“रहमदिल और बेहद की वैराग वृत्ति”
आज लवफुल और मर्सीफुल बापदादा अपने समान बच्चों को देख रहे हैं। आज बापदादा विश्व के सर्व अन्जान बच्चों को देख रहे थे। भले अन्जान हैं लेकिन फिर भी बच्चे हैं। बापदादा के सम्बन्ध से सर्व बच्चों को देखते हुए क्या अनुभव किया कि मैजारिटी आत्माओं को समय प्रति समय किसी-न-किसी कारण से जाने-अन्जाने भी वर्तमान समय मर्सी अर्थात् रहम की, दया की आवश्यकता है और आवश्यकता के कारण ही मर्सीफुल बाप को याद करते रहते हैं। तो चारों ओर की आवश्यकता प्रमाण इस समय रहम-दृष्टि की पुकार है क्योंकि एक तो भिन्न-भिन्न समस्याओं के कारण अपने मन और बुद्धि का सन्तुलन न होने के कारण मर्सीफुल बाप को वा अपनी-अपनी मान्यता वालों को मर्सी के लिए बहुत दु:ख से, परेशानी से पुकारते रहते हैं। चाहे अन्जान आत्माएं बाप को न जानने के कारण अपने धर्म पिताओं वा गुरूओं को वा इष्ट देवों को मर्सीफुल समझकर पुकारते हैं लेकिन आप सब तो जानते ही हो कि इस समय सिवाए एक बाप परम-आत्मा के और किसी भी आत्मा द्वारा मर्सी मिल नहीं सकती। भले बाप उन्हों की इच्छा पूर्ण करने के कारण, भावना का फल देने के कारण किसी भी इष्ट को वा महान आत्मा को निमित्त बना दे लेकिन दाता एक है। इसलिए वर्तमान समय के प्रमाण मर्सीफुल बाप बच्चों को भी कहते हैं कि बाप के सहयोगी साथी भुजाएं आप ब्राह्मण बच्चे हो। तो जिस चीज़ की आवश्यकता है, वह देने से प्रसन्न हो जाते हैं। तो मास्टर मर्सीफुल बने हो? आपके ही भाई-बहने हैं - चाहे सगे हैं वा लगे हैं लेकिन हैं तो परिवार के। अपने परिवार की अन्जान, परेशान आत्माओं के ऊपर रहमदिल बनो। दिल से रहम आये। विश्व की अन्जान आत्माओं के लिए भी रहम चाहिए। और साथ-साथ ब्राह्मण-परिवार के पुरुषार्थ की तीव्रगति के लिए वा स्व-उन्नति के लिए रहमदिल की आवश्यकता है। स्व-उन्नति के लिए स्व पर जब रहमदिल बनते हैं तो रहमदिल आत्मा को सदा बेहद की वैराग्य वृत्ति स्वत: ही आती है। स्व के प्रति भी रहम हो कि मैं कितनी ऊंच-ते-ऊंच बाप की वही आत्मा हूँ और वही बाप समान बनने के लक्ष्यधारी हूँ। उस प्रमाण ओरीज्नल श्रेष्ठ स्वभाव वा संस्कार में अगर कोई कमी है तो अपने ऊपर दिल का रहम कमियों से वैराग्य दिला देगा।
बापदादा आज यही रूहरिहान कर रहे थे कि सभी बच्चे नॉलेज में तो बहुत होशियार हैं। प्वाइंट स्वरूप तो बन गये हैं लेकिर हर कमजोरी को जानने की प्वाइंट्स हैं, जानते भी हैं कि यह होना चाहिए, करना नहीं चाहिए, यह जानते हुए भी प्वाइंट-स्वरूप बनना और जो कुछ व्यर्थ देखा-सुना और अपने से हुआ उसको फुलस्टॉप की प्वॉइन्ट लगाना नहीं आता है। प्वाइंट्स तो हैं लेकिन प्वॉइंट