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10 Jan 1994
“एक ‘पॉइन्ट’ शब्द को तीन रूपों से स्मृति वा स्वरूप में लाना - यही सेफ्टी का साधन है”
10 January 1994 · हिंदी
विश्व कल्याणकारी बापदादा अपने सर्व मास्टर विश्व कल्याणकारी बच्चों को देख रहे हैं। हर एक बच्चे का इस ब्राह्मण जीवन का लक्ष्य अति श्रेष्ठ है। हर एक नम्बरवन पुरूषार्थ करने का लक्ष्य रखते हुए आगे उड़ते जा रहे हैं। लक्ष्य सभी का नम्बरवन का है लेकिन लक्षण नम्बरवार हैं। तो लक्ष्य और लक्षण दोनों में अन्तर क्यों है? ज्ञान दाता बाप भी एक है, योग की विधि भी एक है, दिव्य गुण धारण करने का सहज प्रत्यक्ष प्रमाण साकार ब्रह्मा बाप भी एक है, सेवा के साधन और सेवा की विधि सिखाने वाला भी एक है। मुख्य बात है - पढ़ाई और पालना - दोनों ही देने वाला एक और एक नम्बर है, फिर भी प्रत्यक्ष जीवन में लक्षण नम्बरवार क्यों? ये तो सभी स्वयं को अच्छी तरह से जानते ही हो कि लक्षण धारण करने में मैं किस नम्बर में हूँ? नम्बरवार होने का विशेष आधार है एक ही शब्द ‘प्वॉइन्ट'। प्वॉइन्ट स्वरूप को अनुभव करना। दूसरा, कोई भी संकल्प, बोल वा कर्म व्यर्थ है उसको पॉइन्ट लगाना अर्थात् बिन्दी लगाना। तीसरा, ज्ञान की वा धारणा की अनेक पॉइन्ट्स को मनन कर स्व प्रति वा सेवा प्रति समय पर कार्य में लगाना। तो शब्द एक ही पॉइन्ट है लेकिन तीनों स्वरूप की पॉइन्ट को समय पर स्मृति में, स्वरूप में लाना - इसमें अन्तर पड़ जाता है। स्मृति सबको रहती है लेकिन स्मृति को स्वरूप में लाना, इसमें नम्बरवार हो जाते हैं। कई बार बापदादा सभी बच्चों को देखते हैं कि स्मृति में बहुत होशियार होते हैं। ऐसा होना चाहिये - वह सोचते भी रहते हैं; यह राइट है, यह राँग है यह ज्ञान भी इमर्ज होता है। ज्ञान अर्थात् नॉलेज और नॉलेज इज़ लाइट, नॉलेज इज माइट कहा जाता है तो जहाँ लाइट भी है, माइट भी है वहाँ ये होना चाहिये, नहीं होता। क्या सोचते हैं कि बापदादा यह कहते तो हैं, बनना तो है, ज्ञान तो यह है, लेकिन उस समय मेरे में क्या है, वह चाहिये-चाहिये में ही रह जाता है। इसका अर्थ है कि ज्ञान को लाइट और माइट के रूप से समय प्रमाण कार्य में नहीं लगा सकते। इसको कहा जाता है स्मृति में है लेकिन स्वरूप में लाने की शक्ति कम है। जब लाइट अर्थात् रोशनी है कि ये राँग है, ये राइट है; ये अन्धकार है, ये प्रकाश है; ये व्यर्थ है, ये समर्थ है, तो अन्धकार समझते भी अन्धकार में रहना, इसको ज्ञानी वा समझदार कहेंगे? ज्ञानी नहीं तो क्या हुए? भक्त वा अधूरे ज्ञानी? राँग समझते भी राँग कर्मों के वा संकल्पों के वा स्वभाव-संस्कार के वशीभूत हो जाएं तो इसको क्या कहा जायेगा? उसका क्या टाइटल होना चाहिये? बापदादा समय की गति को देख सभी बच्चों को बार-बार अटेन्शन दिलाते हैं।
‘अटेन्शन' शब्द को भी डबल अन्डरलाइन करा रहे हैं कि ये प्रकृति की तमोगुणी शक्ति और माया की सूक्ष्म रॉयल समझदारी की शक्ति अपना कार्य तीव्र गति से कर रही है और करती रहेगी। प्रकृति के विकराल रूप को जानना सहज है लेकिन भिन्न-भिन्न विकराल हलचल में अचल रहना इसमें और अटेन्शन चाहिये। माया के अति सूक्ष्म स्वरूप को जानने में भी धोखा खा लेते हैं। माया ऐसा रॉयल रूप रखती है जो राँग को राइट अनुभव कराती है। है बिल्कुल राँग लेकिन बुद्धि को ऐसा परिवर्तित कर देती है जो रीयल समझ को, महसूसता की शक्ति को गायब कर देती है। जैसे कोई जादू मन्त्र करते हैं ना तो परवश हो जाते हैं, ऐसी महसूसता शक्ति गायब करने की रॉयल माया रीयल को समझने नहीं देती है। होगा बिल्कुल