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3 Feb 2006
“परमात्म प्यार में सम्पूर्ण पवित्रता की ऐसी स्थिति बनाओ जिसमें व्यर्थ का नामनिशान न हो''
3 February 2006 · हिंदी
आज बापदादा चारों ओर के अपने प्रभु प्यारे बच्चों को देख रहे हैं। सारे विश्व के चुने हुए कोटों में से कोई इस परमात्म प्यार के अधिकारी बनते हैं। परमात्म प्यार ने ही आप बच्चों को यहाँ लाया है। यह परमात्म प्यार सारे कल्प में इस समय ही अनुभव करते हो। और सभी समय आत्माओं का प्यार, महान आत्माओं का, धर्म आत्माओं का प्यार अनुभव किया लेकिन अभी परमात्म प्यार के पात्र बन गये। कोई आपसे पूछे परमात्मा कहाँ है? तो क्या कहेंगे? परमात्म बाप तो हमारे साथ ही है। हम उनके साथ रहते हैं। परमात्मा भी हमारे बिना रह नहीं सकता और हम भी परमात्मा के बिना रह नहीं सकते। इतना प्यार अनुभव कर रहे हो। फ़लक से कहेंगे वह हमारे दिल में रहता और हम उनके दिल में रहते। ऐसे अनुभवी हैं ना! हैं अनुभवी? क्या दिल में आता? अगर हम नहीं अनुभवी होंगे तो कौन होगा! बाप भी ऐसे प्यार के अधिकारी बच्चों को देख हर्षित होते हैं।
परमात्म प्यार की निशानी - जिससे प्यार होता है उसके पीछे सब कुर्बान करने के लिए सहज तैयार हो जाते हैं। तो आप सब भी जो बाप चाहते हैं कि हर एक बच्चा बाप समान बन जाए, हर एक के चेहरे से बाप प्रत्यक्ष दिखाई दे, ऐसे बने हो ना? बापदादा की दिल पसन्द स्थिति जानते हो ना! बाप के दिल पसन्द स्थिति है ही सम्पूर्ण पवित्रता। इस ब्राह्मण जन्म का फाउण्डेशन भी सम्पूर्ण पवित्रता है। सम्पूर्ण पवित्रता की गुह्यता को जानते हो? संकल्प और स्वप्न में भी रिंचक मात्र अपवित्रता का नाम-निशान न हो। बापदादा आजकल के समय की समीपता प्रमाण बार-बार अटेन्शन खिंचवा रहे हैं कि सम्पूर्ण पवित्रता के हिसाब से व्यर्थ संकल्प, यह भी सम्पूर्णता नहीं है। तो चेक करो व्यर्थ संकल्प चलते हैं? किसी भी प्रकार के व्यर्थ संकल्प सम्पूर्णता से दूर तो नहीं करते? जितना-जितना पुरुषार्थ में आगे बढ़ते जाते हैं, उतना रॉयल रूप के व्यर्थ संकल्प व्यर्थ समय तो समाप्त नहीं कर रहे हैं? रॉयल रूप में अभिमान और अपमान व्यर्थ संकल्प के रूप में वार तो नहीं करते? अगर अभिमान रूप में कोई भी परमात्म देन को अपनी विशेषता समझते हैं तो उस विशेषता का भी अभिमान नीचे ले आता है। विघ्न रूप बन जाता है और अभिमान भी सूक्ष्म रूप में यही आता, जो जानते भी हो - मेरापन आया, मेरा नाम, मान, शान होना चाहिए, यह मेरापन अभिमान का रूप ले लेता है। यह व्यर्थ संकल्प भी सम्पूर्णता से दूर कर लेते हैं क्योंकि बापदादा यही चाहते हैं - स्वमान, न अभिमान, न अपमान। यही कारण बनते हैं व्यर्थ संकल्प आने के।