स्वरूप बनने के लिए विशेष क्या आवश्यकता है? अपने ऊपर रहम और औरों के ऊपर रहम। भक्ति-मार्ग में भी सच्चे भक्त होंगे वा आप भी सच्चे भक्त बने हो, आत्मा में रिकॉर्ड भरा हुआ है ना। तो सच्चे भक्त सदा रहमदिल होते हैं इसलिए वे पाप-कर्म से डरते हैं। बाप से नहीं डरते लेकिन पाप से डरते हैं। इसलिए कई पाप-कर्म से बचे हुए रहते हैं। तो ज्ञान-मार्ग में भी जो यथार्थ रहमदिल हैं - उसमें 3 बातों से किनारा करने की शक्ति होती है। जिसमें रहम नहीं होता वे समझते हुए, जानते हुए तीन बातों के परवश बन जाते हैं। वह तीनों बातें हैं - अलबेलापन, ईर्ष्या और घृणा। कोई भी कमजोरी वा कमी का कारण 90 प्रतिशत यह तीनों बातें होती हैं। और जो रहमदिल होगा वह बाप के साथी, धर्मराज की सज़ा से किनारा करने की शुभ-इच्छा रखते हैं। जैसे भक्त डर के मारे अलबेले नहीं होते, ऐसे ब्राह्मण-आत्मायें बाप के प्यार के कारण, धर्मराजपुरी से क्रॉस न करना पड़े - इस मीठे डर से अलबेले नहीं होते हैं। बाप का प्यार उससे किनारा करा देता है। अपने दिल का रहम अलबेलापन समाप्त कर देता है। और जब अपने प्रति रहम भावना आती है तो जैसी वृत्ति, जैसी स्मृति, वैसी सर्व ब्राह्मण सृष्टि के प्रति स्वत: ही रहमदिल बनते हैं। यह है यथार्थ ज्ञानयुक्त रहम। बिना ज्ञान के रहम कभी नुकसान भी करता है। लेकिन ज्ञानयुक्त रहम कभी भी किसी आत्मा के प्रति ईर्ष्या वा घृणा का भाव दिल में उत्पन्न करने नहीं देगा। ज्ञानयुक्त रहम के साथ-साथ स्वयं की रूहानियत का रूहाब भी अवश्य होता है। अकेला रहम नहीं होता। लेकिन रहम और रूहाब दोनों का बैलेंस रहता है। अगर ज्ञानयुक्त रहम नहीं है, साधारण रहम है तो किसी भी आत्मा के प्रति चाहे लगाव के रूप से, चाहे किसी भी कमजोरी से उसके ऊपर प्रभावित हो सकते हैं। प्रभावित भी नहीं होना है। न घृणा चाहिए, न प्रभावित चाहिए क्योंकि आप तन-मन-बुद्धि सहित बाप के ऊपर प्रभावित हो चुके हो। जब मन और बुद्धि एक के तरफ और ऊंचे-ते-ऊंचे तरफ प्रभावित हो चुकी तो फिर दूसरे के ऊपर प्रभावित कैसे हो सकते? अगर दूसरे के ऊपर प्रभावित होते हैं तो उसको क्या कहेंगे? दी हुई वस्तु को फिर से स्वयं यूज़ करना, उसको कहा जाता है - अमानत में ख्यानत। जब मन-बुद्धि दे दिया तो फिर आपकी रही कहाँ जो प्रभावित होते हो? बाप के हवाले कर दिया है या आधी रखी है, आधी दी है? जिन्होंने फुल दी है वे हाथ उठाओ। देखो, ब्राह्मण-जीवन का फाउण्डेशन, महामन्त्र क्या है? मनमनाभव। तो मनमनाभव नहीं हुए हो? तो ज्ञान सहित रहमदिल आत्मा कभी किसी के ऊपर चाहे गुणों के ऊपर, चाहे सेवा के ऊपर, चाहे किसी भी प्रकार के सहयोग प्राप्त होने के कारण आत्मा