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बी के सिस्टर एलिज़ाबेथ – अनुभवगाथा

सिस्टर एलिजाबेथ को सन् 1985 में ईश्वरीय ज्ञान प्राप्त हुआ। सन् 1986 से सेन्टर पर रहना शुरू किया। लौकिक में आप अभिनेत्री तथा शास्त्रीय गायिका थीं। आपने दस सालों तक अभिनय किया।

वर्तमान समय सैन फ्रांसिस्को के रिट्रीट हाउस ‘अनुभूति भवन’ में रहती हैं और गायन तथा अभिनय कला को ईश्वरीय सेवा में प्रयोग कर अनेक आत्माओं को प्रभु-प्रेम में विभोर करती हैं। 

बचपन से ही मैं गॉड से शादी करना चाहती थी

मैं एक अभिनेत्री थी। जब मैं चौदह साल की थी, उस समय से रंगमंच पर अभिनय आरम्भ किया। बीस साल की उम्र में मुझे बहुत बड़ी ख्याति प्राप्त हुई। मुझे बड़े-बड़े पार्ट बजाने के अवसर मिले। मैं रंगमंच की एक बहुत बड़ी अभिनेत्री थी, मुझे फिल्मों में काम करना पसन्द नहीं था। मुझे शास्त्रीय संगीत तथा रंगमंच अभिनय में बहुत रुचि थी इसलिए मैंने तीन साल का शास्त्रीय संगीत तथा अभिनय का डिप्लोमा किया। अभिनेत्री होने के नाते मुझे अच्छी आमदनी थी। मुझे सुख-सुविधा, मान-शान-स्थान, धन-सम्पत्ति सब प्राप्त थे। मैं वन् मैन शो (एक पात्राभिनय का प्रदर्शन) करती थी। उसमें कई गीत तथा डायलॉग होते थे। उन गीत और डायलॉग द्वारा मैं दर्शकों से बात करती थी कि मैं कौन हूँ, मैं तो यह नहीं हूँ जो दिखायी पड़ रही हूं। एक बार के प्रदर्शन में दो सौ के लगभग लोग इकट्ठे हुए थे। मेरे इस अभिनय से सब बहुत खुश हुए, तारीफ़ करने लगे। मीडिया वालों ने भी बहुत प्रचार किया। वह जो मेरा अभिनय था, केवल दर्शकों को खुश करने के लिए नहीं था, वह मेरी अन्दर की अनुभूति थी, मन की आवाज़ थी। यह एक्टिंग नहीं थी, सत्य था। प्रदर्शन पूरा होने के बाद मैं ग्रीन रूम में जाकर रो रही थी कि मैं कौन हूँ, मैं यह नहीं हूँ जो दिखायी पड़ रही हूँ। उतने में मेरे डायरेक्टर तथा टीचर आये और मुझे रोती हुई देखकर चकित होने लगे कि इसको क्या हुआ है। इसके बाद, एक साल के लिए मैंने अभिनय करना छोड़ दिया, मैं तलाश करती रही कि मैं कौन हूं, क्या हूँ?

मैं जब बच्ची थी, उस समय से ही गॉड से शादी करना चाहती थी। हमारा परिवार बहुत बड़ा था तथा पक्का कैथोलिक सम्प्रदाय वाला था। जब मैं दस साल की थी, उस समय सेरिमनी मनायी गयी, मैं सफ़ेद वस्त्रों से अलंकृत थी। मुझे खुशी हो रही थी कि मैं परमात्मा से शादी करने जा रही हूँ, मैं नन बनने जा रही हूं। जब ग्यारह साल की हो गयी तो मैंने ‘होली वर्डस’ को पढ़ा। होली वर्डस कहते हैं कि जो मुस्लिम हैं, जो प्रोटेस्टेंट हैं उनको मार डालो। जब इन वाक्यों को पढ़ा तो मुझे लगा कि ये गॉड के महावाक्य नहीं हो सकते। अगर उसके हैं, तो वो गॉड नहीं है। गॉड मार डालने के लिए कभी कह नहीं सकता। अगर कहता है तो गॉड का अस्तित्व ही नहीं है। तब से मैंने चर्च जाना छोड़ दिया, मैं नास्तिक बन गयी। मैंने पिताजी से कहा कि अगर दुनिया में युद्ध, लड़ाई-झगड़े हैं तो परमात्मा नहीं है।