बापदादा हर बच्चे को डबल मालिकपन के निश्चय और नशे में देखने चाहते हैं। डबल मालिकपन क्या है? एक तो बाप के खजानों के मालिक और दूसरा स्वराज्य के मालिक। दोनों ही मालिकपन क्योंकि सभी बालक भी हो और मालिक भी हो। लेकिन बापदादा ने देखा बालक तो सभी हैं ही क्योंकि सभी कहते हैं मेरा बाबा। तो मेरा बाबा अर्थात् बालक हैं ही। लेकिन बालक के साथ दोनों प्रकार के मालिक। तो मालिकपन में नम्बरवार हो जाते हैं। मैं बालक सो मालिक भी हूँ। वर्से का खजाना प्राप्त है इसलिए बालकपन का निश्चय और नशा रहता है लेकिन मालिकपन का प्रैक्टिकल में निश्चय का नशा उसमें नम्बरवार हो जाते हैं। स्वराज्य अधिकारी मालिक, इसमें विशेष विघ्न डालता है मन। मन के मालिक बन कभी भी मन के परवश नहीं हो। कहते हैं स्वराज्य अधिकारी हैं, तो स्वराज्य अधिकारी अर्थात् राजा हैं, जैसे ब्रह्मा बाप ने हर रोज़ चेकिंग कर मन के मालिक बन विश्व के मालिक का अधिकार प्राप्त कर लिया। ऐसे यह मन बुद्धि राजा के हिसाब से तो मत्री हैं, यह व्यर्थ संकल्प भी मन में उत्पन्न होते हैं, तो मन व्यर्थ संकल्प के वश कर देता है। अगर आर्डर से नहीं चलाते तो मन चंचल बनने के कारण परवश कर लेता है। तो चेक करो। वैसे भी मन को घोड़ा कहते हैं, क्योंकि चंचल है ना! और आपके पास श्रीमत का लगाम है। अगर श्रीमत का लगाम थोड़ा भी ढीला होता है तो मन चंचल बन जाता है। क्यों लगाम ढीला होता? क्योंकि कहाँ न कहाँ साइडसीन देखने में लग जाते हैं। और लगाम ढीला होता तो मन को चांस मिलता है। तो मैं बालक सो मालिक हूँ, इस स्मृति में सदा रहो। चेक करो खजाने का भी मालिक तो स्वराज्य का भी मालिक, डबल मालिक हूँ? अगर मालिकपन कम होता है तो कमजोर संस्कार इमर्ज हो जाते हैं। और संस्कार को क्या कहते हो? मेरा संस्कार ऐसा है, मेरी नेचर ऐसी है, लेकिन क्या यह मेरा है? कहने में तो ऐसे ही कहते हो, मेरा संस्कार। यह मेरा है? मेरा संस्कार कहना राइट है? राइट है? मेरा है या रावण की जायदाद है? कमजोर संस्कार रावण की जायदाद है, उसको मेरा कैसे कह सकते हैं। मेरा संस्कार कौन सा है? जो बाप का संस्कार वह मेरा संस्कार। तो बाप का संस्कार कौन सा है? विश्व कल्याण। शुभ भावना, शुभ कामना। तो कोई भी कमजोर संस्कार को मेरा संस्कार कहना ही रांग है। और मेरा संस्कार अगर मानो दिल में बिठाया है, अशुद्ध चीज़ दिल में बिठा दी है। मेरी चीज़ से तो प्यार होता है ना! तो मेरा समझने से अपने दिल में जगह दे दी है। इसीलिए कई बार बच्चों को बहुत युद्ध करनी पड़ती है क्योंकि अशुभ और शुभ दोनों को दिल में बिठा दिया है तो दोनों क्या करेंगे? युद्ध ही तो करेंगे! जब यह संकल्प में आता है, वाणी में भी आता है - मेरा संस्कार। तो चेक करो यह अशुभ संस्कार मेरा संस्कार नहीं है। तो संस्कार परिवर्तन करना पड़े।