पर प्रभावित नहीं हो सकती क्योंकि बेहद की वैरागी होने के कारण बाप के स्नेह, सहयोग, साथ - इनके सिवाए और कुछ उसको दिखाई नहीं देगा। बुद्धि में आयेगा ही नहीं। तुम्हीं से उठूं, तुम्हीं से सोऊं, तुम्हीं से खाऊं, तुम्हीं से सेवा करूं, तुम्हीं साथ कर्मयोगी बनूं - यही स्मृति सदा उस आत्मा को रहती है। भले कोई श्रेष्ठ आत्मा द्वारा सहयोग मिलता भी है लेकिन उसका भी दाता कौन? तो एक बाप की तरफ ही बुद्धि जायेगी ना। सहयोग लो, लेकिन दाता कौन है, यह भूलना नहीं चाहिए। श्रीमत एक बाप की है। कोई निमित्त आत्मा आपको बाप की श्रीमत की स्मृति दिलाती है तो उनकी श्रीमत नहीं कहेंगे, लेकिन बाप की श्रीमत को फॉलो कर औरों को भी फॉलो कराने के लिए स्मृति दिलाती है। निमित्त आत्मायें, श्रेष्ठ आत्मायें कभी यह नहीं कहेंगी कि मेरी मत पर चलो। मेरी मत ही श्रीमत है - यह नहीं कहेंगी। श्रीमत की फिर से स्मृति दिलाते, इसको कहते हैं यथार्थ सहयोग लेना और सहयोग देना। दीदी की, दादी की श्रीमत नहीं कहेंगे। निमित्त बनते हैं श्रीमत की शक्ति स्मृति दिलाते हैं। इसलिए कोई भी आत्मा के ऊपर प्रभावित नहीं होना। अगर किसी भी बात में किसी पर प्रभावित होते हैं, चाहे उसके नाम की महिमा पर, रूप पर वा किसी विशेषता पर तो लगाव के कारण, प्रभावित होने के कारण बुद्धि वहाँ अटक जायेगी। अगर बुद्धि अटक गई तो उड़ती कला हो नहीं सकती। अपने ऊपर भी प्रभावित होते हैं - मेरी बहुत अच्छी प्लैनिंग बुद्धि है, मेरा ज्ञान बहुत स्पष्ट है, मेरे जैसी सेवा और कोई कर नहीं सकते। मेरी इन्वेंटर बुद्धि है, गुणवान हूँ - यह अपने ऊपर भी प्रभावित नहीं होना है। विशेषता है, प्लैनिंग बुद्धि है लेकिन सेवा के निमित्त किसने बनाया? मालूम था क्या कि सेवा क्या होती है। इसलिए स्व-उन्नति के लिए यथार्थ ज्ञानयुक्त रहमदिल बनना बहुत आवश्यक है। फिर यह ईर्ष्या, घृणा समाप्त हो जाती है। तीव्रगति की कमी का मूल कारण यही है - ईर्ष्या वा घृणा या प्रभावित होना। चाहे अपने ऊपर चाहे दूसरे के ऊपर और चौथी बात सुनाई - अलबेलापन। यह तो होता ही है, टाइम पर तैयार हो जायेंगे, यह है अलबेलापन। बापदादा ने एक हंसी की बात पहले भी सुनाई है। ब्राह्मण-आत्माओं के दूर की नज़र बड़ी तेज है और नजदीक की नज़र थोड़ी कमजोर है इसलिए दूसरों की कमी जल्दी दिखाई देती है और अपनी कमी देरी से दिखाई देती है।