राँग लेकिन माया की छाया के वशीभूत होने के कारण राँग को राइट समझते और सिद्ध करने में माया के सुप्रीम कोर्ट का वकील बन जाते हैं। तो वकील क्या करते हैं? झूठ को सच सिद्ध करने में होशियार होते हैं। सच को सच सिद्ध करने में भी होते हैं लेकिन झूठ को सच सिद्ध करने में होशियार होते हैं, दोनों में होशियार होते हैं। इसीलिये बापदादा ‘अटेन्शन' को डबल अन्डरलाइन करा रहे हैं। महसूसता शक्ति को परिवर्तित करने की सूक्ष्म स्वरूप की माया की छाया से सदा अपने को सेफ रखो। क्योंकि विशेष माया का स्वरूप विशेष इस स्वरूप में अपना कार्य कर रहा है। समझा? अभी क्या करेंगे? केयरफुल रहना। अगर कोई भी विशेष आत्मायें इशारा देती हैं तो अच्छी तरह से माया की इस छाया से निकल बाप की छत्रछाया में अपने को, विशेष मन-बुद्धि को इस छत्रछाया के सहारे में लाओ। क्योंकि मन में निगेटिव भाव और भावना पैदा करने का विशेष माया का प्रभाव चल रहा है और बुद्धि में यथार्थ महसूसता को समाप्त करने का विशेष माया का कार्य चल रहा है। जैसे कोई सीज़न होती है ना तो सीज़न से बचने के लिये उसी प्रमाण विशेष अटेन्शन रखा जाता है। जैसे बारिश आयेगी तो छाते, रैन कोट आदि का अटेन्शन रखेंगे, सर्दी आयेगी तो गरम कपड़े रखेंगे, अटेन्शन देंगे ना। तो मन और बुद्धि के ऊपर प्रभाव नहीं पड़े इसके लिये पहले ही सेफ्टी के साधन विशेष अपनाओ। वो विशेष साधन है बहुत सहज, पहले भी सुनाया है - एक ही ‘पॉइन्ट' शब्द। सहज है ना। लम्बा-चौड़ा तो नहीं सुनाया ना। कहते रहते हैं हाँ, मैं आत्मा बिन्दू हूँ, ज्योति रूप हूँ, लेकिन उसमें टिकते नहीं हैं। लगाना चाहते हैं पॉइन्ट लेकिन लग जाता है क्वेश्चन मार्क और आश्चर्य की निशानी। पॉइन्ट लगाना सहज या आश्चर्य की निशानी वा क्वेश्चन मार्क की निशानी? क्या सहज है? बिन्दी लगाना सहज है ना। फिर क्वेश्चन और आश्चर्य में क्यों चले जाते हैं? इस विधि को अपनाओ। सीज़न है - झूठ, सच सिद्ध होने का और झूठ, सत्य से भी स्पष्ट और आकर्षण वाला होगा। जैसे आजकल का फैशन है ना झूठी चीज़ कितनी आकर्षण वाली होती है, उसके आगे सच्चे की वैल्यु कम हो जाती है। रीयल सिल्वर देखो और व्हाइट सिल्वर देखो, क्या सुन्दर लगता है? रीयल सिल्वर काला हो जायेगा और व्हाइट सिल्वर सदा चमकता रहेगा। तो आकर्षण व्हाइट करेगा या रीयल करेगा? तो सीज़न को पहचानो, माया के स्वरूप को पहचानो, प्रकृति के तमोगुण के भिन्न-भिन्न रंगत को पहचानो। एक है जानना, दूसरा है पहचानना। जानते ज्यादा हो, पहचानने में कभी गलती कर देते हो, कभी राइट कर देते हो। अभी क्या करेंगे? सेफ रहेंगे ना। फिर ये नहीं कहना कि हमने तो समझा नहीं, ऐसा भी होता है क्या? यह क्या-क्या नहीं चलेगा। अभी तो फिर भी बाप थोड़ा-थोड़ा रहम करता, थोड़ा-थोड़ा कदम उठाता है। लेकिन फिर ‘क्या' और ‘क्यों' कोई नहीं सुनेगा। ऐसा नहीं, वैसा... ये वकालत नहीं चलेगी। जज बनो, माया का वकील नहीं बनो। मज़ा बहुत आता है जब वकालत करते हैं। अनुभवी तो सब हो ना, अनुभव होता है ना। सुन-सुनकर साक्षी हो हर्षित होते रहते हैं। अच्छी तरह से समझा? पाण्डवों ने, शक्तियों ने समझा, टीचर्स ने समझा? सभी हाँ-हाँ तो कर रहे हैं। फ़ोटो निकल रहा है हाँ का।
तीसरी सीज़न है विशेष कमजोरी के स्वभाव-संस्कार, सम्बन्ध-सम्पर्क में आना। इसका विस्तार भी बहुत बड़ा है। वो आज नहीं सुनायेंगे। कई बच्चे कहते हैं क्या करें, पहले तो था ही नहीं, अभी पता नहीं क्या हो गया है। ये संस्कार मेरे में था ही नहीं, अभी आ गया है। इसका कारण और इसकी विधि का विस्तार फिर कभी सुनायेंगे। अच्छा!