बापदादा हर एक बच्चे को पदम-पदमगुणा भाग्यवान चलन और चेहरे में देखने चाहते हैं। कई बच्चे कहते हैं भाग्यवान तो बने हैं लेकिन चलते-फिरते भाग्य इमर्ज हो, वह मर्ज हो जाता है और बापदादा हर समय, हर बच्चे के मस्तक में भाग्य का सितारा चमकता हुआ देखने चाहते हैं। कोई भी आपको देखे तो चेहरे से, चलन से भाग्यवान दिखाई दे तब आप बच्चों द्वारा बाप की प्रत्यक्षता होगी क्योंकि वर्तमान समय मैजारिटी अनुभव करने चाहते हैं, जैसे आजकल की साइन्स प्रत्यक्ष रूप में दिखाती है ना! अनुभव कराती है ना! गर्म का भी अनुभव कराती है, ठण्डाई का भी अनुभव कराती है तो साइलेन्स की शक्ति से भी अनुभव करने चाहते हैं। जितना-जितना स्वयं अनुभव में रहेंगे तो औरों को भी अनुभव करा सकेंगे। बापदादा ने इशारा दिया ही है कि अभी कम्बाइन्ड सेवा करो। सिर्फ आवाज से नहीं, लेकिन आवाज के साथ अनुभवी मूर्त बन अनुभव कराने की भी सेवा करो। कोई न कोई शान्ति का अनुभव, खुशी का अनुभव, आत्मिक प्यार का अनुभव..., अनुभव ऐसी चीज़ है जो एक बारी भी अनुभव हुआ तो छोड़ नहीं सकते हैं। सुनी हुई चीज़ भूल सकती है लेकिन अनुभव की चीज़ भूलती नहीं है। वह अनुभव कराने वाले के समीप लाती है।
सभी पूछते हैं कि अभी आगे के लिए क्या नवीनता करें? तो बापदादा ने देखा सर्विस तो सभी उमंग-उत्साह से कर रहे हो, हर एक वर्ग भी कर रहा है। आज भी बहुत वर्ग इक्ट्ठे हुए है ना! मेगा प्रोग्राम भी कर लिया, सन्देश तो दे दिया, अपना उल्हना निकाल लिया, इसकी मुबारक हो। लेकिन अब तक यह आवाज नहीं फैला है कि यह परमात्म ज्ञान है। ब्रह्माकुमारियां कार्य अच्छा कर रही हैं, ब्रह्माकुमारियों का ज्ञान बहुत अच्छा है लेकिन यही परमात्म ज्ञान है, परमात्म कार्य चल रहा है यह आवाज फैले। मेडीटेशन कोर्स भी कराते हो, आत्मा का परमात्मा से कनेक्शन भी जोड़ते हो लेकिन अब परमात्म कार्य स्वयं परमात्मा करा रहा है, यह बहुत कम अनुभव करते हैं। आत्मा और धारणायें यह प्रत्यक्ष हो रहा है, अच्छा कार्य कर रहे हैं, अच्छा बोलते हैं, अच्छा सिखाते हैं, यहाँ तक ठीक है। नॉलेज अच्छी है इतना भी कहते हैं लेकिन परमात्म नॉलेज है... यह आवाज बाप के नजदीक लायेगा और जितना बाप के नजदीक आयेंगे उतना अनुभव स्वत: ही करते रहेंगे। तो ऐसा प्लैन बनाओ और भाषणों में ऐसा कुछ जौहर भरो, जिससे परमात्मा के नजदीक आ जायें। दिव्यगुणों की धारणा इसमें अटेन्शन गया है, आत्मा का ज्ञान देते हैं, परमात्मा का ज्ञान देते हैं, यह कहते हैं लेकिन परमात्मा आ चुका है, परमात्म कार्य स्वयं परमात्मा चला रहा है, यह प्रत्यक्षता चुम्बक की तरह समीप लायेगी। आप लोग भी समीप तब आये जब समझा बाप मिला है, बाप से मिलना है। स्नेही मैजॉरिटी बनते