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13 Jan 1978
“इन्तजार के पहले इन्तजाम करो”
13 January 1978 · हिंदी
बाप बच्चों को देख सदा हर्षित होते हैं। हरेक बच्चा वर्तमान समय में विश्व की सर्व आत्माओं में श्रेष्ठ है और भविष्य में भी विश्व द्वारा पूज्यनीय है। ऐसे सर्व श्रेष्ठ गायन और पूजन योग्य योगी तू आत्मायें, ज्ञानी तू आत्मायें, दिव्य-गुणधारी, सदा विश्व के सेवाधारी बाप-दादा के सदा स्नेह और सहयोग में रहने वाले, ऐसे बच्चों को देख बाप को कितनी खुशी होती है! नम्बरवार होते हुए भी लास्ट नम्बर का मणका भी विश्व के आगे महान है। ऐसे अपनी महानता को, अपनी महिमा को जानते हुए चलते रहते हो? या चलते-चलते अपने को साधारण समझ लेते हो? अलौकिक बाप द्वारा प्राप्त हुई अलौकिक जीवन, अलौकिक कर्म साधारण नहीं हैं। लास्ट नम्बर के मणके को भी आज अन्त तक भक्त आत्मायें आंखों पर रखती हैं क्योंकि लास्ट नम्बर भी बापदादा के नयनों के तारे हैं। नूरे रत्न हैं। ऐसे नूरे रत्न को अब तक भी नयनों पर रखा जाता है। अपने श्रेष्ठ भाग्य को जानते हुए, वर्णन करते हुए अनजान नहीं बनो। एक बार भी मन से, सच्चे दिल से अपने को बाप का बच्चा निश्चय किया तो उस एक सेकेण्ड की महिमा और प्राप्ति बहुत बड़ी है। डायरेक्ट बाप का बच्चा बनना - जानते हो कितनी बड़ी लाटरी है। एक सेकण्ड में नाम संस्कार शूद्र से ब्राह्मण हो जाता है। संसार बदल जाता, संस्कार बदल जाते, दृष्टि, वृत्ति, स्मृति सब बदल जाता एक सेकेण्ड के खेल में। ऐसा श्रेष्ठ सेकेण्ड भूल जाते हो। दुनिया वाले अब तक नहीं भूले हैं। आप आत्मायें चक्कर लगाते बदल भी गई लेकिन दुनिया वाले नहीं भूले। अभी आप सबका भाग्य वर्णन करते इतने खुश होते हैं। समझते हैं भगवान ही मिल गया। जब दुनिया वाले नहीं भूले हैं, आप स्वयं अनुभवी मूर्त तो सर्व प्राप्ति करने वाली आत्मायें हो, फिर भूल क्यों जाते हो? भूलना चाहिए नहीं लेकिन भूल जाते हो?
इस नये वर्ष में बापदादा को कौन-सी नवीनता दिखायेंगे। जो समय दिया हुआ था उस प्रमाण तो सब सम्पूर्ण ही दिखाई देने चाहिए। लक्ष्य प्रमाण सर्व ब्राह्मण आत्माओं का अपना पुरुषार्थ सम्पन्न होना चाहिए। आप तो परिवर्तन के लिए तैयार हो ना! अब जो समय मिला है वह ब्राह्मणों के स्वयं के पुरुषार्थ के लिए नहीं है लेकिन हर संकल्प, हर बोल द्वारा दाता के बच्चे विश्व की आत्माओं प्रति प्राप्त हुए खजानों को देने अर्थ है। यह एक्स्ट्रा टाइम स्वयं के पुरुषार्थ प्रति नहीं लेकिन दूसरों के प्रति समय, गुण और खजाना देने के लिए है। बाप ने जिस कार्य के लिए समय और खजाना दिया है अगर उसके बदले स्वयं प्रति समय और सम्पत्ति लगाते हो तो यह भी अमानत में ख्यानत होती है। यह विशेष वर्ष ब्राह्मण आत्माओं के प्रति महादानी वरदानी बनने का है। जैसे आप लोग प्रोग्राम बनाते हो कि इस मास में विशेष योग का प्रोग्राम होगा, दूसरे मास में विशेष सेवा का होगा। वैसे ड्रामा प्लैन अनुसार यह एक्स्ट्रा समय महादानी बनने के लिए मिला है। अब तक पुरानी भाषा, पुरानी बातें, पुरानी रीति रसम वह अच्छी रीति सब जानते हो। इस वर्ष का समय इसके लिए नहीं है। जैसे बाप के आगे स्वयं को समर्पण किया वैसे अब अपना समय और सर्व प्राप्तियाँ, ज्ञान, गुण और शक्तियाँ विश्व की सेवा अर्थ समर्पण करो। जो संकल्प उठता है तो चेक करो कि विश्व सेवा प्रति है? ऐसे सेवा प्रति अर्पण होने से स्वयं सम्पन्न सहज हो जायेंगे। जैसे जब कोई सेवा का