चारों ओर के बापदादा के महावाक्य सुनने और धारण करने वाले चात्रक बच्चों को, सर्व सब्जेक्ट को स्मृति के साथ स्वरूप में लाने वाले समीप आत्माओं को, सदा ज्ञान के हर बात को लाइट और माइट के स्वरूप से कार्य में लगाने वाले श्रेष्ठ आत्माओं को, सदा लक्ष्य और लक्षण समान करने वाले बाप के ज्ञानी तू आत्मा बच्चों को, सदा बाप की छत्रछाया में रहने वाले, माया की छाया से सेफ रहने वाले, जानना और पहचानना, दोनों की विशेषता को जीवन में लाने वाले ऐसे विशेष आत्माओं को बापदादा का याद-प्यार और नमस्ते।
दादियों से मुलाकात
शक्ति सेना तीव्र गति से चल रही है ना। सेना को बापदादा के साथ-साथ आप निमित्त आत्मायें भी चलाने के निमित्त हो। बाप तो सदा साथ है और सदा ही रहेंगे। फिर भी बापदादा की श्रेष्ठ भुजायें तो हैं ना। बाप शक्ति देते हैं, बाप माइट रूप में है लेकिन निमित्त समझाने के लिये माइक तो आप निमित्त हो। कितनी मज़े की बातें सुनते हो। खेल लगता है ना। खेल है ना। खेल-खेल में विजयी बन सभी को मायाजीत विजयी बनाना ही है, ये तो गैरन्टी है ही। लेकिन बीच-बीच में ये खेल देखने पड़ते हैं। तो थकते तो नहीं हो ना? हंसते, खेलते, पार करते और कराते चलते। कोई भी ऐसी बात सुनते तो दिल से क्या निकलता? वाह ड्रामा वाह। हाय ड्रामा हाय नहीं निकलता। वाह ड्रामा। वाह-वाह करते हुए सभी को वाह-वाह बनना ही है। ये सब पार करना ही है। अच्छा!
अव्यक्त बापदादा की पर्सनल मुलाकात
ग्रुप नं. 1 विजय हमारा जन्म-सिद्ध अधिकार है इस निश्चय और नशे से निर्विघ्न स्थिति का अनुभव करो
जैसे ऊंचे से ऊंचा बाप है ऐसे हम आत्मायें भी ऊंचे से ऊंची श्रेष्ठ आत्मायें हैं - यह अनुभव करते हुए चलते हो? क्योंकि दुनिया वालों के लिये तो सबसे श्रेष्ठ, ऊंचे से ऊंचे हैं बाप के बाद देवतायें। लेकिन देवताओं से ऊंचे आप ब्राह्मण आत्मायें हो, फ़रिश्ते हो ये दुनिया वाले नहीं जानते। देवता पद को इस ब्राह्मण जीवन से ऊंचा नहीं कहेंगे। ऊंचा अभी का ब्राह्मण जीवन है। देवताओं से भी ऊंचे क्यों हो, उसको तो अच्छी तरह से जानते हो ना। देवता रूप में बाप का ज्ञान इमर्ज नहीं होगा। परमात्म मिलन का अनुभव इस ब्राह्मण जीवन में करते हो, देवताई जीवन में नहीं। ब्राह्मण ही देवता बनते हैं लेकिन इस समय देवताई जीवन से भी ऊंच हो, तो इतना नशा सदा रहे, कभी-कभी नहीं। क्योंकि बाप अविनाशी है और अविनाशी बाप जो ज्ञान देते हैं वह भी अविनाशी है, जो स्मृति दिलाते हैं वह भी अविनाशी है, कभी-कभी नहीं। तो यह चेक करो कि सदा यह नशा रहता है वा कभी-कभी रहता है? मज़ा तो तब आयेगा जब सदा रहेगा। कभी रहा, कभी नहीं रहा तो कभी मज़े में होंगे, कभी मूँझे हुए रहेंगे। तो अभी-अभी मज़ा, अभी-अभी मूँझ नहीं, सदा रहे। जैसे यह श्वांस सदा ही चलता है ना। यदि एक सेकेण्ड भी श्वांस रुक जाये या कभी-कभी चले तो उसे जीवन कहेंगे? तो इस ब्राह्मण जीवन में निरन्तर मजे में हो? अगर मज़ा नहीं होगा तो मूँझेंगे ज़रूर। तो मातायें सदा मज़े में रहती हो? शक्तियां हो ना, साधारण तो नहीं हो या घर में जाती हो तो साधारण मातायें बन जाती हो? नहीं, सदा यह याद रहे कि हम शक्तियां है। हद के नहीं हैं, बेहद के विश्व कल्याणकारी हैं। शक्तियां अर्थात् असुरों के ऊपर विजय प्राप्त करने वाली। शक्तियों को कहते ही हैं असुर संहारनी अर्थात् आसुरी संस्कार को संहार करने वाली। तो सभी शक्तियां ऐसी बहादुर हो? और पाण्डव अर्थात् विजयी। पाण्डव कभी यह नहीं कह सकते कि चाहते नहीं हैं लेकिन हार हो जाती है। क्योंकि आधा कल्प हार खाई, अभी विजय प्राप्त करने का समय है तो विजय के समय पर भी यदि हार खायेंगे तो विजयी कब बनेंगे? इसलिये इस समय सदा विजयी। विजय जन्म-सिद्ध अधिकार है। अधिकार को कोई छोड़ते नहीं, लड़ाई-झगड़ा करके भी लेते हैं और यहाँ तो सहज मिलता है। विजय अपना जन्म-सिद्ध अधिकार है। अधिकार का नशा वा खुशी रहती है ना? हद के अधिकार का भी कितना नशा रहता है! प्राइम मिनिस्टर को भूल जायेगा क्या कि मैं प्राइम मिनिस्टर हूँ? सोयेगा, खायेगा तो भूलेगा क्या कि मैं प्राइम मिनिस्टर