हैं, वह क्या समझके? कार्य बहुत अच्छा है। जो कार्य ब्रह्माकुमारियां कर रही हैं, वह कार्य कोई कर नहीं सकता, परिवर्तन कराती हैं। लेकिन परमात्मा बोल रहा है, परमात्मा से वर्सा लेना है, इतना नजदीक नहीं आते क्योंकि अभी जो पहले समझते नहीं थे कि ब्रह्माकुमारियां क्या करती हैं, क्या इन्हों की नॉलेज है, वह समझने लगे हैं। लेकिन परमात्म प्रत्यक्षता, अगर समझ जाएं कि परमात्मा का ज्ञान है तो रुक सकते हैं क्या! जैसे आप भागकर आ गये हो ना, ऐसे भागेंगे। तो अभी ऐसा प्लैन बनाओ, ऐसे भाषण तैयार करो, ऐसे परमात्म अनुभूति के प्रैक्टिकल सबूत बनो। तभी बाप की प्रत्यक्षता प्रैक्टिकल में दिखाई देगी। अभी ‘अच्छा है' - यहाँ तक पहुंचे हैं, ‘अच्छा बनना है', वह लहर परमात्म प्यार की अनुभूति से होगी। तो अनुभवी मूर्त बन अनुभव कराओ। अभी डबल मालिकपन की स्मृति से समर्थ बन समर्थ बनाओ। अच्छा।
सेवा का टर्न पंजाब ज़ोन का है:- हाथ हिलाओ। अच्छा है जिस भी ज़ोन को टर्न मिलता है वह खुली दिल से आ जाते हैं। (पंजाब ज़ोन से 4000 आये हैं) बापदादा को भी खुशी होती है कि हर एक ज़ोन सेवा का चांस अच्छा ले लेते हैं। पंजाब को सभी कामन रीति से शेर कहते हैं, पंजाब शेर और बापदादा कहते हैं शेर अर्थात् विजयी। तो सदा पंजाब वालों को अपने मस्तक के बीच विजय का तिलक अनुभव करना है। विजय का तिलक मिला हुआ है। यह सदा स्मृति रहे हम ही कल्प कल्प के विजयी हैं। थे, हैं और कल्प-कल्प बनेंगे। अच्छा है। पंजाब भी वारिस क्वालिटी को बाप के आगे लाने का प्रोग्राम बना रहे हैं ना! अभी बापदादा के आगे वारिस क्वालिटी लाई नहीं है। स्नेही क्वालिटी लाई है, सभी ज़ोन ने स्नेही सहयोगी क्वालिटी लाई है लेकिन वारिस क्वालिटी नहीं लाये हैं। तैयारी कर रहे हैं ना! सब प्रकार के चाहिए ना! वारिस भी चाहिए, स्नेही भी चाहिए, सहयोगी भी चाहिए, माइक भी चाहिए, माइट भी चाहिए। सब प्रकार के चाहिए। अच्छा है, सेन्टरों में वृद्धि तो हो रही है। हर एक उमंग-उत्साह से सेवा में वृद्धि कर भी रहे हैं, अभी देखेंगे कि किस ज़ोन में यह प्रत्यक्ष होता है - परमात्मा आ चुका है। बाप को प्रत्यक्ष कौन सा ज़ोन करता है, वह बापदादा देख रहे हैं। फॉरेन करेगा? फॉरेन भी कर सकता है। पंजाब नम्बर ले लो। ले लो अच्छा है। सब आपको सहयोग देंगे। बहुत समय से प्रयत्न कर रहे हैं - ‘यही है, यही है, यही है'.. यह आवाज फैलाने का। अभी है - ‘यह भी हैं', यही है नहीं है। तो पंजाब क्या करेगा? यह आवाज आ जाये - यही है, यही है...। टीचर्स ठीक है? कब तक करेंगे? इस साल में करेंगे? नया साल शुरू हुआ है ना! तो नये साल में कोई नवीनता होनी चाहिए ना! ‘यह भी है'- यह तो बहुत सुन लिया। जैसे आपके मन में बस बाबा, बाबा, बाबा स्वत: याद रहता है, ऐसे उनके मुख से निकले ‘हमारा बाबा आ गया।' वह भी ‘मेरा बाबा', ‘ मेरा बाबा'- यह आवाज चारों कोनों से निकले, लेकिन शुरूआत तो एक कोने से होगी ना। तो पंजाब कमाल करेगा? क्यों नहीं करेंगे! करना ही है। बहुत अच्छा। इनएडवांस मुबारक हो। अच्छा।