विशेष प्रोग्राम बनाते हो तो विशेष कार्य में बिजी होने के कारण स्वयं के आराम या स्वयं के प्रति सैलवेशन देने वाली बातें या चलते-चलते अन्य आत्माओं द्वारा आई हुई छोटी-छोटी परीक्षाओं को अटेन्शन नहीं देते हो, अवाइड करते हो क्योंकि सदा कार्य को सामने रखते हो और बिजी रहते हो। स्वयं प्रति समय न लगाकर सेवा में विशेष लगाते हो। ऐसे ही इस नये वर्ष में हर सेकेण्ड और संकल्प को सेवा प्रति समझने से, इस कार्य में बिजी होने से परीक्षाओं को पास ऐसे करेंगे जैसे कुछ है ही नहीं। संकल्प में भी नहीं आयेगा कि यह बात क्या थी और क्या हुआ। स्वयं को समर्पण करने से इस सेवा की लगन में यह छोटे बड़े पेपर्स या परीक्षायें स्वत: ही समर्पण हो जायेंगी। जैसे अग्नि के अन्दर हर वस्तु का नाम रुप बदल जाता है वैसे परीक्षा का नाम रूप बदल परीक्षा प्राप्ति का रूप बन जायेंगी। माया शब्द से घबरायेंगे नहीं, सदा विजयी बनने की खुशी में नाचते रहेंगे। माया को अपनी दासी अनुभव करेंगे तो दासी सेवाधारी बनेंगी या उससे घबरायेंगे? स्वयं सरेण्डर हो जाओ सेवा में तो माया स्वत: ही सरेण्डर हो जायेगी। लेकिन सरेण्डर नहीं होते हो तो माया भी अच्छी तरह से चान्स लेती है। चान्स लेने के कारण ब्राह्मणों का भी चान्सलर बन जाती है। माया को चान्सलर बनने नहीं दो। स्वयं सेवा का चान्स ले चान्सलर बनो। अब सुना समय क्यों मिला है? अब कोई कम्पलेन नहीं करना। समय के हिसाब से हरेक को कम्पलीट होना है। कम्पलीट आत्मा कभी कम्पलेन नहीं करती है। हो ही जाता, होता ही है, यह भाषा नहीं बोलती। नया वर्ष, नई भाषा, नया अनुभव। पुरानी चीज़ सम्भालना अच्छा लगता है लेकिन यूज करना अच्छा नहीं होता। तो आप यूज़ क्यों करते हो? 5000 वर्ष के लिए सम्भाल कर रख दो। पुराने से प्रीत नहीं रखो
सदैव भक्त आत्माओं, भिखारी आत्माओं और प्यासी आत्माओं के सामने अपने को साक्षात बाप और साक्षात्कार मूर्त समझकर चलो। तीनों ही लाइन लम्बी है। इस क्यू को समाप्त करने में लग जाओ। प्यासी आत्माओं की प्यास बुझाओ। भिखारियों को दान दो। भक्तों को भक्ति का फल बाप के मिलने का मार्ग बताओ। इस क्यू को सम्पन्न करने में बिजी रहेंगे तो स्वयं के प्रति क्यों की क्यू समाप्त हो जायेगी। समय की इन्तजार में नहीं रहो लेकिन तीनों प्रकार की आत्माओं को सम्पन्न बनाने के इन्तजाम में रहो। अब तो नहीं पूछेंगे कि विनाश कब होगा। क्यू को समाप्त करो तो परिवर्तन का समय भी समाप्त हो जायेगा। संगम का समय सतयुग से श्रेष्ठ नहीं लगता है? थक गये हो क्या? जब पूछते हो विनाश कब होगा तो थके हुए हो तब तो पूछते हो। बाप का बच्चों के प्रति अति स्नेह है। बाप को यह मेला अच्छा लगता है। और बच्चों को स्वर्ग अच्छा लगता है। स्वर्ग तो 21 जन्म मिलेगा ही लेकिन यह संगम नहीं मिलेगा। तो थक मत जाओ। सेवा में लग जाओ तो प्रत्यक्ष फल अनुभव करेंगे। भविष्य फल तो आपका निश्चित है ही लेकिन प्रत्यक्ष फल का अनुभव सुख सारे कल्प में नहीं मिलेगा। इसलिए भक्तों की पुकार सुनो, रहमदिल बनो, महादानी बन, महान पुण्यात्मा का पार्ट बजाओ। अच्छा।
ऐसे बाप के फरमानबरदार दृढ़ संकल्प और सेकेण्ड में आज्ञाकारी, बाप समान सदा विश्व के कल्याणकारी महादानी, महान वरदानी सर्व को सम्पन्न करने वाले, सदा स्वयं को सेवा में तत्पर करने वाले ऐसे बाप समान बच्चों को बापदादा का याद-प्यार और नमस्ते।
दीदी जी से बातचीत:-