तो रहम की भावना लवफुल भी हो और मर्सीफुल भी हो, इससे दिल से वैराग्य आयेगा। जिस समय सुनते हैं वा भट्ठी होती है, रुहरिहान होती है, उस समय तो सब समझते हैं कि ऐसे ही करना है। वह अल्पकाल का वैराग्य आता है, दिल का नहीं होता। जो बाप को अच्छा नहीं लगता उससे दिल से वैराग्य आना चाहिए। अपने-आपको भी अच्छा नहीं लगता है लेकिन बेहद की वैराग वृत्ति का हल चलाओ, रहमदिल बनो। कई बच्चे बहुत अच्छी-अच्छी बातें सुनाते हैं। कहते हैं - जब कोई झूठ बोलता है, तब बहुत गुस्सा आता, झूठ पर गुस्सा आता है या कोई गलती करता है तो गुस्सा आता है। वैसे नहीं आता, उसने झूठ बोला यह तो ठीक है, उसको रांग समझते हो और जो आप गुस्सा करते हो वह फिर राइट है क्या? रांग, रांग को कैसे समझा सकते? उसका असर कैसे हो सकता है। उस समय अपनी गलती को नहीं देखते लेकिन दूसरे की झूठ की छोटी बात को भी बड़ा कर देते हैं। ऐसे समय पर रहम दिल बनो। अपनी प्राप्त हुई बाप की शक्तियों द्वारा रहमदिल बनो, सहयोग दो। लक्ष्य अच्छा रखते हैं कि उनको झूठ से बचा रहे हैं, लक्ष्य अच्छा है उसके लिए मुबारक हो। लेकिन रिजल्ट क्या निकली? वह भी फेल, आप भी फेल। तो फेल वाला फेल वाले को क्या पास करायेगा? कई फिर समझते हैं - हमारी जिम्मेवारी है उसको अच्छा बनाना, आगे बढ़ाना। लेकिन जिम्मेवारी निभाने वाला पहले अपनी जिम्मेवारी उस समय निभा रहे हो या दूसरे की निभाते हो। कई निमित्त टीचर बनते हैं तो समझते हैं छोटों के लिए हम जिम्मेवार हैं, इनको शिक्षा देनी है, सिखाना है। लेकिन सदैव यह सोचो कि यथार्थ नॉलेज सोर्स ऑफ इनकम होगी। अगर आपने शिक्षक की जिम्मेवारी से शिक्षा दी तो पहले यह देखो कि उस शिक्षा से दूसरे की कमाई जमा हुई? सोर्स ऑफ इनकम हुआ या सोर्स ऑफ गिरावट हुई? इसलिए बापदादा सदा कहते हैं कि कोई भी कर्म करते हो तो त्रिकालदर्शी स्थिति में स्थित होकर करो। सिर्फ वर्तमान नहीं देखो कि इसने किया इसलिए कहा। लेकिन उसका भविष्य परिणाम क्या होगा, वह भी देखो। जो पास्ट आदि अनादि स्थिति ब्राह्मण आत्माओं की थी, अब भी है और आगे भी रहेगी, उसी प्रमाण हैं? तीनों काल चेक करो, तो समझा बापदादा क्या चाहते हैं?
स्व-उन्नति तो करेंगे लेकिन परिवर्तन क्या लायेंगे? चाहे महारथी हो चाहे नये हो - बापदादा की एक ही शुभ आशा है, जितना चाहते हैं उतना अभी हुआ नहीं है। रिजल्ट तो सुनायेंगे ना। बापदादा अल्पकाल का वैराग्य नहीं चाहते हैं। निजी वैराग्य आये - जो बाप को अच्छा नहीं लगता वह नहीं करना है, नहीं सोचना है, नहीं बोलना है। इसको बापदादा कहते हैं दिल का प्यार। अभी मिक्स है, कभी दिल का प्यार है, कभी दिमाग का प्यार है। माला का हर एक मणका हरेक मणके के साथ समीप हो, स्नेही हो, प्रगति के लिए सहयोगी हो, इसलिए माला रूकी हुई है क्योंकि माला तैयार होना अर्थात् युगल दाने के समान एक-दो के भी समीप स्नेही बनना। पहले 108 की माला बने तब दूसरी बने। बापदादा बहुत बार माला तैयार करने के लिए बैठते हैं लेकिन अभी पूरी ही नहीं हुई है। मणका, मणके के समीप तब आता है अर्थात् बाप उसको पिरोता तभी है जब उस मणके को तीन सर्टीफिकेट हों:-