जब मैं 24 साल की थी तो मुझे यह आभास होने लगा कि मैं यह शरीर नहीं है, तो मैं कौन हूँ। मैं अपने आपको जानने के लिए विज्ञान तथा मनोविज्ञान का अध्ययन कर रही थी। मुझे धर्म से नफ़रत आ गयी थी। इन्हीं दिनों, मेरी एक सह-अभिनेत्री ब्रह्माकुमारी राजयोग सेन्टर पर जाती थी, उसने मुझे ब्रह्माकुमारीज़ के बारे में बताया। मैंने कहा, ठीक है, कभी जायेंगे। एक दिन मैं सेन्टर पर गयी। लॉस एंजिल्स की गीता बहन ने मुझे कोर्स कराया। जब मैंने गीता बहन को देखा, उससे ज्ञान सुना तो मन में विचार आने लगा कि मुझे भी उस जैसी बनना है। उस बहन में मैंने पवित्रता, स्वच्छता, सत्यता, पारदर्शिता, निर्भयता, एकरसता, भोलापन आदि गुणों को देखा। रोज़ क्लास में जाने लगी। उसके बाद दादी जानकी वहाँ आयीं। उनको देखा तो बस, मेरा सब पुराना समाप्त हो गया, स्वाहा। मैं मधुबन जाने के लिए तैयारी करने लगी।

प्रश्नः आपको यह ज्ञान क्यों अच्छा लगा? इस मार्ग पर आगे बढ़ने के क्या कारण रहे?

उत्तरः जब मैं ब्रह्माकुमारी सेन्टर पर गयी, तो सबसे पहले वहाँ के व्यक्तियों के, वहाँ आने-जाने वालों के व्यवहार का निरीक्षण करती थी। वहां मैंने बहनों की सादगी, पवित्रता, सरलता, स्वच्छता तथा श्रेष्ठ वायब्रेशन्स पाये। वहाँ सब तरह के लोग, सब आयु के लोग आते थे। वहाँ आने वालों में जो रूहानियत थी, उनके मुख पर खुशी की जो रौनक थी, उसको देख मैंने जान लिया कि यही परमात्मा का सच्चा परिवार है। ब्रह्माकुमारी बहनों की पवित्रता ही उन पर विश्वास करने का आधार बनी। पवित्रता ही सबको आकर्षित करती है, वही सहज रीति से समर्पित होने के लिए प्रेरित करती है। मैं कोई सामाजिक कार्यों में भाग नहीं लेती थी, इसलिए मेरे लिए ईश्वरीय सेवार्थ समर्पित होना बहुत सहज रहा। मेरे में बहुत ही तथा शीघ्र परिवर्तन आ गया। मैं खुद आश्चर्य चकित होती कि मेरे में क्या हो रहा है! रोज़ मैं कुछ समय तक बाबा के कमरे में बैठती थी। बाबा के साथ मेरा वार्तालाप होता था।  शिव  बाबा के साथ भी तथा ब्रह्मा बाबा के साथ भी मेरा बहुत गहरा सम्बन्ध है। मैं ब्रह्मा बाबा के साथ इतनी सहज रीति से वार्तालाप करती हूँ जैसे कि एक छोटी बच्ची अपने बाप से करती है। एक दिन रोज़ की तरह बाबा के कमरे में बैठकर याद कर रही थी, अचानक मेरी नज़र शिव बाबा के कॉस्केट पर पड़ी। मेरो बुद्धि का तार एकदम खिंच गया और मुझे आभास होने लगा, अरे, ये तो मेरे डैड हैं! अमेरिकन इंग्लिश में डैड का मतलब होता है, ‘मेरा बहुत प्यारा पिता’। मेरे ऊपर निरन्तर प्रकाश का पुंज आ रहा था। मैं प्रकाश के गोले में बैठी थी, शिव बाबा के सामने। वह प्रकाश लेज़र लाइट जैसा बहुत तेज़ तथा शक्तिशाली था। फिर मैं बाबा के कमरे से उठी और अपने घर जाने लगी। जब घर पहुंची तो शिव बाबा ने अपनी लाइट के साथ, मेरे पीछे-पीछे घर में प्रवेश किया। मैंने कहा, ‘हैलो डैड!’ मुझे बहुत खुशी हो रही थी। इस अनुभव के बाद लगभग दो सालों तक मैं खुशी में उड़ती रही।