सबको एक बात का इन्तजार है, वह कौन सी बात है? जो शुरू की पहेली है मैं कौन? वही लास्ट तक भी है। सबको इन्तजार है आखिर भी भविष्य में मैं कौन या माला में कहाँ? अब यह इन्तजार कब पूरा होगा? सब एक दो में रुह-रुहान भी करते हैं 8 में कौन होंगे, 100 में कौन होंगे, 16000 का तो कोई सवाल ही नहीं। आखिर भी 8 में या 100 में कौन होंगे? विदेशी सोचते हैं हम कौन-सी माला में होंगे और शुरु में आने वाले फिर सोचते हैं लास्ट सो फास्ट हैं। ना मालूम हमारा स्थान है या लास्ट वालों का है? आखिर हिसाब क्या है? किताब तो बाप के पास है ना। फिक्स नहीं किये गये हैं। आप लोगों ने भी आर्ट काम्पीटीशन की तो चित्र कैसे चुना। पहले थोड़े अलग किये फिर उसमें से एक, दो, तीन नम्बर लगाया। पहले चुनने होते हैं फिर नम्बरवार फिक्स होते हैं। तो अब चुने गये हैं लेकिन फिक्स नहीं हुए हैं। (पीछे आने वालों का क्या होगा) सदैव कुछ सीट्स अन्त तक भी होती हैं। रिजर्वेशन होती है तो भी लास्ट तक कुछ कोटा रखते हैं लेकिन वह कोटों में कोई, कोई में भी कोई होता है।
अच्छा आप सब किस माला में हो? अपने में उम्मीद रखो। कोई न कोई ऐसी वन्डरफुल बात होगी जिनके आधार पर आप सबकी उम्मीदें पूरी हो जायेंगी। अष्ट रत्नों की विशेषता एक विशेष बात से है। अष्ट रत्न प्रैक्टिकल में जैसे यादगार हैं विशेष तो जो अष्ट शक्तियाँ हैं वह हर शक्ति उनके जीवन में प्रैक्टिकल दिखाई देगी। अगर एक शक्ति भी प्रैक्टिकल जीवन में कम दिखाई देती है तो जैसे अगर मूर्ति की एक भुजा खण्डित हो तो पूज्यनीय नहीं होती, उसी प्रकार से अगर एक शक्ति की भी कमी दिखाई देती तो अष्ट देवताओं की लिस्ट में अब तक फिक्स नहीं कहे जायेंगे। दूसरी बात अष्ट देवतायें भक्तों के लिए विशेष इष्ट माने जाते हैं। इष्ट अर्थात् महान पूज्य। इष्ट द्वारा हर भक्त को हर प्रकार की विधि और सिद्धि प्राप्त होती है। यहाँ भी जो अष्ट रतन होंगे वह सर्व ब्राह्मण परिवार के आगे अब भी इष्ट अर्थात् हर संकल्प और चलन द्वारा विधि और सिद्धि का मार्ग दर्शन करने वाले सबके सामने अब भी ऐसे ही महानमूर्त माने जायेंगे। तो अष्ट शक्तियाँ भी होंगी और परिवार के सामने इष्ट अर्थात् श्रेष्ठ आत्मा, महान आत्मा, वरदानी आत्मा के रुप में होंगे। यह है अष्ट रतनों की विशेषता। अच्छा।
मधुबन निवासी भाई-बहनों से :- मधुबन निवासी सभी सदा बाप की याद में लवलीन रहने वाले हो ना। बाप के समान सदा अथक और सदा डबल लाइट स्थिति में स्थित हो ना। जो जितना हल्का होता उतना अथक होता। किसी भी प्रकार का बोझ थकाता है। जैसे शरीर के बोझ वाला भी थक जाता, हल्का थकता नहीं। ऐसे किसी भी प्रकार का बोझ चाहे मनसा का हो, चाहे सम्पर्क, संबंध का हो, लेकिन बोझ थकावट में लायेगा। मधुबन निवासियों को अथक भव का वरदान मिला हुआ है। तो अथक हो ना? और भी मेला चले? जितना आगे चलेंगे उतना यह मेला बड़ा ही होगा, कम नहीं जितना बढ़ाते जायेंगे उतना ही बढ़ता जायेगा। कितना भी प्लैन बनाओ, जितना बनायेंगे उतना बढ़ता ही जायेगा क्योंकि संगम पर ही ईश्वरीय परिवार की वृद्धि होती है। जितना समय कम उतनी वृद्धि ज्यादा। यह तो नहीं समझते और बहुत आ जायेंगे तो हम रह जायेंगे। जो खुद त्यागीमूर्त बनते उनके लिए स्वत: ही ख्याल रहता है। तो आप लोग तो निष्कामी थे ना। जितना हर कामना से न्यारे रहेंगे उतना हर कामना सहज पूरी होती जायेगी। खुशी में, प्राप्ति में थकावट नहीं होती। मधुबन निवासियों को पुरुषार्थ की नई युक्तियाँ निकालनी चाहिए। जो सब फॉलो करें। नया वर्ष शुरू हुआ तो नई बात