हूँ? तो हद का अधिकार और बेहद का अधिकार कितना भी कोई भुलाये भूल नहीं सकता। माया का काम है भुलाना और आपका काम है विजयी बनना क्योंकि समझ है ना कि विजय और हार क्या है? हार के भी अनुभवी हैं और विजय के भी अनुभवी हैं। तो हार खाने से क्या हुआ और विजय प्राप्त करने से क्या हुआ - दोनों के अन्तर को जानते हो इसलिये सदा विजयी हैं और सदा रहेंगे। क्योंकि अविनाशी बाप और अविनाशी प्राप्ति के अधिकारी हम आत्मायें हैं यह सदा इमर्ज रूप में रहे। ऐसे नहीं हैं तो! बने तो हैं! जानते तो हैं! ऐसे नहीं। प्रैक्टिकल में हैं। जो जानते हैं वही निश्चय कर चलते हैं। तो हर कर्म में विजय का निश्चय और नशा हो। नशे का आधार है ही निश्चय। निश्चय कम तो नशा कम। इसीलिये कहते हैं निश्चयबुद्धि विजयी। तो फाउण्डेशन क्या हुआ? निश्चय। निश्चय में कभी-कभी वाले नहीं बनना। नहीं तो अन्त में रिजल्ट के समय भी प्राप्ति कभी-कभी की होगी फिर पश्चाताप् करना पड़ेगा। अभी प्राप्ति है, फिर पश्चाताप् होगा। तो प्राप्ति के समय प्राप्ति करो, पश्चाताप् के समय प्राप्ति नहीं कर सकेंगे। कर लेंगे, हो जायेगा! नहीं, करना ही है यह निश्चय हो। कर लेंगे... दिलासे पर नहीं चलो। कर तो रहे हैं ना... और क्या होगा... हो ही जायेंगे... नहीं, अभी होना है। गे-गे नहीं, हैं। जब दूसरों को चैलेन्ज करते हो कि श्वांस पर कोई भरोसा नहीं, औरों को ज्ञान देते हो ना तो पहले स्वयं को ज्ञान दो। कभी करने वाले हैं या अब करने वाले हैं? तो सदा विजय के अधिकारी आत्मायें हो। विजय जन्म-सिद्ध अधिकार है इस स्मृति से उड़ते चलो। कुछ भी हो जाये, ये स्मृति में लाओ कि मैं सदा विजयी हूँ। क्या भी हो जाये, निश्चय अटल है, कोई टाल नहीं सकता।
अच्छा, अब सभी ऐसी कमाल करके दिखाओ जो हर स्थान विजयी अर्थात् निर्विघ्न हो। कोई भी विघ्न न आये। विघ्न आयेंगे लेकिन हार नहीं होनी चाहिये। तो जहाँ विजय है, विघ्न हट जायेगा तो निर्विघ्न बन जायेंगे। सदा निर्विघ्न ये कमाल करके दिखाओ। कोई भी गीता पाठशाला हो, उप सेवाकेन्द्र हो, केन्द्र हो लेकिन स्वयं निर्विघ्न बनो और औरों को भी निर्विघ्न बनाओ। ऐसी कमाल दिखाओ। करना ही है। करेंगे, देखेंगे! नहीं। गे गे कहेंगे माना निश्चय में परसेन्टेज है। सब ये खुशखबरी सुने कि सभी छोटे-बड़े सेन्टर्स निर्विघ्न हैं। किसी प्रकार का विघ्न आ ही नहीं सकता। दूसरे के विघ्न को भी मिटायेंगे, विजयी बनेंगे। ऐसा समाचार आये। कहाँ से भी, कोई विघ्न का समाचार न आये। ऐसे नहीं कहना कि हम तो ठीक हैं, ये करते हैं, हम क्या करें। तीन मास विजयी रह करके दिखाओ। तीन मास में ही पता पड़ जायेगा। सभी हाँ करते हो तो ये कमाल करके दिखाओ।
ग्रुप नं. 2 फ़रिश्ता बनना है तो मेरे पन के बोझ को समाप्त करो, सबके प्यारे बनो
सदा अपने को डबल लाइट अर्थात् फ़रिश्ता आत्मा अनुभव करते हो? डबल लाइट का अर्थ ही है कि आत्मा लाइट और फ़रिश्ता स्वरूप भी लाइट। कर्म करते भी फ़रिश्ता स्वरूप में कर्म करने वाले। सभी फ़रिश्ता हो या गृहस्थी हो? बाल बच्चों का बोझ नहीं है? सब बोझ बाप के हवाले कर दिया? या अभी तक कोई मेरा है? पोत्रा मेरा है, यह मकान मेरा है, बाकी मैं बाप का हूँ ऐसे तो नहीं? सच्चे-सच्चे बिन कौड़ी बादशाह हैं। एक कौड़ी भी नहीं, लेकिन बादशाह हैं। बिन कौड़ी बादशाह कितना अच्छा है। सम्भालना भी नहीं पड़े और हो भी बादशाह। ऐसे समझते हो? जब देह ही मेरा नहीं, तो देह के साथी, देह के पदार्थ और देह के सम्बन्ध तन-मन-धन सब तेरा कि मन तेरा और धन मेरा, ऐसे तो नहीं? योग तो लगाते हैं लेकिन पैसा तो रखना पड़ेगा। मेरापन नहीं हो। मेरापन बोझ है और बोझ नीचे ले आता है, फ़रिश्ता बनने नहीं देगा। कोई भी मेरापन, मेरा स्वभाव, मेरा संस्कार, मेरी नेचर, कुछ भी मेरा है तो बोझ है और बोझ वाला उड़ नहीं सकता, फ़रिश्ता नहीं बन सकता। तो फरिश्ते हो या कोई न कोई बोझ अभी रहा हुआ है? आइवेल के लिये थोड़ा-थोड़ा छिपाकर रखा है? मेरा-मेरा कहते मैले हो गये थे, अभी तेरा-तेरा कहते स्वच्छ बन गये। तो फ़रिश्ता अर्थात् मेरापन अंशमात्र भी नहीं। संकल्प में भी मेरे