इस ग्रुप में 6 वर्गो की मीटिंग चल रही है:-(साइंस एण्ड इंजीनियर विंग, बिजनेस विंग, धार्मिक प्रभाग, समाज सेवा प्रभाग, मीडिया प्रभाग, सुरक्षा प्रभाग) सभी उठो। (सभी अपने-अपने प्रभाग का बैनर दिखा रहे हैं) अच्छा सब बिजी हो गये हो तो सेवा में बिजी रहने की मुबारक हो। हर एक अपनी-अपनी विधि अपना रहे हैं। देखो, साइंस इंजीनियर का बैनर देख रहे हैं, लेकिन कमाल यह है कि जैसे साइंस प्रत्यक्ष प्रमाण दिखा रही है, ऐसे साइलेन्स पावर ऐसा प्रैक्टिकल में अनुभव फैलाओ जो हर एक के मुख से निकले कि साइंस तो साइंस है लेकिन साइलेन्स अपरमअपार है क्योंकि धर्म वाले और साइंस वाले दोनों को प्रैक्टिकल में साइलेन्स का चमत्कार नहीं लेकिन साइलेन्स का कार्य सिद्ध करके दिखाना पड़ेगा। धर्म वालों को प्रैक्टिकल में एक परमात्मा है और परमात्मा का कार्य चल रहा है यह सिद्ध करके दिखाना पड़ेगा। अनेक तरफ से बुद्धि हटकर एक तरफ लग जाए। एकाग्र बुद्धि हो जाए। जो भी विंग हैं, बापदादा ने कह दिया कि काम तो सभी कर रहे हैं, प्लैन भी अच्छे-अच्छे बनाते हैं लेकिन अभी समय की रफ्तार तेज जा रही है तो समय के प्रमाण अभी ऐसा कोई प्लैन बनाओ जो सबकी बुद्धि में परमात्मा के सिवाए और कुछ सूझे नहीं, मैजारिटी के मुख से ‘बाबा', ‘ बाबा' निकले। प्लैन भी अच्छे बनाये हैं, बापदादा ने सुने हैं। लेकिन अभी फास्ट करना पड़ेगा। साइन्स भी देखो, समय को, चीज़ों को बिल्कुल सूक्ष्म बनाती जाती है ना। तो साइलेन्स पावर कितना शक्तिशाली बना रही है यह अनुभव कराओ। जो भी वर्ग आये हैं, सभी को बापदादा मुबारक दे रहे हैं। वैसे तो मीडिया और मेडिकल यह भी आगे बढ़ रहे हैं। बापदादा ने सुना तो मीडिया भी विस्तार को प्राप्त कर रही है लेकिन मीडिया के लिए भी सुनाया था तो जिसके हाथ में अखबार आये, जिसके रेडियो का स्विच खुले, टी.वी. का स्विच खुले, आवाज आये ‘हमारा बाबा आ गया'। ऐसे नहीं और वर्ग नहीं कर रहे हैं, सब कर रहे हैं लेकिन बापदादा देख रहे हैं कि कौन सा वर्ग नम्बरवन निमित्त बनता है। कौन सा ज़ोन नम्बरवन निमित्त बनता है। चलो और तो छोड़ो लेकिन जहाँ भी प्रोग्राम करते हैं वह प्रोग्राम वाले ही सभी कहें कि ‘बाबा आ गया', यह तो शुरू हो कि आप कहेंगे - हम अभी पुरुषार्थ कर रहे हैं, जल्दी-जल्दी सम्पन्न बन जायेंगे तो यह कार्य भी हो जायेगा क्योंकि कनेक्शन है, आपका सम्पन्न बनना और प्रत्यक्षता का झण्डा लहरना। तो बापदादा ने सुनाया कि अभी वेस्ट थॉट्स यह अभी भी चलते हैं, रॉयल रूप में भी चलते, साधारण रूप में भी चलते हैं, सभी मन के मालिक बन जायें, परमात्म बालक सो मालिक। तो ऐसे मालिक बनेंगे? (सभी ने हाथ हिलाया) अच्छा - मुबारक हो, मुबारक हो, मुबारक हो।