सन् 1986, फरवरी में शिवरात्रि पर, मैं पहली बार मधुबन आयी। इससे पहले मैंने कभी अपने देश के बाहर सफर नहीं किया था। यह मेरी पहली यात्रा थी वीज़ा लेकर देश से बाहर जाने की। सैन फ्रांसिस्को से भारत आने में बारह घण्टे लगते हैं। मध्य रात्री हम मुंबई एरपोर्ट पर उतरे। एअरपोर्ट से बाहर आते ही मझे अनुभव होने लगा कि इस भूमि से मेरा कोई हिसाब-किताब है। इस देश में मेरा बहुत गहरा सम्बन्ध है। बाहर कुछ सुरक्षा बल वाले बन्दूक लेकर खड़े थे तो उनको देख मन में अफसोस हुआ कि मेरे देश की क्या स्थिति हो गयी है! अगले दिन जब हम टैक्सी से रेलवे स्टेशन जा रहे थे, रास्ते में वाहनों को तथा लोगों को देख मुझे आश्चर्य हो रहा था कि मेरे देश की ऐसी दुर्दशा क्यों हुई है? हम ट्रेन में बैठे। जब ट्रेन चली तो आवाज़ आती है ना, छुक-छुक-छुक। वह आवाज़ मुझे ऐसी लग रही थी, मैं परमात्मा से मिलने जा रही हूँ, मैं परमात्मा से मिलने जा रही हूं। मुझे नशा चढ़ गया था, मैं ऐसा अनुभव कर रही थी कि मैं धरती के ऊपर तैर रही हूं। अपने आप गाती रही खुशी में। यह चलता रहा चालीस मिनट तक। मेरी यह स्थिति देखकर चन्दु बहन तथा गीता बहन भी खुश हो रहे थे।

अगले दिन दोपहर एक बजे हम मधुबन पहुंचे। स्नान आदि कर तैयार होते दिन के तीन बजे गये। उसी दिन बापदादा आने वाले थे। साथ वाली बहन कहने लगी, अरे जल्दी करो, छह बजे तक हमें हॉल में जाना है, आज परमात्मा की पधरामणी होने वाली है।

मुझे तैयार होने में थोड़ी देर हुई क्योंकि मुझे साड़ी पहनने में दिक्कत हो रही थी। आखिर साड़ी पहन ली दूसरों से पछते-पूछते। मैं जाकर स्टेज के पास ही बैठी। दादी गुलज़ार आयीं, उन्होंने भी सबको दृष्टि दी। दादी जी की दृष्टि लेकर मुझे अनुभव हुआ कि यह आत्मा कितनी सात्त्विक है! जब दादी ध्यान में गयीं और बापदादा की पधरामणी हुई तो मैंने देखा, पहले वाले दृश्य और अभी के दृश्य में कितना अन्तर है। मुझे अनुभव हो रहा था कि परमात्मा की उपस्थिति मेरे सामने है। मुझे शिव बाबा भी दिखायी पड़ रहे थे और ब्रह्मा बाबा भी। बाबा की दृष्टि जब मेरे ऊपर पड़ी तो वहीं रुक गयी और बाबा बहुत देर तक मुझे दृष्टि देते रहे। मुझे तो ऐसा लगा जैसे कि मेरे में करंट बह रहा है। मुझे यह निश्चय पक्का हो गया कि बाबा मुझे अच्छी रीति जानता है और मैं भी उसको। मन कह उठा, ‘बाबा मैं आपकी हूँ, आप मेरे हो।’ उन दिनों, बाबा एक-एक को व्यक्तिगत रूप से वरदान देते थे। बाबा ने मुझे वरदान दिया कि ‘आपके मस्तक में विजय का तिलक सदा के लिए लगा हुआ है। यही तिलक आपको बहुत-बहुत जन्मों तक राजाई का तिलक दिलायेगा।’ उस समय तो मुझे इसका अर्थ समझ में नहीं आया। केवल मैं बाबा के वायब्रेशन्स कैच कर रही थी। बाबा सब भाई-बहनों को दृष्टि और वायब्रेशन्स द्वारा इतना प्यार दे रहे थे कि उसको देख मेरे प्रेम के आँसू बह रहे ये। मैंने अनुभव किया कि बाबा प्रेम का सागर है, प्रेम की प्यासी हर आत्मा को प्रेम से भरपूर कर देता है। 

प्रश्नः जब आप कोर्स ले रही थीं, उस समय का क्या अनुभव था?