पन का भान आये तो समझो मैला हुआ। किसी भी चीज़ के ऊपर मैल चढ़ जाये तो मैल का बोझ हो जायेगा ना। तो ये मेरापन अर्थात् मैलापन। फ़रिश्ते हैं, पुरानी दुनिया से कोई रिश्ता नहीं। सेवा अर्थ हैं, रिश्ता नहीं है। सेवा भाव से सम्बन्ध में आते हो। गृहस्थी बनकर सेवा नहीं करते हो, सेवाधारी बनकर सेवा करते हो। ऐसे सेवाधारी हो? सेवास्थान समझते हो या घर समझते हो? तो जैसे सेवास्थान की विधि होती है उसी विधि प्रमाण चलते हो कि गृहस्थी प्रमाण चलते हो? सेवास्थान समझने की विधि है न्यारे और बाप के प्यारे। जरा भी मेरेपन का प्रभाव नहीं पड़े, आग है लेकिन सेक नहीं आये। क्योंकि साधन हैं ना। जैसे आग बुझाने वाले आग में जाते हैं लेकिन खुद सेक में नहीं आते, सेफ रहते हैं क्योंकि साधन हैं, अगर आग बुझाने वाले ही जल जाये तो लोग हंसेंगे ना। तो चाहे वायुमण्डल में परिस्थितियों की आग हो लेकिन प्रभाव नहीं डाले, सेक नहीं आये। ऐसे नहीं कि परिस्थिति नहीं है तो बहुत अच्छे और परिस्थिति आ गई तो सेक लग गया।
तो ऐसे फरिश्ते हो ना। फ़रिश्ता कितना प्यारा लगता है! अगर स्वप्न में भी किसके पास फ़रिश्ता आता है तो कितना खुश होते हैं। फ़रिश्ता जीवन अर्थात् सदा प्यारा जीवन। बाप प्यारे से प्यारा है ना तो बच्चे भी सदा सर्व के प्यारे से प्यारे हैं। सिर्फ बाल बच्चे, पोत्रे धोत्रों के प्यारे नहीं, हद के प्यारे नहीं, बेहद के प्यारे। क्योंकि सर्व आत्मायें आपका परिवार हैं, सिर्फ 10-12 का परिवार नहीं है। कितना बड़ा परिवार है? बेहद। सर्व के प्यारे। चाहे कैसी भी आत्मा हो, लेकिन आप सर्व के प्यारे हो। जो प्यार करे उसके प्यारे हो, ये नहीं। सर्व के प्यारे। लड़ाई करने वाले, कुछ बोलने वाले प्यारे नहीं। ऐसे नहीं, सर्व के प्यारे। आप लोगों ने द्वापर से बाप को कितनी गाली दी, फिर बाप ने प्यार किया या घृणा की? प्यार किया ना। तो फ़ालो फ़ादर। कैसी भी आत्मायें हो लेकिन अपनी दृष्टि, अपनी भावना प्यार की हो इसको कहा जाता है सर्व के प्यारे। 12 के प्यारे हैं, एक के प्यारे नहीं। नहीं, सर्व के प्यारे। ऐसे है या किसी आत्मा के प्रति थोड़ा-थोड़ा आ जाता है? कोई थोड़ा इन्सल्ट करते हैं, कोई घृणा करते हैं तो प्यार आता है या घृणा आती है? नहीं, परवश आत्मायें है। सर्व के प्यारे इसको कहा जाता है फ़रिश्ता। कोई-कोई के प्यारे हैं तो फरिश्ते नहीं।
अभी सोचकर बताओ कि कौन हो? मातायें क्या कहेंगी? सासू बहुत खराब है, ननद बहुत खराब है। नहीं, सब प्यारे हैं। किसी से और कोई भावना नहीं। चाहे वो क्या भी कहे, क्या भी करे लेकिन आपकी भावना शुद्ध हो। इसका भी कल्याण हो। सर्व प्रति कल्याण की भावना हो इसको कहते हैं फ़रिश्ता। मंज़िल तो ऊंची है ना या सहज है? तो ऐसी ऊंची अवस्था भी है? क्योंकि अगर फ़रिश्ता नहीं तो देवता भी कैसे बनेंगे? देवताई दुनिया में जायेंगे लेकिन पद प्राप्त नहीं कर सकते। नाम तो देवता होगा लेकिन पद क्या होगा? एक ही कॉलेज से कोई बड़ा बन जाये, इंजीनियर बन जाये, डॉक्टर बन जाये और कोई बूट पॉलिश वाला बन जाये तो अच्छा लगेगा? सतयुग में तो आयेंगे लेकिन पद क्या प्राप्त करना है वह भी सोचना। ऊंचा पद पाना है या जो मिले वो ठीक है? ऊंच पद पाने का साधन है फ़रिश्ता बनना। तो फरिश्ते की परिभाषा समझी ना। सभी बाप के बन गये। तो बाप का बनना अर्थात् बाप समान बनना। जैसे ब्रह्मा बाप फ़रिश्ता बना ना तो फ़ालो फ़ादर।
ग्रुप नं. 3 मैं परम पूज्य आत्मा हूँ - इस स्मृति से पवित्रता का फ़ाउन्डेशन मज़बूत करो