डबल विदेशी:- बापदादा कहते हैं कि डबल फॉरेनर्स सबसे पहले तो मधुबन का बहुत बढ़िया श्रृंगार हैं। कितना अच्छा लगता है। देश विदेश एक मत होके एकाग्र बुद्धि से विश्व सेवा कर रहे हैं। एक ही स्टेज पर सब इन्टरनेशनल हैं, काले भी तो गोरे भी, सांवले भी, सब प्रकार के एक स्टेज पर बैठते हैं और सब कहते हैं कि एक बाप दूसरा न कोई, ऐसे है? या दूसरा कोई है? व्यर्थ संकल्प हैं तो भी दूसरा है। आज बापदादा सब संकल्प की विधि को एक शुभ संकल्प बनाने चाहते हैं क्योंकि मन के संकल्प में बहुत समय से जो कमजोरी चलती है, उसमें मन बुद्धि को भी सहयोगी बना देता है और किसी भी कारण से मन-बुद्धि में जो कमजोरी का संकल्प चलता रहता है, वह संस्कार बन जाता है क्योंकि बहुत समय चलता है ना, तो वह संस्कार का रूप हो जाता है। लेकिन ‘मेरा संस्कार' अभी कभी नहीं कहना, अगर मेरा संस्कार कहेंगे ना तो बापदादा और ब्राह्मण समझेंगे कि इसको रावण की जायदाद से प्यार है। तो डबल विदेशियों ने तो विदाई दे दी है ना! दे दी? व्यर्थ स्टॉप। समर्थ बाप, समर्थ हम, व्यर्थ खत्म। ठीक है ना - फॉरेनर्स की एक विशेषता है जो बाप को अच्छी लगती है, वह क्या है? अन्दर नहीं रखते हैं, सब बोल देते हैं, मैजॉरिटी छिपाते नहीं हैं। मैजॉरिटी ऐसे हैं। और जो संकल्प किया दृढ़, उसको प्रैक्टिकल में लाने की भी आदत है इसीलिए डबल फॉरेनर्स शुरू करो - दृढ़ संकल्प वेस्ट खत्म, बेस्ट। ठीक है? करेंगे डबल फॉरेनर्स? करेंगे? आप में संस्कार रूप में भी है, जो संकल्प किया वह करके दिखाते हो। तो सारे फॉरेन में वेस्ट का नाम निशान न हो, न वेस्ट टाइम, न वेस्ट बोल, न वेस्ट संकल्प, न वेस्ट कर्म, न वेस्ट सम्बन्ध-सम्पर्क। ठीक है? पसन्द है? अच्छा। एक्जैम्पुल बनेंगे ना! तो कब तक यह रिजल्ट आयेगी? तीन मास में या साल में? टीचर्स क्या सोचती हैं? (दादी जानकी कह रही हैं अभी शिवरात्रि आ रही है, अभी-अभी करेंगे, बाबा ने कहा, हो गया) अच्छा है देखो दृढ़ संकल्प रखेंगे, करना ही है, कुछ भी हो जाए, करना ही है। (सभी कह रहे हैं शिवजयन्ती तक हो जायेगा) मुबारक हो, लाख, लाख मुबारक हो। बहुत अच्छा आप सभी के मुख में गुलाबजामुन। अच्छा।
जो भी उमंग-उत्साह से आगे बढ़ने चाहे वह बढ़ सकता है। ऐसे नहीं डबल फारेनर्स ने हाथ उठाया और आप सभी इन्डिया वाले क्या करेंगे? नम्बरवन तो लेना चाहते हैं ना! सभी के दिल में यह उमंग आना चाहिए कि हमने कहा नहीं है लेकिन करके दिखायेंगे। तो इन्डिया वाले ऐसे करेंगे? हिम्मत दिखायेंगे?