निकालनी चाहिए। सहज पुरुषार्थ की नई इन्वेन्शन निकालो और प्रैक्टिकल अनुभव करके दूसरों को सुनाओ। सर्व आत्मायें आपको ऊंची नजर से देखती हैं। जैसे आकाश के ऊपर चमकते हुए सितारों को ऊंची नज़र से देखते वैसे आप सबको सर्वश्रेष्ठ महान, लकीएस्ट, समीप आत्माओं की नज़र से देखते हैं। तो जिस नज़र से देखते उसी में स्थित रहो। आपका उठना, बैठना, चलना सभी चरित्र के रुप में देखते हैं। जैसे बाप के हर कर्तव्य को आपने चरित्र रुप में देखा ना। तो हर कर्म करते चरित्रवान होकर चलना पड़े, साधारण नहीं। मधुबन विश्व के आगे स्टेज है। स्टेज पर जो एक्टर होता उसका हर एक्ट पर कितना अटेन्शन रहता है। हाथ उठायेगा तो भी अटेन्शन से क्योंकि उसे मालूम है कि हमें सब देखने वाले हैं। आपके हर कार्य का महत्व है। बापदादा भी जितना मधुबन की आत्माओं का महत्व है, उसी महत्व से देखते हैं, अच्छा।
नया प्लैन बनाओ कि स्वत: और सहजयोगी कैसे बने क्योंकि सभी इस वर्ष में यही लक्ष्य रख करके चल रहे हैं कि अब लास्ट में सहजयोग और स्वत: योग का अनुभव जरूर होना चाहिए। तो सहजयोग किस आधार पर होता या स्वत: योगी किस युक्ति से बन सकते? यह प्लान निकालो और अनुभव करो फिर सभी को सुनाओ तो आपके गुणगान करेंगे। मेहनत कम और सफलता ज्यादा, ऐसे नये पुरुषार्थ के तरीके बनाओ। प्लान ऐसा तैयार करो, जिसको देख सब मधुबन निवासियों को थैंक्स दें। अच्छा।
पार्टियों से:-
1\. दुनिया के वायब्रेशन से अथवा माया से सेफ रहने का साधन
सदा एक बाप दूसरा न कोई इसी लगन में मगन रहते वह माया के हर प्रकार के वार से बचे रहते हैं। जैसे जब लड़ाई के समय बॉम्ब्स गिराते हैं तो अण्डरग्राउण्ड हो जाते हैं, तो उसका असर उनको नहीं होता तो ऐसे ही जब एक लगन में मगन रहते तो दुनिया के वायब्रेशन से, माया से बचे रहेंगे, सदा सेफ रहेंगे। माया की हिम्मत नहीं जो वार करे। लगन में मगन रहो। यही है सेफ्टी का साधन।
2\. बाप के समीप रतनों की निशानी
बाप के समीप रहने वालों के ऊपर बाप के सत के संग का रंग चढ़ा हुआ होगा। सत के संग का रंग है रूहानियत। तो समीप रतन सदा रूहानी स्थिति में स्थित होंगे। शरीर में रहते हुए न्यारे, रूहानियत में स्थित रहेंगे। शरीर को देखते हुए भी न देखें और आत्मा जो न दिखाई देने वाली चीज़ है वह प्रत्यक्ष दिखाई दे, यही तो कमाल है। रूहानी मस्ती में रहने वाले ही बाप को साथी बना सकते हैं क्योंकि बाप रुह है।
3\. पुरानी दुनिया के सर्व आकर्षणों से परे होने की सहज युक्ति
सदैव नशे में रहो कि हम अविनाशी खजाने के मालिक हैं। जो बाप का खज़ाना ज्ञान, सुख, शान्ति, आनंद है... वह सर्व गुण हमारे हैं। बच्चा बाप की प्रापर्टी का स्वत: ही मालिक होता है। अधिकारी आत्मा को अपने अधिकार का नशा रहता है, नशे में सब भूल जाता है ना। कोई स्मृति नहीं होती, एक ही स्मृति रहे बाप और मैं - इसी स्मृति से पुरानी दुनिया की आकर्षण से आटोमेटिकली परे हो जायेंगे। नशे में रहने वाले के सामने सदा निशाना भी स्पष्ट होगा। निशाना है फरिश्तेपन का और देवतापन का।
4\. एक सेकेण्ड का वन्डरफुल खेल, जिससे पास विद् ऑनर बन जायें