अपने को कल्प-कल्प की पूज्य आत्मायें अनुभव करते हो? स्मृति है कि हम ही पूज्य थे, हम ही हैं और हम ही बनेंगे? पूज्य बनने का विशेष साधन क्या है? कौन पूज्य बनते हैं? जो श्रेष्ठ कर्म करते हैं और श्रेष्ठ कर्मों का भी फ़ाउन्डेशन है पवित्रता। पवित्रता पूज्य बनाती है। अभी भी देखो जो नाम से भी पवित्र बनते हैं तो पूज्य बन जाते हैं। लेकिन पवित्रता सिर्फ ब्रह्मचर्य नहीं। ब्रह्मचर्य व्रत को धारण किया इसमें ही सिर्फ श्रेष्ठ नहीं बनना है। यह भी श्रेष्ठ है लेकिन साथ में और भी पवित्रता चाहिये। अगर मन्सा संकल्प में भी कोई निगेटिव संकल्प है तो उसे भी पवित्र नहीं कहेंगे, इसलिए किसी के प्रति भी निगेटिव संकल्प नहीं हो। अगर बोल में भी कोई ऐसे शब्द निकल जाते हैं जो यथार्थ नहीं है तो उसको भी पवित्रता नहीं कहेंगे। यदि संकल्प और बोल ठीक हों लेकिन सम्बन्ध-सम्पर्क में फ़र्क हो, किससे बहुत अच्छा सम्बन्ध हो और किससे अच्छा नहीं हो तो उसे भी पवित्रता नहीं कहेंगे। तो ऐसे मन्सा-वाचा-कर्मणा अर्थात् सम्बन्ध-सम्पर्क में पवित्र हो? ऐसे पूज्य बने हो? अगर मानो कोई भी बात में कमी है तो उसको खण्डित कहा जाता है। खण्डित मूर्ति की पूजा नहीं होती है। इसलिए जरा भी मन्सा, वाचा, कर्मणा में खण्डित नहीं हो अर्थात् अपवित्रता न हो, तब कहा जायेगा पूज्य आत्मा। तो ऐसे पूज्य बने हो? जड़ मूर्ति भी खण्डित हो जाती है तो पूजा नहीं होती। उसको पत्थर मानेंगे, मूर्ति नहीं मानेंगे। म्युज़ियम में रखेंगे, मन्दिर में नहीं रखेंगे। तो ऐसे पवित्रता का फ़ाउन्डेशन चेक करो कोई भी संकल्प आये, तो स्मृति में लाओ कि मैं परम पूज्य आत्मा हूँ। यह याद रहता है या जिस समय कोई बात आती है उस समय भूल जाता है, पीछे याद आता है? फिर पश्चाताप होता है ऐसे नहीं करते तो बहुत अच्छा होता। तो सदा पवित्र आत्मा हूँ, पावन आत्मा हूँ। पवित्रता अर्थात् स्वच्छता। स्वच्छता कितनी प्यारी लगती है। अगर मन्दिर भी हो, मूर्ति भी हो लेकिन स्वच्छता नहीं तो अच्छा लगेगा? तो मैं पूज्य आत्मा इस शरीर रूपी मन्दिर में विराजमान हूँ ये स्मृति सदा जीवन में लाओ। सिर्फ सोचो नहीं लेकिन जीवन में लाओ। सोचते तो बहुत हैं ना ये भी हूँ, ये भी हूँ... लेकिन प्रैक्टिकल अनुभव में आये। तो क्या याद रखेंगे? सम्पूर्ण पूज्य आत्मा हूँ। परसेन्टेज में नहीं 80 पर्सेन्ट पूज्य, 20 पर्सेन्ट खण्डित। नहीं। तो 100 पर्सेन्ट पूज्य अर्थात् 100 पर्सेन्ट पवित्र। सभी को स्वच्छता अच्छी लगती है या कचरा अच्छा लगता है? तो अपने से पूछो कि मन स्वच्छ बना है, बुद्धि स्वच्छ बनी है? या थोड़ी-थोड़ी स्वच्छ बनी है, थोड़ी-थोड़ी अस्वच्छ है? अगर यहाँ कचरा पड़ा हो तो आप उस पर बैठेंगे? उस पर बैठना अच्छा नहीं लगेगा ना। तो ऐसे सोचो कि जरा भी अपवित्रता अर्थात् कचरा है तो बाप को अच्छा नहीं लगेगा। कचरा है तो बाप के प्यारे तो नहीं हुए ना। ब्राह्मण बने ही हो बाप का प्यारा बनने के लिए। पूज्य आत्मायें सर्व की प्यारी हैं। जड़ मूर्ति है लेकिन कितनी प्यारी लगती है। अपने चैतन्य परिवार से इतना प्यार नहीं होगा जितना मूर्ति से प्यार होगा। आपस में झगड़ेंगे लेकिन मूर्ति को प्यार करेंगे। क्यों प्यार करते हैं? पवित्रता है ना। पवित्रता अर्थात् जरा भी अपवित्रता नहीं हो। सभी को सुनाते हो ना कि अगर एक बूंद भी विष की एक मण दूध में पड़ जाये तो सारा विष हो जायेगा। ऐसे अगर जरा भी अशुद्धि है तो कौन-सी आत्मा कहलायेंगे? शुद्ध या अशुद्ध? कहेंगे आधे हाफ कास्ट हैं। तो सदा हर कर्म करते, संकल्प करते, बोल बोलते ये चेक करो कि बाप को प्यारे कौन हैं? पवित्र आत्मा या मिक्स आत्मा? पवित्र आत्मा प्यारी है क्योंकि बाप सदा परम पवित्र है तो उसको प्यारी भी पवित्रता लगती है। तो इस वर्ष में क्या करेंगे? जरा भी खण्डित नहीं। सदा परमपूज्य। कमाल करके दिखायेंगे ना कि सोचेंगे, देखेंगे? नहीं। करेंगे। हाथ उठाने का फोटो निकल रहा है। अच्छा है बाप तो सदा ही बच्चों में निश्चय रखते हैं। बहुत अच्छा और बढ़ते चलो, उड़ते चलो। जो ओटे वो अव्वल नम्बर अर्जुन। बाप तो सबको अव्वल नम्बर ही देखता है। सेकेण्ड थर्ड तो नहीं आना है ना कि चलो, पर उपकार करते हैं, उसको पहला नम्बर देते हैं। ऐसा तो नहीं सोचते? पुरुषार्थ में रेस भले करो, और बातों में रेस नहीं करो। तो सिर्फ पूज्य नहीं परम पूज्य आत्मायें हैं यह सदा स्मृति में रहे। देखना यहाँ पूज्य कहकर जाओ और वहाँ खण्डित हो जाओ। फिर कहो कि ठोकर लगी तो खण्डित हो गये। कितना भी कोई ठोकर लगाये लेकिन खण्डित नहीं हो। चाहे कितना भी बड़ा मोटा हैमर लगाये लेकिन खण्डित नहीं होना। तो पक्का याद रखेंगे ना। देखेंगे रिजल्ट। अच्छा!