उत्तरः कोर्स लेते समय मुझे कोई दिक्कत नहीं हुई। यह ज्ञान नया होते हुए भी मुझे कोई आपत्ति नहीं उठी। क्योंकि उस समय मैं ‘चेतना’ पर ही रिसर्च कर रही थी। मुझे पक्का हो गया था कि मैं यह शरीर नहीं हूँ। लेकिन क्या हूँ यह पता नहीं पड़ रहा था। जब आत्मा का पाठ दिया गया तो मुझे अच्छा लगा, सच्चा लगा। परमात्मा के पाठ पर भी मुझे कोई दिक्कत नहीं आयी क्योंकि बचपन में जब मैं जीसस से बात करती थी, साथ में ज्योति स्वरूप परमात्मा को भी देखती थी। इसलिए ईश्वरीय ज्ञान को समझने में मुझे कोई मुश्किल नहीं हुई। चक्र का ज्ञान मुझे जल्दी समझ में नहीं आया लेकिन मुझे कोई आपत्ति नहीं थी। मैंने अपने लौकिक जीवन में, कई प्रतिष्ठित व्यक्तियों के साथ काम किया है, उनके साथ प्रोग्राम दिया है परन्तु उनसे मैं कभी प्रभावित नहीं हुई। लेकिन ब्रह्माकुमारियों की सादगी, उनके रूहानियत भरे व्यवहार, उनके अन्दर-बाहर की सफाई ने मुझे बहुत ही प्रभावित किया और मुझे अन्य संस्थाओं से ये विशेष लगी। 

उन दिनों गीता बहन की इंग्लिश उतनी अच्छी नहीं थी लेकिन मुझे उससे कोई मतलब नहीं था, वे जो ज्ञान सुना रही थीं, उनका जो व्यक्तित्व तथा व्यवहार था, उसने मुझे बहुत आकर्षित किया। थोड़े दिनों के बाद वहाँ दादी जानकी जी आयीं। उस समय मेरे पास चक्र के बारे में ढेर सारे प्रश्न थे। मैं उनसे पूछना चाहती थी लेकिन जब दादी जानकी को देखा तो मेरे सारे प्रश्न खत्म हो गये और यह पक्का निश्चय हुआ कि जीवन है तो यही है, मुझे भी इन जैसी बनना है। दादी जानकी से मिलने के बाद ही मैं ज्ञान का अच्छी तरह से अध्ययन करने लगी। मुरली क्लास के बाद रोज़ मैं बाबा के कमरे में एक घंटा मेडिटेशन करती थी। मेडिटेशन मुझे बहुत अच्छा लगता था। 

प्रश्नः अभिनेत्री बनने का आपका क्या लक्ष्य था?

उत्तरः दुनियावी एक्टरों जैसे नामी गिरामी बनने का, धन तथा प्रतिष्ठा कमाने का, इससे ज़्यादा अभिनय द्वारा समाज को मूल्य तथा नैतिकता का सन्देश पहुंचाने का। मेरे हर प्रदर्शन में लोगों के लिए कुछ न कुछ सन्देश रहता था, मेरी अनुभूति तथा दिल की आवात रहती थी। अमेरिका का जीवन बहुत पेचीदा होता है। जीवन बहुत व्यस्त होता है। ज़रूरत से ज़्यादा भौतिक सुख-सुविधा, अथाह धन-दौलत, अति सोचना इत्यादि से परिवार वालों के साथ बैठने के लिए समय का अभाव रहता है। आपस में पारिवारिक सम्बन्ध तथा प्रेम न होने के कारण जीवन सूखा-सूखा तथा निस्सार लगता है। मैं अपने अभिनय के व्यवसाय द्वारा सत्य को जानने की कोशिश करती थी, लोगों को जानना चाहती थी, जीवन का उद्देश्य ढूंढ़ती थी। 

एक तरह से यह मेरी भक्ति ही थी। ईश्वरीय ज्ञान मिलते ही अभिनय की मेरी भक्ति पूरी हो गयी। मैंने एक्टिंग करना छोड़ दिया। पाँच साल के बाद, जब राष्ट्रीय कार्यक्रम होने लगे तो मैं फिर से अपने रंगमंच के व्यवसाय में आ गयी। बच्चों को नाटक सिखाना, डान्स सिखाना, गीत-संगीत सिखाना आरम्भ किया। अमेरिका के भारतीय कार्यक्रमों में हम भाग लेते रहे। मैंने हिन्दी गीत भी गाना शुरू किया, भारतीय खाना बनाना भी सीख लिया।

प्रश्नः ईश्वरीय ज्ञान में आने के बाद आपके परिवार वालों पर क्या असर पड़ा?