एक सेकेण्ड का खेल है अभी-अभी शरीर में आना और अभी-अभी शरीर से अव्यक्त स्थिति में स्थित हो जाना। इस सेकेण्ड के खेल का अभ्यास है? जब चाहो जैसे चाहो उसी स्थिति में स्थित रह सको। अन्तिम पेपर सेकेण्ड का ही होगा, जो इस सेकण्ड के पेपर में पास हुआ वही पास विथ ऑनर होगा। अगर एक सेकेण्ड की हलचल में आया तो फेल, अचल रहा तो पास। ऐसी कन्ट्रोलिंग पावर है? अभी ऐसा अभ्यास तीव्र रूप का होना चाहिए। जितना हंगामा हो उतना स्वयं की स्थिति अति शान्त। जैसे सागर बाहर आवाज सम्पन्न होता, अन्दर बिल्कुल शान्त, ऐसा अभ्यास चाहिए। कन्ट्रोलिंग पावर वाले ही विश्व को कन्ट्रोल कर सकते हैं। जो स्वयं को नहीं कर सकते वह विश्व का राज्य कैसे करेंगे। समेटने की शक्ति चाहिए। एक सेकेण्ड में विस्तार से सार में चले जायें और एक सेकेण्ड में सार से विस्तार में आ जायें यही है वन्डरफुल खेल।
5\. अतीन्द्रिय सुख के झूले में झूलते रहो, आपको सभी आत्मायें सुख में झूलता देख दुखी से सुखी बन जायें। आपके नयन, मुख चेहरा सब सुख दें, ऐसा सुखदायी बनो। ऐसा सुखदाई जो बनता उसे संकल्प में भी दु:ख की लहर नहीं आ सकती। अच्छा।
6\. मधुबन में हर कदम में सहज कमाई का अनुभव होता है। मधुबन को वरदान भूमि कहा है। तो वरदान सहज प्राप्ति को ही कहा जाता है। तो मधुबन में आने से ही मेहनत करना समाप्त हो जाता और सहज प्राप्ति होना शुरू हो जाती। तो इस थोड़े से समय में कितनी कमाई की? मधुबन में आना अर्थात् कमाई की खान इकट्ठी करना। तो ऐसा महत्व जानते हुए थोड़े से समय में खजाना जमा किया क्योंकि मधुबन है ही डायरेक्ट बापदादा की कर्मभूमि, चरित्रभूमि, सेवाभूमि, तपस्या भूमि। यहाँ तपस्या का वायब्रेशन, वायुमण्डल है। यह सब बातें इस भूमि में आने से सहज अनुभव कर सकते हैं। जैसे कोई विशेष कमाई की सीजन होती, तो कमाई के बगैर रह नहीं सकते। नींद का भी समय त्याग देते। तो मधुबन में एक्स्ट्रा लॉटरी है कमाई करने की। तपस्वी कुमार हो ना। तपस्वी की तपस्या सिर्फ बैठने के समय नहीं, तपस्या अर्थात् लगन, चलते-फिरते भोजन करते भी लगन है ना। एक की याद में, एक के साथ में भोजन स्वीकार करना यह तपस्या हुई ना। जो भी चान्स मिलता है उसको अच्छी तरह लेकर सम्पन्न बनो और दूसरों को भी बनाओ।
7\. ज्ञान सागर के बच्चे सदा ज्ञान रत्नों से ही खेलते रहते हो? सबसे बड़े से बड़े, अविनाशी रत्न ज्ञान रत्न हैं। ज्ञान सागर के बच्चे ज्ञान रत्नों से खेलेंगे। आधाकल्प पत्थर बुद्धि रहे और पत्थरों से खेला, इसलिए दु:ख-अशान्ति रही। आप किससे खेलते? ज्ञान रत्नों से। जैसे राजा के बच्चे, सोने-चांदी के खिलौने से खेलते हैं तो ज्ञान सागर के बच्चे सदा ज्ञान रत्नों से खेलते हैं। ज्ञान रत्नों में खेलने से दु:ख अशान्ति की लहर नहीं आयेगी। ज्ञान रत्न भी हैं, तो नालेज भी। नालेज के आधार पर दु:ख अशान्ति की लहर आ नहीं सकती। अभी नया जीवन है, दु:ख, अशान्ति की जीवन ऐसे लगेगी - मेरी नहीं, दूसरे की जीवन थी। बीते हुए जीवन पर हँसी आयेगी।
8\. सभी सन्तुष्ट-मणियाँ हो ना। मणि सदैव मस्तक के बीच में चमकती है। ताज के अन्दर सुन्दर मणियाँ होती हैं। तो जो सन्तुष्ट मणि हैं वह सदैव बाप के मस्तक में रहती हैं अर्थात् बाप की याद में रहती हैं। बाप भी उनको याद करते। जब बच्चे बाप को याद करते तो बाप भी रिटर्न देते हैं। सदा बाप की याद में रहने वाले हर परिस्थिति में भी सन्तुष्ट रहेंगे। चाहे परिस्थिति असन्तोष की हो, दु:ख की घटना हो लेकिन सदा सुखी। दु:ख की परिस्थिति में सुख की स्थिति एकरस हो। नालेज की शक्ति के आधार पर परिस्थिति जो पहाड़ के मुआफिक है वह भी राई अनुभव होगी अर्थात् कुछ नहीं क्योंकि नथिंग न्यु है। ऐसी स्थिति है? कुछ भी हो जाये, नथिंग न्यु - इसको कहा जाता है महावीर।