बाप पसंद, ब्राह्मण-परिवार पसंद और अपने यथार्थ पुरुषार्थ पसंद। तीनों बातें चेक करते हैं तो मणका हाथ में ही रह जाता है, माला में नहीं आता। तो इस वर्ष कौन-सा स्लोगन याद रखेंगे? त्रिमूर्ति बाप और विशेष तीनों सम्बन्ध द्वारा तीन सर्टीफिकेट लेना है। और औरों को भी दिलाने में सहयोगी बनना है। माला का समीप मणका बनना ही है। तो सुना, स्व-उन्नति क्या करनी है? जैसे ब्रह्मा बाप का फाउण्डेशन नम्बरवन परिवर्तन में क्या रहा? बेहद का वैराग्य। जो बाप ने कहा वह ब्रह्मा ने किया, इसलिए विन करके वन बन गये। अच्छा।
बापदादा यह रिजल्ट देखेंगे। हर एक अपने को देखे, दूसरे को नहीं देखना है। कई समझते हैं सीजन का आज लास्ट डे है लेकिन बापदादा कहते हैं - लास्ट नहीं है, माला बनने का फास्ट सीजन का दिन है। सभी को चांस है। अभी माला के मणके पिरोये नहीं हैं, फिक्स नहीं हुए हैं। तीन सर्टीफिकेट लो और पिरो जाओ। जितना प्रत्यक्ष सबूत देने वाले प्रत्यक्ष चेहरे और चलन में देखेंगे उतना फिर से नई रंगत देखेंगे। अगर आप भी वहीं के वहीं रहे तो रंगत भी वही की वही रही। इसलिए अपने में नवीनता लाओ, परिवार में भी तीव्र पुरुषार्थ की नई लहर लाओ। फिर आगे चलकर कितने वण्डरफुल नज़ारे देखेंगे। जो अब तक हुआ वह बीता, अभी हर कर्म में नया उमंग, नया उत्साह... इन पंखों से उड़ते चलो।
बाकी जिन्होंने भी जो सेवा में सहयोग दिया अर्थात् अपना भाग्य जमा किया, वह अच्छा किया। चाहे देश चाहे विदेश के चारों ओर के सेवाधारियों ने सेवा की। इसलिए सेवाधारियों को बापदादा सदा यही कहते हैं कि सेवाधारी अर्थात् गोल्डन चांस का भाग्य लेने वाले। अभी इसी भाग्य को जहाँ भी जाओ वहाँ बढ़ाते रहना, कम नहीं होने देना। थोड़े समय का चांस सदा के लिए तीव्र पुरुषार्थ का गोल्डन चांस दिलाता रहेगा। सेवाधारी भी जो चले गये हैं अथवा जो जा रहे हैं, सभी को मुबारक। अच्छा।
सर्व रहमदिल श्रेष्ठ आत्माओं को, सदा स्वयं को स्व-उन्नति की उड़ती कला में ले जाने वाले, तीव्र पुरुषार्थी आत्माओं को, सदा हर समय एक बाप को साथ अनुभव करने वाले अनुभवी आत्माओं को, सदा बाप के दिल की आशाओं को पूर्ण करने वाले कुल दीपक आत्माओं को, सदा अपने को माला के समीप मणके बनाने वाले विजयी आत्माओं को, बेहद की वैराग्य वृत्ति से हर समय बाप को फॉलो कर बाप समान बनने वाले अति स्नेही राइट हैण्ड बच्चों को बापदादा का याद-प्यार और नमस्ते।
डबल विदेशी भाई-बहनों से ग्रुप वाइज मुलाकात:-