ग्रुप नं. 4 स्वयं सन्तुष्ट रहना और दूसरों को सन्तुष्ट करना - यही कर्मयोगी की मुख्य निशानी है
सभी अपने को सहजयोगी अनुभव करते हो? सहज की निशानी क्या है? उसमें मेहनत नहीं होगी। वह सदा होगी, निरन्तर होगी। मुश्किल काम होता है तो सदा नहीं कर सकते। जो सहज होगा वह स्वत: और निरन्तर चलता रहेगा। तो सहज योगी अर्थात् निरन्तर योगी। कभी साधारण, कभी योगी, ऐसे नहीं? योगी जीवन है तो जीवन सदा होती है। इसलिए योग लगाने वाले नहीं, लेकिन योगी जीवन वाले। ब्राह्मण जीवन है तो योग कभी नीचे-ऊपर हो ही नहीं सकता। क्योंकि सिर्फ योगी नहीं हो लेकिन कर्मयोगी हो। तो कर्म के बिना एक सेकेण्ड भी रह नहीं सकते। अगर सोये भी हो तो सोने का कर्म तो कर रहे हो ना। तो जैसे कर्म के बिना रह नहीं सकते ऐसे योगी जीवन वाले योग के बिना रह नहीं सकते। ऐसे अनुभव करते हो या योग टूटता है, फिर लगाना पड़ता है? फिर कभी लगता है, कभी टाइम लगता है ऐसे तो नहीं है ना। योग का सहज अर्थ ही है याद। तो याद किसकी आती है? जो प्यारा लगता है। सारे दिन में देखो कि याद अगर आती है तो प्यारी चीज़ होती है। तो सबसे प्यारे से प्यारा कौन है? (बाबा) तो सहज और स्वत: याद आयेगा ना। अगर कहाँ भी, चाहे देह में, देह के सम्बन्ध में, पदार्थ में प्यार होगा तो बाप के बदले में वो याद आयेगा। कभी-कभी देह से प्यार हो जाता तो बॉडी कॉन्सेस हो जाते हो। तो चेक करना है कि सिवाय बाप के और कोई आकर्षित करने वाली वस्तु या व्यक्ति तो नहीं है?
कर्मयोगी आत्मा का हर कर्म योगयुक्त, युक्तियुक्त होगा। अगर कोई भी कर्म युक्तियुक्त नहीं होता तो समझो कि योगयुक्त नहीं है। अगर साधारण कर्म होता, व्यर्थ कर्म हो जाता तो भी निरन्तर योगी नहीं कहेंगे। कर्मयोगी अर्थात् हर सेकेण्ड, हर संकल्प, हर बोल सदा श्रेष्ठ है। तो सहज योगी अर्थात् कर्मयोगी और कर्मयोगी अर्थात् सहजयोगी। तो चेक करो कि सारे दिन में कोई साधारण कर्म तो नहीं होता? श्रेष्ठ हुआ? श्रेष्ठ कर्म की निशानी होगी स्वयं सन्तुष्ट और दूसरे भी सन्तुष्ट। ऐसे नहीं मैं तो सन्तुष्ट हूँ, दूसरे हों या नहीं हो। योगी जीवन वाले का प्रभाव स्वत: दूसरों के ऊपर पड़ेगा। अगर कोई स्वयं से असन्तुष्ट है वा और उससे असन्तुष्ट रहते हैं तो समझना चाहिये कि योगयुक्त बनने में कोई कमी है। तो सभी सन्तुष्ट रहते हो कि अपने को खुश करते हो कि मैं बिल्कुल ठीक हूँ? सभी सन्तुष्ट हैं या कोई सन्तुष्ट, कोई असन्तुष्ट? अपने से सन्तुष्ट रहते हो? कि कभी कोई कमजोरी आती है तो असन्तुष्ट होते हो? कभी होता है या सम्पूर्ण हो गये? सन्तुष्टता योगी जीवन का विशेष लक्ष्य है। तो आपके साथियों से पूछे कि सन्तुष्ट हैं या नहीं हैं? वो हाँ कहेंगे या थोड़ी शक्ल ऐसी करेंगे? क्योंकि योगी जीवन के तीन सर्टीफिकेट हैं। एक स्व से सन्तुष्ट और दूसरा बाप सन्तुष्ट और तीसरा लौकिक-अलौकिक परिवार सन्तुष्ट। तो तीनों सर्टीफिकेट हैं कि लेना है? जैसे साइन्स के साधनों का वायुमण्डल में प्रभाव पड़ता है ना, एयरकण्डीशन चलता है तो वायुमण्डल में ठण्डाई का प्रभाव पड़ता है, ऐसे ही योगी जीवन का प्रभाव होता है। ऐसा प्रभाव है? योग माना साइलेन्स की शक्ति। इसको कहा जाता है योगी जीवन अर्थात् साइलेन्स की शक्ति वाली जीवन। तो ऐसे है कि हाँ-हाँ करते रहते हो? हर रोज़ की चेकिंग हो। चेक करेंगे तो चेंज होंगे। अच्छा!