9\. अपने को पद्मापदम भाग्यशाली समझते हो? हर कदम में पदमों की कमाई जमा हो रही है। ऐसे अनगिनत पदमों का मालिक अनुभव करते हो। सारी सृष्टि के अन्दर ऐसा अपना श्रेष्ठ भाग्य बनाने वाले कोटों में कोई हैं ना। जो गायन है कोटों में कोई, कोई में कोई यह हम आत्माओं का गायन है क्योंकि साधारण रूप में आये हुए बाप को और बाप के कर्तव्य को जानना, यह कोटों में कोई का पार्ट है। जान लिया, मान लिया और पा लिया। जब विश्व का मालिक अपना हो गया तो विश्व अपनी हो गई ना। जैसे बीज अपने हाथ में है तो वृक्ष तो है ही ना। जिसको ढूँढते थे उसको पा लिया। घर बैठे भगवान मिला, तो कितनी खुशी होनी चाहिए। भगवान ने मुझे अपना बनाया, इसी खुशी में रहो तो कहीं भी आंख नहीं डूबेगी। सामने देखते भी नज़र नहीं जायेगी। बाप मिला सब कुछ मिला, यही सबसे बड़ी खुशी है, इसी खुशी में मन से नाचते रहो। इससे बड़ी खुशी की बात है ही क्या? इसलिए गायन है अतीन्द्रिय सुख पूछना हो तो गोप-गोपियों से पूछो।
10\. सदा अपने को खुशनसीब समझते हो? सारे विश्व के अन्दर सबसे श्रेष्ठ नसीब अर्थात् तकदीर हमारी है, ऐसा निश्चय रहता है? हमारे जैसा खुशनसीब और कोई हो नहीं सकता। बाप ने स्वयं आकर अपना बनाया, इस भाग्य का वर्णन करते सदा खुशी में नाचते रहो। उन्हों का नसीब क्या होगा! अभी-अभी सुख होगा, अभी-अभी दु:ख होगा, लेकिन आपका नसीब अविनाशी है। सदा ऐसे आनन्द स्वरूप नसीब वाले हो। जो स्वप्न में भी नहीं था वह प्राप्ति हो गई, बाप मिला सबकुछ मिला। इसी खुशी में रहो तो सदा समर्थी स्वरूप रहेंगे।
11\. सबसे श्रेष्ठ ब्राह्मण जीवन गाया हुआ है, ब्राह्मणों का नाम भी ऊंचा और काम भी ऊंचा और स्थिति भी ऊंची। जैसे ब्राह्मणों की महिमा ऊंची है वैसे अपने को सच्चे ब्राह्मण अर्थात् ऊंची स्थिति वाले अनुभव करते हो? ऊंचे ते ऊंचा बाप और ऊंचे ते ऊंचे आप। बाप और आप दोनों ऊंचे इस स्मृति में रहो तो कर्म और संकल्प ऑटोमेटिक ऊंचे रहेंगे। योग अग्नि से पुराने खाते भस्म करो। ऐसी अग्नि तेज हो जो व्यर्थ का नाम-निशान ही खत्म हो जाए। संगम पर पुराना खाता खत्म कर नया चालू करना है। अगर पुराना खाता भी चलता रहे तो जो प्राप्ति होनी चाहिए खुशी की वह नहीं होगी। अभी-अभी कमजोर, अभी समर्थ होंगे। बाप सदा समर्थ है तो बच्चों को भी सदा समर्थ बनना है। अच्छा।
12\. सदैव स्वयं को सर्वश्रेष्ठ महान आत्मा समझते हो। महान आत्मा जिसकी स्मृति से स्वत: ही हर संकल्प और हर कर्म महान अथवा सर्वश्रेष्ठ होते हैं। जैसे आजकल की दुनिया में अल्पकाल की पोज़ीशन वाली आत्मायें अपने पोज़ीशन की स्मृति में रहने के कारण दिन-रात स्वत: ही उसी नशे में रहती हैं। वैसे बाप द्वारा मिली हुई पोज़ीशन को स्मृति में रखना सहज और स्वत: है। जैसी पोज़ीशन है वैसा ही कर्म, जैसा नाम वैसा ही श्रेष्ठ कर्म भी है इसलिए वर्तमान समय सहजयोगी के साथ कर्मयोगी भी कहलायेंगे। कर्मयोगी अर्थात हर कर्म द्वारा बाप से स्नेह और सम्बन्ध का हर आत्मा को साक्षात्कार होगा। जैसे हद की आत्माओं से स्नेह रखने वाली आत्मा का उनके चेहरे और झलक से दिखाई देता है कि कोई से स्नेह में लवलीन है। ऐसे अपने आप से पूछो कि हर कर्म बाप के साथ स्नेही आत्मा का अनुभव कराता है। इसको ही कहा जाता है कर्मयोगी। कर्मयोगी की या सहज राजयोगी की परिभाषा बड़ी गुह्य है। कर्मयोगी या सहज राजयोगी का हर संकल्प बाप के स्नेह के वायब्रेशन फैलाने वाले होंगे। जैसे जड़ चित्र भी शान्ति के अल्पकाल के सुख के वायब्रेशन अब तक भी आत्माओं को देने का कार्य कर