1\. हर समय ऐसा अनुभव करते हो कि बापदादा के स्नेह की दुआयें हम ब्राह्मण-आत्माओं की पालना कर आगे बढ़ा रही है। जहाँ दुआये होती है, वहाँ बाप के सर्व सम्बन्ध की प्रगति बहुत सहज और तीव्र होती है। तो सहज लगता है या कभी-कभी मुश्किल हो जाता है? जब मेहनत का अनुभव हो तो उस समय चेक करना चाहिए कि किस श्रीमत की लकीर से बाहर जा रहे हैं? चाहे संकल्प में, चाहे बोल में, चाहे कर्म वा सेवा की लकीर से बाहर निकलते हैं तब माया की आकर्षण मेहनत कराती है। ब्राह्मण-जीवन की मर्यादाएं पसंद है या मुश्किल लगती है? कौन-सी मर्यादा मुश्किल लगती है? जो भी मार्यादाएं हैं, उससे देखो - इसमें फायदा क्या है? अगर फायदा सामने आयेगा तो मुश्किल नहीं लगेंगी। जब कोई कमजोरी आती है तब मुश्किल लगता है। यह मर्यादाएं बनाने वाला कौन है, किसने बनाई है? बाप ने बनाई है! बाप का बच्चों से बेहद का प्यार है, जिससे प्यार होता है उसके लिए हमेशा कोई भी उसकी मुश्किल होती तो सहज की जायेगी। कोई सैलवेशन चाहिए तो ले सकते हो लेकिन मुश्किल है नहीं। जो निमित्त बने हैं, उनसे स्पष्ट बोलो, अपने दिल का भाव सुनाओ फिर अगर राइट होगा तो उसी प्रमाण सैलवेशन मिलेगी। क्योंकि जिसे आप समझते हो कि यह होना चाहिए और वह नहीं होता तो मुश्किल लगता है लेकिन जिसे आप समझते हो - होना चाहिए, उससे कितना फायदा, कितना नुकसान है - वह बाप और अनुभवी आत्माएं ज्यादा जानती हैं। जहाँ प्यार होता है वहाँ कुछ मुश्किल नहीं होता है। और बापदादा ऐसी बात तो कहेंगे नहीं जिससे बच्चों का कोई नुकसान हो, इसलिए ये मर्यादाएं भी बाप का प्यार है, क्योंकि इसमें चलने से शक्ति आती हे, सेफ रहते हो और खुशी होती है। बापदादा जानते हैं - आस्ट्रेलिया के बच्चे मैजारिटी पुराने, अनुभवी और मजबूत हैं। इसलिए जो मजबूत हैं, उसे सदा ही सहज अनुभव होता है। अगर शक्तियां आगे बढ़ती है तो पाण्डवों को खुशी होती है ना? किसी को आगे बढ़ाना इसमें स्वयं को आगे बढ़ाना समाया हुआ है। जो सब बातों में विन करता है वह वन है। फलक से कहो हम नहीं विजयी होंगे तो कौन होगा! भले दूसरे आयें लेकिन आप तो हो ना? सदा विजयी बन आगे बढ़ने और औरों को आगे बढ़ाने के वरदानी हो। बापदादा देखते हैं कि अच्छा औरों के लिए एग्ज़ाम्पुल बने हुए हैं। एक-दो के प्रत्यक्ष जीवन को देखकर दूसरों में भी हिम्मत आ जाती है। तो यह सेवा भी बहुत श्रेष्ठ है। अपनी जीवन को सदा ही सन्तुष्ट और खुशनुमा बनाने वाले हर कदम में सेवा करते हैं। वाणी द्वारा तो सेवा करते रहेंगे, लेकिन वाणी के साथ-साथ अपने चेहरे और चलन से निरन्तर सेवा करते रहना। जो भी सम्पर्क में आये, उसके दिल से स्वत: ही वाह-वाह के गीत निकलें। अच्छा!