हाँ, मधुबन वाले भी करेंगे? मधुबन वाले बड़ा हाथ उठाओ। मधुबन वालों के लिए बापदादा कहते हैं जो चुल पर सो दिल पर, मधुबन वालों को बहुत बड़ी लिफ्ट है। लिफ्ट पर अगर चढ़ने चाहो तो बहुत जल्दी सम्पन्न बन सकते हो। लोग तो मधुबन में आते हैं, आप मधुबन में रहते हैं। सिर्फ अलबेले नहीं बनना बस। लिफ्ट को छोड़कर सीढ़ी नहीं चढ़ो, लिफ्ट में चढ़ो। बाकी बापदादा मधुबन वालों को हर सीजन की मुबारक देते हैं। सेवा अच्छी करते हैं। लेकिन.. लेकिन है। कहें लेकिन वाला, कि प्राइवेट कहें? मधुबन वाले समझदार बहुत हैं, अन्दर में समझ तो गये हैं, इसीलिए कहते नहीं हैं। देखो, मधुबन वालों को हर साल, हर सीजन में सम्मुख मुरली सुनने का मिलता है, औरों को नहीं मिलता है। तो मधुबन वाले सभी को मुस्कराके मिलते अपने चेहरे से बाप को प्रत्यक्ष कर सकते हैं। जो ‘मेरा बाबा' कहते हैं ना, वह मेरे बाबा का चेहरे से चलन से दिखाई दे। कर भी रहे हैं, ऐसे नहीं है नहीं कर रहे हैं, कर रहे हैं। अभी और थोड़ा फास्ट करना है, बाकी कर भी रहे हैं। मधुबन का नाम सुनके जहाँ भी जाते हो ना, मधुबन वाले हैं, मधुबन वाले हैं। देखो, कितना रिगार्ड से देखते हैं। मधुबन से प्यार है, तो मधुबन निवासियों से भी प्यार है। अच्छा आज तो मिल लिया ना मधुबन वालों से। आज किसने कहा था मधुबन वालों से मिलना है, तो बापदादा मिला ना। अच्छा।
सभी तरफ के सर्व रूहानी गुलाब बच्चों को सदा बाप के अति प्यारे और देहभान से अति न्यारे, बापदादा के दिल के दुलारे बच्चों को, सदा एक बाप, एकाग्र मन और एकरस स्थिति में स्थित रहने वाले बच्चों को, चारों ओर के भिन्न-भिन्न समय पर भिन्न-भिन्न स्थान में रहते भी साइंस के साधनों से मधुबन में पहुंचने वाले, सम्मुख देखने वाले, सभी लाडले, सिकीलधे, कल्प-कल्प के परमात्म प्यार के पात्र अधिकारी बच्चों को बापदादा का यादप्यार और दिल की दुआयें, पदम-पदम गुणा स्वीकार हो और साथ में डबल मालिक बच्चों को बापदादा की नमस्ते।
दादी जी से:- मधुबन का हीरो एक्टर है, सदा जीरो याद है। शरीर भले नहीं चलता, थोड़ा धीरे-धीरे चलता लेकिन सभी का प्यार और दुआयें चला रही हैं। बाप की तो हैं ही लेकिन सभी की हैं। सभी दादी को बहुत प्यार करते हो ना! देखो सभी यही कहते हैं कि दादियां चाहिए, दादियां चाहिए, दादियां चाहिए...। तो दादियों की विशेषता क्या है? दादियों की विशेषता है बाप की श्रीमत पर हर कदम उठाना। मन को भी बाप की याद और सेवा में समर्पण करना। आप सभी भी ऐसे ही कर रहे हो ना! मन को समर्पण करो। बापदादा ने देखा है, मन बड़ी कमाल करके दिखाता है। कमाल क्या करता है? चंचलता करता है। मन एकाग्र हो जाए, जैसे झण्डा ऊपर करते हो ना, ऐसे मन का झण्डा शिव बाबा, शिवबाबा में एकाग्र हो जाए। आ रहा है, समय समीप आ रहा है। कभी-कभी बापदादा बच्चों के संकल्प बहुत अच्छे-अच्छे सुनते हैं। सबका लक्ष्य बहुत अच्छा है। अच्छा। दादियां बहुत थोड़ी सी रह गई हैं। गिनी चुनी हुई दादियां रह गई हैं। दादियों से प्यार है ना सबको। अच्छा। (सब दादियां ऐसे ही चलती रहें) अभी तो हैं ही ना, अभी तो क्वेश्चन ही नहीं। अच्छा। देखो हाल की शोभा कितनी अच्छी है। माला लगती है ना! और माला के बीच में मणके बैठे हैं। अच्छा। ओम् शान्ति।