रहे हैं तो अवश्य चैतन्य रूप में संकल्प द्वारा, वाणी द्वारा, कर्म द्वारा विश्व में सदा सुख-शान्ति, बाप के स्नेह के वायब्रेशन फैलाने का कर्तव्य किया है। तब जड़ चित्रों में भी शान्ति है। जब साइन्स का यन्त्र गर्मी का या सर्दी का वायब्रेशन वायुमण्डल बना सकते हैं तो मास्टर सर्वशक्तिमान अपने साइलेन्स अर्थात् याद की शक्ति से, अपने लगन की स्थिति द्वारा जो वायुमण्डल अथवा वायब्रेशन फैलाना चाहें वह सब बना सकते हैं। ऐसी प्रैक्टिस करो। अभी-अभी सुख का या शान्ति का वायुमण्डल या शक्ति रूप का वायुमण्डल बना सकते हो। जिस वायुमण्डल के अन्दर जो भी आत्मायें हों वह अनुभव करें कि यहाँ दु:ख से सुख के वायुमण्डल में आ गये हैं। महसूस करें कि यहाँ बहुत सुख प्राप्त हो रहा है। जैसे एयरकण्डीशन में सर्दी व गर्मी का अनुभव करते हैं कि सचमुच गर्मी से ठण्डी हवा में आ गये हैं। ठण्डी से गर्मी में आ गये हैं। ऐसे आपकी चलन और चेहरे द्वारा आपके संकल्प शक्ति द्वारा सुख-शान्ति और शक्ति का अनुभव करें। जैसे एक सेकेण्ड में अन्धकार से रोशनी का अनुभव किया ना। ऐसे आजकल के मनुष्य अपनी शक्ति से अनुभव नहीं कर सकेंगे, लेकिन आप सबको अपनी प्राप्ति के आधार से, याद के आधार से उनको अनुभवी बनाना पड़ेगा। यह है वास्तविक सहज राजयोग या कर्मयोग की परिभाषा। स्वयं प्रति शान्ति का या शक्ति का अनुभव किया यह कोई बड़ी बात नहीं लेकिन अपने याद की शक्ति द्वारा अब विश्व में वायब्रेशन द्वारा वायुमण्डल बनाओ। तब कहेंगे नम्बरवन सहज राजयोगी। सिर्फ स्वयं सन्तुष्ट न रह जाओ। सन्तुष्ट रहना और सर्व को सन्तुष्ट करना है। यह है योगी का कर्तव्य। अच्छा।
बाप द्वारा सदा खुश रहने का साधन मिला हुआ है ना। कैसी भी परिस्थिति हो लेकिन अपने पास साधन हैं तो सदा खुश रहेंगे। सिर्फ बाप को याद करने का साधन ही बहुत बड़ा है। बाबा कहना और खुशी प्राप्त होना। ऐसा साधन सदा यूज़ करते रहो। बाबा शब्द याद करना अर्थात् स्विच ऑन होना। जैसे स्विच ऑन करने से सेकेण्ड में अन्धकार भाग जाता है। ऐसे ही बाबा कहना अर्थात् अन्धकार या दु:ख, अशान्ति, उलझन, उदासी, टेन्शन सबकी सेकेण्ड में समाप्ति हो जाती है, ऐसा मन्त्र बाप ने दिया है। एक शब्द का तो मन्त्र है, सिर्फ बाबा। कैसा भी समय हो यह मन्त्र एक सेकेण्ड में पार कर लेने वाला है। सिर्फ इस मन्त्र को विधिपूर्वक समय पर कार्य में लगाओ। यह एक शब्द का मन्त्र वन्डरफुल जादू करने वाला है। इस एक शब्द के मन्त्र द्वारा जो चाहो वह ले सकते हो। चाहे सुख-शान्ति, चाहे शक्ति, आनन्द जो चाहो सब प्राप्ति कराने वाला मन्त्र है। इसलिए जादू-मन्त्र कहते हैं। बाप तो सदा यही बच्चों के प्रति कामना करते हैं कि बाप समान बेहद के सेवाधारी बनना है। वह सब हैं हद की ज़िम्मेवारियाँ लेकिन बाप की ज़िम्मेवारी है बेहद की। तो बेहद की जिम्मेवारी में बाप समान बनना पड़े ना। जैसे हद की जिम्मेदारी निभाने में समय, शक्ति देनी पड़ती है ना। तो बाप की यह शुभ कामना भी पूरी करनी ही है। अब राजयोगी बनना है। राजयोगी राजराजेश्वर बनेंगे। तो पहली स्टेज है राजयोगी की। राजयोगी बनना कठिन नहीं है। घरबार छोड़ने वाला योगी बनना कठिन होता है। अच्छा।