2\. यह विशेष खुशी है कि हम फिर से अपने परिवार में अपने बाप के पास पहुँच गये! देखो सभी कहाँ से कहाँ बिखर गये थे और अभी आपस में मिल गये। यह मिलन, आत्मा का परमात्मा बाप से और अलौकिक परिवार से कितना प्यार है। यह मेला प्यारा लगता है ना? सदा खुशी में ही गीत गाते रहते हो। दिल का गीत गाना आता है? खुशी से दिल के गीत आप ब्राह्मण ही गाते हो। ऐसा गीत गाते हो जो आपके दिल के खुशी का गीत भगवान को भी खुश कर देता है। रशिया वाले भी चतुर निकले। सबसे लास्ट अभी रशिया का सेन्टर निकला है इसलिए लाडला है। सभी का आपसे विशेष प्यार है। अभी और भी नये-नये स्थान खुलेंगे। विश्व का पिता है तो विश्व के कोने-कोने में सन्देश तो जायेगा ना। अभी कई कोने रहे हुए हैं तो सभी को पहुंचना है। बाप तो है विश्व पिता लेकिन आप सबको भी टाइटल है विश्व कल्याणकारी। तो विश्व के कोने-कोने में आवाज जरुर फैलाना है, सन्देश जरुर देना है। ऐसे नहीं सोचना विनाश की तैयारियां तो अभी दिखाई नहीं दे रही है, जब ऐसा समय समीप आयेगा तब सभी को सन्देश दे देंगे। कई समझते हैं अभी तो आपस में समीप आ रहे हैं, शान्ति की बातें हो रही हैं। लेकिन जब सभी की बुद्धि में आयेगा कि बहुत समय पड़ा है, तब ही अचानक होगा। इसलिए सदा एवररेडी। एवररेडी अर्थात् सदा अपने को सब रीति से सम्पन्न बनाना। इसको कहते हैं लास्ट सो फास्ट। अच्छ।!
अव्यक्त बापदादा की डबल विदेशी भाई-बहनों से पर्सनल मुलाकात:-
सदा यह खुशी रहती है कि हम बाप के वर्से के अधिकारी हैं? और शिक्षक द्वारा श्रेष्ठ पढ़ाई से श्रेष्ठ पद प्राप्त करने वाले हैं और सतगुरु द्वारा वरदान प्राप्त करने वाली श्रेष्ठ आत्माएं हैं। तीनों सम्बन्ध द्वारा तीनों ही प्राप्तियों की स्मृति रहने से सदा ही सहज तीव्र पुरुषार्थी हो जायेंगे। सिर्फ वर्सा नहीं मिलता लेकिन श्रेष्ठ पद भी है और वरदान भी है। तो तीनों ही प्राप्तियों का नशा सदा रहना चाहिए। कभी भी पढ़ाई में मेहनत का अनुभव हो तो बाप को, गुरु से प्राप्त हुए वरदानों को सामने रखो तो मुश्किल सहज हो जायेगी। यह वैराइटी प्राप्तियां उमंग-उल्लास को बढ़ा देंगी और सदैव अपने को बाप के स्नेह के साथ छत्रछाया में अनुभव करेंगे। यह छत्रछाया सबको मिली है ना? इसी छत्रछाया के अंदर सदा रहते हो? बाहर तो नहीं निकलते? यह इतनी बड़ी छत्रछाया है जो छत्रछाया के अन्दर घुमो-फिरो, मौज करो, बाहर जाने की आवश्यकता ही नहीं। कभी इस छत्रछाया से बाहर निकलने की दिल होती है? थोड़ा चक्कर लगाकर आयें, कभी-कभी दिल होती है? बिल्कुल नहीं? क्योंकि बाप की छत्रछाया से बाहर तो रहकर देख लिया, इतने जन्म तो छत्रछाया से बाहर रहकर अनुभव किया कि क्या किया और क्या बन गये, एक जन्म का भी नहीं, 63 जन्म का अनुभव कर लिया, क्या बन गये? गिरती कला में चले गये ना। देखो पहला जन्म आपका क्या था और अभी लास्ट जन्म देखो क्या से क्या बन गये! कहाँ देवता, कहाँ आज के