ग्रुप नं. 5 प्रत्यक्षफल की प्राप्ति होना - यही संगमयुग की सबसे बड़ी विशेषता है
अपने को संगमयुगी ब्राह्मण आत्मायें समझते हो? संगमयुग की महिमा को अच्छी तरह से जानते हो ना? संगमयुग की सबसे बड़ी विशेषता क्या है? बाप और बच्चों का, आत्मा और परमात्मा का मेला संगम पर लगता है। इस समय संगमयुग पर है बाप और बच्चों का मेला और लोगों ने यहाँ नदियों के मेले को संगम बना दिया है। तो यह किससे कॉपी की है? इस समय को कॉपी की है ना। और संगमयुग की क्या विशेषता है जो और किसी युग की नहीं है? सबसे अच्छी विशेषता है कि संगमयुग पर ही प्रत्यक्षफल मिलता है। तो ये विशेषता है ना। सतयुग में संगम के कर्म का फल मिलेगा। लेकिन यहाँ बाप का बना और वर्सा मिला। सेवा की और सेवा करने के साथ-साथ खुशी मिली। जो भी याद में रहकर सेवा करते हो वा कोई भी कर्म करते हो तो कर्म का प्रत्यक्षफल अनुभव करते जाओ। अगर कर्म किया, सेवा की और प्रत्यक्षफल के रूप में कोई अनुभव नहीं होता तो चेक करो क्यों फल नहीं मिला? अगर कर्म में स्वार्थ होगा, सेवा में स्वार्थ होगा तो फल नहीं मिलेगा। लेकिन योगयुक्त कर्म वा योगयुक्त यथार्थ सेवा का फल खुशी, अतीन्द्रिय सुख या डबल लाइट की अनुभूति, कोई न कोई बाप के गुणों की अनुभूति ज़रूर होती है। तो प्रत्यक्षफल खाने वाले हो ना! खाते हो? तो जो प्रत्यक्षफल खाने वाला है उसको क्या अनुभूति होगी? सदा मन और बुद्धि तन्दुरुस्त होगी। अगर कमजोर रहती है तो समझो ताजा प्रत्यक्षफल नहीं खाते हो। लोग शरीर के लिये फ्रेश फ्रूट क्यों खाते हैं? हेल्थ के लिये खाते हैं ना। तो ये आत्मा के लिए प्रत्यक्षफल सदा हेल्दी बनाता है। इसलिये ही आपका स्लोगन है एवर हेल्दी, एवर वेल्दी और एवर हैप्पी। एवर वेल्दी भी हो ना? कितने ख़ज़ाने मिले हैं? ज्ञान का ख़ज़ाना, शक्तियों का ख़ज़ाना, गुणों का ख़ज़ाना, समय का ख़ज़ाना सब ख़ज़ाने हैं ना या कोई है, कोई नहीं है? इतना ज्यादा है जो दूसरों को भी देते रहते हैं। महादानी हो ना। रोज़ देते हो या कभी-कभी देते हो? अखण्ड महादानी। चाहे मनसा से दो, चाहे वाणी से दो, चाहे सम्बन्ध-सम्पर्क से दो लेकिन देना ज़रूर है। ये तो सहज है या चान्स मिलेगा तो देंगे? क्या सोचते हो? अखण्ड है ना? फ़ालो फ़ादर करने वाले हो ना? जिससे प्यार होता है उसको फ़ालो करना सहज होता है। तो बाप से कितना प्यार है? (अनलिमिटेड) तो ख़ज़ाने भी अनलिमिटेड, सेवा भी अनलिमिटेड। बेहद है ना। हद तो नहीं है ना। सदा बेहद की खुशी, बेहद का नशा, बेहद की प्राप्ति।
डबल विदेशी इस वर्ष में क्या नवीनता करेंगे? (पुरुषार्थ में फर्स्ट नम्बर लेंगे) फर्स्ट नम्बर में तो आयेंगे लेकिन और क्या करेंगे? अपने-अपने स्थान पर जहाँ से भी आये हो, अपने सेवास्थान वा अपने देश में सारे वायुमण्डल को ऐसा शक्तिशाली बनाओ जो सबके सब अचल रहें, कोई हलचल में नहीं आये। ये कर सकते हो? इस वर्ष एक भी ब्राह्मण हलचल में नहीं आये। ऐसा वातावरण बनाओ। इस वर्ष में यही देखेंगे। स्वयं निर्विघ्न तो बनना ही है लेकिन औरों को भी बनाना है। हिम्मत है ना?