13\. इस समय दो कार्य साथ-साथ हो रहे हैं। एक तरफ पिछला हिसाब-किताब चुक्तू कर रहे हो और दूसरे तरफ भविष्य और वर्तमान जमा भी कर रहे हो। एक का लाख गुणा जमा होने का समय अभी है। इसलिए सदैव इस बात पर अटेन्शन चाहिए कि हर समय जमा होता है। चुक्तू करते समय भी जमा कर सकते हो। क्योंकि चुक्तू करने का साधन है याद। याद से जमा भी होता और चुक्तू भी होता। ऐसा न हो चुक्तू करने में ही टाइम चला जाये। अगर ट्रस्टी बन चुक्तू करते हो तो भी जमा होता है। विधिपूर्वक कार्य करने से चुक्तू के साथ-साथ जमा भी होगा।
14\. स्वदर्शन चक्रधारी हो ना। स्वदर्शन चक्रधारी सो भविष्य छत्रधारी। अगर स्वदर्शन चक्रधारी नहीं तो छत्रधारी भी नहीं। स्वदर्शन चक्र अनेक व्यर्थ चक्करों को समाप्त कर देता है। स्वदर्शन चक्र के आगे कोई चक्र ठहर नहीं सकता है। सेकेण्ड में समाप्त हो जायेगा। तो अपना अलंकार सदा कायम रखते हो कि कभी थक जाते हो? स्वदर्शन चक्र धारण करना अर्थात् हल्का रहना। हल्की चीज़ जो होती है उसको सदा धारण करना मुश्किल नहीं होगा। स्वदर्शन चक्रधारी बनना ही हल्का बनना है। तो निरन्तर यह चक्कर घूमता रहे। इसको छोड़ना नहीं क्योंकि प्राप्ति का अनुभव है ना।
15\. जितना प्यासी आत्माओं की प्यास बुझाते उतना स्वयं भी तृप्त आत्मा रहते। दूसरों को खुशी देना अर्थात् स्वयं खुश रहना। जैसे दान देने से धन बढ़ता, ऐसे अन्य आत्माओं को खुशी, शान्ति, शक्ति देना नहीं लेकिन भरना है। जब लगन लग जाती है सेवा की, तो सोते हुए भी स्वप्न में भी सेवा करेंगे। स्वप्न में भी सेवा के अच्छे-अच्छे प्लैन आयेंगे, जैसे योग द्वारा टचिंग हुई है। लगन का रिटर्न स्वप्न में भी मिलता, इसको कहा जाता है लगन में मगन। आप बच्चों के लिए ब्राह्मणों का संसार, संसार है बाकी असंसार है। देखते हुए भी नहीं देखते, रहते हुए भी नहीं रहते। इसलिए सेवाधारी के स्वप्न में क्या आयेगा, बाप और सेवा और कुछ है ही नहीं। अच्छा।
16\. माया को एक शब्द से मूर्छित करो - वह कौन-सा शब्द? ‘बाबा' जहाँ बाबा है वहाँ माया नहीं। अगर दिल से, सम्बन्ध से, स्नेह से बाबा कहा और माया भागी। जैसे कितना भी बड़ा डाकू हो लेकिन जब पकड़ा जाता है तो बड़ा डाकू भी बकरी बन जाता। तो बाबा शब्द निकलना और डाकू का पकड़ा जाना। माया जो सेकेण्ड के पहले शेर के रूप वाली होती वह सेकेण्ड बाद बकरी बन जाती। तो इस साधन को सदा साथ रखो। बाबा भूला माना सबकुछ भूला। साधन सहज है सिर्फ बार-बार यूज करने का तरीका आना चाहिए। सेकेण्ड में परिवर्तन हो इसको कहा जाता है यूज करने का तरीका आता है। सदा यह याद रखो मेरा बाबा, जब मेरा बाबा आ गया तो माया भाग गई।
17\. सहजयोगी की स्टेज स्वत: बनी रहे उसकी विधि :- अमृतवेले के महत्व को जानो। अमृतवेला है दिन का आदि। जो अमृतवेले अर्थात् सारे दिन के आदि के समय पावरफुल स्टेज बनायेंगे तो सारा दिन मदद मिलेगी। सारे दिन की जीवन महान बन जायेगी। क्योंकि जब अमृतवेले विशेष बाप से शक्ति भर ली तो शक्ति स्वरूप हो चलने से मुश्किल नहीं होगा, चाहे जैसा कार्य आये मुश्किल का अनुभव नहीं, लेकिन प्राप्त शक्ति के आधार से सहज हो जायेगा। इससे सहज योगी की स्टेज स्वत: बनी रहेगी। अमृतवेले को मिस (छोड़ देना) करना माना संगम की विशेष प्राप्ति को खत्म करना। जो भी ईश्वरीय मर्यादायें हैं उन मर्यादाओं पूर्वक जीवन बिताने से विश्व के आगे एग्जाम्पल बन जायें। विश्व आपके जीवन को देखते अपनी जीवन बनायेंगी, तो मर्यादा की लकीर के अन्दर रहो तो माया आ नहीं सकती। कुछ भी हो लेकिन स्वयं का उमंग-उत्साह हर सेकेण्ड नया होना चाहिए। स्वयं के उमंग-उत्साह का आधार स्वयं हैं, उसमें कोई दूसरा रोक नहीं सकता, उसमें सदा चढ़ती कला होनी चाहिए। रूकना काम है कमज़ोरों का। अच्छा