मनुष्य! ऐसा सब देखो - तन क्या हो गया, मन क्या हो गया, धन क्या हो गया, सम्बन्ध क्या हो गया! तो मालूम पड़ेगा क्या से क्या हो गये! कितना फर्क है। तो सदैव इसी स्मृति में रहो कि हम इतने भाग्यवान हैं जो परमात्म-छत्रछाया में हैं। याद रहता है इसलिए सदा खुश रहते हो या कभी दु:ख की लहर आती है? जब जीवन बदल गई तो संकल्प, स्वप्न सब बदल गये। अभी अतीन्द्रिय सुख के झूले में सदा झूलने वाले हो, ऐसे हैं ना? बाप तो है सदा बच्चों के लिए। बच्चे कहें न कहें लेकिन बाप सदा साथ देने के लिए बंधा हुआ है। थोड़ा भी नीचे-ऊपर होते हो तो देखो बाप किसी-न-किसी रीति से बच्चों को पकड़ लेते हैं और तरफ जाने से। एक-एक अति प्यारा है, जिससे प्यार होता है उसको छोड़ा नहीं जाता, साथ रखा जाता है। ऐसे है ना? बच्चे थोड़ा-बहुत नटखट करते हैं। कभी-कभी खेल दिखाते हैं लेकिन बाप का प्यार फिर स्मृति दिला देता है फिर नटखट से नॉलेजफुल बन जाते हैं। तो सदा यही याद रखना कि छत्रछाया में रहने वाले हैं। अच्छा।
अहमदाबाद, दिल्ली तथा मेहसाना से आये हुए सेवाधारियों प्रति :-
जैसे भारत सबसे महान और भाग्यवान है, चाहे धनवान और देश हैं लेकिन फिर भी महान भारत ही गाया जाता है। भाग्यविधाता भाग्य की लकीर खींचने के लिए भारत में ही आता है इसलिए फिर भी बाप को मिलने के लिए सभी को भारत में ही आना प्ड़ता है। अमेरिका में तो बाप नहीं मिलेगा ना, तो भारतवासी कितने महान हो? स्वयं महान बन गये हो इसलिए सब देश वाले आपके मेहमान होकर आते हैं। सभी देशों के मेहमानों की मेहमाननिवाजी कौन करते हैं? भारत वाले करते हैं। आज मेहमाननिवाजी करने वाला ग्रुप आया है ना! यह मेहमाननिवाजी करने का भी भाग्य है। थकते तो नहीं हो? एक ही स्थान पर विश्व की आत्माएं आ जाएं और विश्व की सेवा के निमित्त बन जाओ, कितना जमा होता है विश्व में जाकर सेवा करने के बजाए आपके पास विश्व की आत्माएं आ जाएं, कितना अच्छा चांस है। बापदादा भी सेवाधारियों को देख खुश होते हैं। ऐसे नहीं कि कर्मणा सेवा करते हैं, कोई ज्ञान की तो करते नहीं हैं। लेकिन कर्म का प्रभाव वाणी से बड़ा है। एक होता है सुना हुआ और दूसरा होता है देखा हुआ। जो भी बेहद की सेवा के निमित्त हो वह बहुत श्रेष्ठ सेवा कर रहे हो। बहुत ही अच्छा है और अच्छा ही रहेगा। सदैव भाग्यविधाता बाप और और भाग्यवान मैं, यह रुहानी नशा रहता है ना? रुहानी नशा अर्थात् अविनाशी नशा। बापदादा सभी से पूछते हैं कि सन्तुष्ट रहते हो? सन्तुष्टता सब गुणों को स्वत: ही लाती है। जिसके पास सन्तुष्टता है उसके पास और गुण भी अवश्य होंगे, गुणों की खान हो जाती है। कोई भी बात हो जाए, कोई भी समस्या आ जाए लेकिन सन्तुष्टता नहीं जाये। बात आयेगी भी और चली जायेगी लेकिन सन्तुष्टता को नहीं जाने दो क्योंकि यह अविनाशी खजाना है, बाप का वर्सा है। यह सन्तुष्टता का खजाना हर समय आपको भरपूरता का अनुभव कराता रहेगा। अच्छा!
