोती थी। मुझे बार-बार याद आता था कि मेरे माता-पिता कहीं दूर हैं, उनका प्यार मुझे चाहिए। हो सकता है, जिन माता-पिता को मैं चाहती थी वे उस समय भारत में होंगे।

प्रश्नः लौकिक परिवार वालों को आपने यह ज्ञान नहीं दिया ?

उत्तरः सबको मैंने बाबा का परिचय दिया है। उनमें से दो भाई तथा दो बहनों ने पूरा कोर्स किया है।

प्रश्नः परमात्मा के साथ आपका अति प्रिय सम्बन्ध कौन-सा है?

उत्तरः पिता का ।

प्रश्नः वही सम्बन्ध क्यों? दूसरा क्यों नहीं?

उत्तरः लौकिक में भी परमात्मा की मैं पिता के रूप में ही प्रेयर करती थी और अलौकिक में भी मुझे वही सम्बन्ध बहुत प्यारा है। हो सकता है, जन्म- जन्मान्तर से परमात्मा को पिता के रूप में मैंने ढूँढ़ा हो। ब्रह्मा बाबा हमेशा मुझे माँ के रूप में नज़र आते हैं और उनको हमेशा नाव में देखती हूँ। जब भी मैं सूक्ष्म वतन में ब्रह्मा बाबा को देखती हूँ, वे नाव में बैठे हैं और हम सब उनके साथ बैठे हैं। आजकल बाबा ने जो कहा है कि दिन में आठ बार पाँच रूपों का अभ्यास करो, उसका अभ्यास करती हूँ। इस अभ्यास से मेरे में बहुत हल्कापन आया है।

प्रश्नः ज्ञान में आने से पहले भारत के प्रति आपकी क्या भावना थी?

उत्तरः अच्छी नहीं थी क्योंकि अफ्रीका में इंडियन थे लेकिन वे हम लोगों के साथ मिक्स नहीं होते थे, हमारे से दूर रहते थे। इसलिए हमारी उनके प्रति अच्छी भावना नहीं थी। जब मैं पहली बार इंडिया आयी तब मेरी भावना बदल गयी। यह भावना आयी कि भारत मेरा घर है, होम लैण्ड (Homeland) है। मुझे यह भी अनुभव हुआ कि मेरा पिछला जन्म भारत में ही था।

प्रश्नः भारतवासियों के प्रति आपका क्या सन्देश है?

उत्तरः उनके लिए मेरा यही सन्देश है कि भारतवासी बड़े भाग्यशाली हैं। भारत में आकर गॉड गति-सद्गति का ज्ञान दे रहा है, उसको समझना चाहिए और अपने जीवन में प्रैक्टिकल लाना चाहिए।

मुख्यालय एवं नज़दीकी सेवाकेंद्र

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ब्रह्माकुमारी तृप्ता बहन जी, फिरोजपुर सिटी, पंजाब से, अपने साकार बाबा के साथ अनुभव साझा करती हैं। बचपन से श्रीकृष्ण की भक्ति करने वाली तृप्ता बहन को सफ़ेद पोशधारी बाबा ने ‘सर्वधर्मान् परित्यज्य’ का संदेश दिया। साक्षात्कार में बाबा ने

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लक्ष्मण भाई, दिल्ली, मालवीय नगर से, 1933 में करांची में जन्मे। 1958 में ब्रह्माकुमारी ज्ञान प्राप्त किया और बाबा से मिलकर जीवन बदल गया। 1962 में दिव्य विवाह किया और योगी जीवन अपनाया। बाबा की शिक्षाओं ने उन्हें साकार बाबा

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चन्द्रहास, जिन्हें माधौ के नाम से भी जाना जाता था, का नाम प्यारे बाबा ने रखा। साकार मुरलियों में उनकी आवाज़ बापदादा से पहले सुनाई देती थी। ज्ञान-रत्नों को जमा करने का उन्हें विशेष शौक था। बचपन में कई कठिनाइयों

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