उत्तरः ज्ञान में आते ही मैंने रंगमंच का काम छोड़ दिया। इसके कारण सबसे पहले मेरे परिवार वाले बहुत नाखुश हो गये। वे नहीं चाहते थे कि मैं एक्टिंग छोड़ दूँ। क्योंकि सैन फ्रैन्सिस्को में मेरा बहुत नाम था। परिवार के लिए यह बड़ी कीर्ति थी, मैंने तुरन्त उसको छोड़ दिया तो उनको अच्छा नहीं लगा। फिर भी उन्होंने विरोध नहीं किया। मेरे भाई, मेरी बहनें और मेरी माँ सब बाबा के घर आये और कोर्स भी किया है। वे रेगुलर स्टूडेण्ट नहीं हैं लेकिन बाबा के अच्छे सहयोगी हैं। बाबा के घर के सम्पर्क में हैं। अभी परिवार वालों को बहुत नाज़ है कि हमारे घर की एक लड़की ‘नॅन’ बन गयी है। अभी वे मुझे देख बहुत खुश होते हैं। 

प्रश्नः बाबा के साथ किस सम्बन्ध को आप पसन्द करती हैं?

उत्तरः बाबा के साथ मेरे प्रिय सम्बन्ध हैं, पिता का, पुत्र का तथा मित्र का। कई विदेश के लोग सम्बन्धयुक्त मेडिटेशन पसन्द नहीं करते लेकिन मुझे बहुत पसन्द है। बाबा के साथ मेरा पिता-पुत्री का सम्बन्ध बहुत सशक्त रहता है। ज्ञान में आकर सात साल होने तक मुझे परमात्मा को बच्चे के रूप में याद करना अच्छा नहीं लगता था। इतनी बड़ी अथॉरिटी, उसको कैसे मैं अपना बच्चा बनाऊँ। एक दिन मैं लाइब्ररी में बैठी थी, उस समय 10.30 बजा था, ट्रैफिक कण्ट्रोल करने लगी। मुझे ज्योति स्वरूप बाबा दिखायी पड़े तथा मन में आया कि आज बाबा को बच्चे के रूप में याद करें। तुरन्त मुझे अनुभव होने लगा कि एक छोटा-सा बच्चा, मुस्कराते हुए मेरे पास आया और मेरी गोद में बैठकर मेरे गालों पर हाथ फेरता रहा। वह एक अ‌द्भुत अनुभव था। खुशी से आँसू बह रहे थे। बाबा, पिता बनकर भी प्यार देता है और उसको बच्चा बनायेंगे तो बच्चा बनकर भी प्यार देता है। बाबा के प्रेम का अनुभव करने में मुझे समय लगा क्योंकि क्रिश्चियानिटी में गॉड सज़ा देने वाला होता है। लेकिन मुझे ईश्वरीय ज्ञान पाने के बाद, मेडिटेशन करते-करते अनुभव हुआ कि गॉड सज़ा देने वाला नहीं, निःस्वार्थ प्यार देने वाला है, वह प्रेम का सागर है, बच्चों की ग़लतियों को क्षमा कर, सुख-शान्ति देने वाला भोलानाथ है। बाबा को बच्चे के रूप में स्वीकार करने के बाद बाबा के साथ मेरे सम्बन्ध बहुत सुधर गये, मेरा दृष्टिकोण बदल गया। मेरे में जो युवावस्था की भावना थी, वो कम होते-होते मेरे में जगत्‌माता के संस्कार इमर्ज हुए। 

प्रश्नः आपको शाकाहारी बनने में कोई तकलीफ़ हुई?

उत्तरः नहीं। मैं पहले से ही शाकाहारी थी। मैं जानवरों से बहुत प्यार करती थी। हिंसा तो मुझे बिल्कुल पसन्द नहीं थी।

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