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14 Feb 1978
“समीप आत्मा की निशानियाँ”
14 February 1978 · हिंदी
स्वयं को सदा बापदादा के साथ अर्थात् सदा समीप अनुभव करते हो? समीप आत्मा की निशानी क्या होगी? जितना जो समीप होगा उतना स्थिति में, कर्तव्य में, गुणों में बाप समान अर्थात् सदा सम्पन्न अर्थात् दाता होगा। जैसे बाप हर सेकण्ड और संकल्प में विश्व कल्याणकारी हैं वैसे बाप समान विश्व कल्याणकारी होगा। विश्व कल्याणकारी का हर संकल्प हर आत्मा के प्रति, प्रकृति के प्रति शुभ भावना वाला होगा। एक भी संकल्प शुभ भावना के सिवाए नहीं होगा। जैसे बीज फल से भरपूर होता है अर्थात् सारे वृक्ष का सार बीज में भरा हुआ होता है, ऐसे संकल्प रूपी बीज में शुभ भावना, कल्याण की भावना, सर्व को बाप समान बनाने की भावना, निर्बल को बलवान बनाने की भावना, दु:खी अशान्त को स्वयं की प्राप्त हुई शक्तियों के आधार से सदा सुखी, शान्त बनाने की भावना, यह सर्व रस या सार हर संकल्प में भरा हुआ होगा। कोई भी संकल्प रूपी बीज इस सार से खाली अर्थात् व्यर्थ नहीं होगा। कल्याण की भावना से समर्थ होगा।
जैसे स्थूल साज़ आत्माओं को अल्पकाल के लिए हुल्लास में लाते हैं। न चाहते हुए भी सबके पाँव नाचने लगते हैं ना, मन नाचने लगता है, वैसे विश्व कल्याणकारी का हर बोल रूहानी साज़ के समान उत्साह और उमंग दिलाता है। उदास आत्मा बाप से मिलन मनाने का अनुभव करती और खुशी में नाचने लग पड़ती है। विश्व कल्याणकारी का कर्म, कर्मयोगी होने के कारण हर कर्म चरित्र के समान गायन योग्य होता है। हर कर्म की महिमा कीर्तन करने योग्य होती। जैसे भक्त लोग कीर्तन में वर्णन करते हैं - देखना अलौकिक, चलना अलौकिक.... हर कर्मेन्द्रिय की महिमा अपरम्पार करते रहते हैं, ऐसे हर कर्म महान अर्थात् महिमा योग्य होता है। ऐसी आत्मा को कहा जाता है बाप समान समीप आत्मा। ऐसे विश्व कल्याणकारी आत्मा का हर सेकण्ड का सम्पर्क आत्मा को सर्व कामनाओं की प्राप्ति का अनुभव कराता है। कोई आत्मा को शक्ति का, कोई को शान्ति का, मुश्किल को सहज करने का, अधीन से अधिकारी बनने का, उदास से हर्षित होने का, इसी प्रकार विश्व कल्याणकारी महान् आत्मा का सम्पर्क सदा उमंग और उत्साह दिलाता है। परिवर्तन का अनुभव कराता है, छत्रछाया का अनुभव कराता है। ऐसे विश्व कल्याणकारी अर्थात् समीप आत्मा बनने वाले, ऐसे को ही लगन में मगन रहने वाली आत्मा कहा जाता है। ऐसे बन रहे हो ना?
लकी तो सभी हो, जो बाप ने अपना बना लिया। बाप ने बच्चों को स्वीकार किया अर्थात् अधिकारी बनाया। यह अधिकार तो सबको मिल ही गया। लेकिन विश्व का मालिक बनने का अधिकार, विश्व कल्याणकारी बनने के आधार से होगा। अब हरेक अपने आपसे पूछो - अधिकारी बने हैं? राज्य-भाग्य के अधिकारी बने हैं? तख्तनशीन बनने के अधिकारी बने हैं या रॉयल फैमिली में आने के अधिकारी बने हैं?
विदेशी आत्माएं अपने को क्या समझती हैं? सब राज्य करेंगे या राज्य में आयेंगे? क्या जो मिलेगा वह मंजूर है? विदेशी आत्माओं में से सतयुग की 8 बादशाही में तख्तनशीन बनने के उम्मीदवार कौन समझता है? 8 की बादशाही में से लक्ष्मी-नारायण दी फर्स्ट, सेकण्ड उसमें आयेंगे। 8 बादशाही में आने के लिए क्या करना पड़ेगा? या यह सोचा है कि सिर्फ 8 ही हैं। बहुत सिम्पल बात है, यह देखो कि हर समय हर परिस्थिति में अष्ट शक्तियां साथ-साथ इमर्ज रूप में होती हैं? अगर दो-चार शक्तियां हैं और एक भी शक्ति कम है तो अष्ट बादशाहियों में नहीं आ सकते। अष्ट शक्तियों की समानता हो और एक ही समय अष्ट ही शक्तियां इमर्ज चाहिए। ऐसे भी नहीं कि सहन शक्ति 100 परसेन्ट लेकिन निर्णय शक्ति 60 परसेन्ट या 50 परसेन्ट है। दोनों में समानता चाहिए अर्थात परसेन्टेज फुल चाहिए, तब ही सम्पूर्ण राज गद्दी के अधिकारी होंगे। अब बताओ क्या बनेंगे? अष्ट लक्ष्मी-नारायण के राज्य या तख्त के अधिकारी होंगे?
विदेशी आत्माओं में उमंग और हिम्मत अच्छी है। हिम्मते बच्चे मददे बाप। हाईजम्प का सैम्पुल बन सकते हैं। लेकिन यह सब बातें ध्यान में रखनी पड़ेगी। विशेष आत्माएं हो तब तो बाप दादा भी जानते हैं, रेस में नम्बरवन दौड़ लगाने वाले ऐसे उमंग उत्साह वाले दूर रहते भी समीप अनुभव करने वाले, ऐसी आत्मायें भी हैं जरूर। अब स्टेज पर प्रैक्टिकल में अपना पार्ट बजाओ। पुरुषार्थ को आगे बढ़ाना है। फर्स्ट नम्बर की विशेषता क्या है, उसी प्रमाण अपना पुरुषार्थ करना है, हर कर्म में चढ़ती कला हो। अच्छा।
अफ्रीका पार्टी :- सब तीव्र पुरुषार्थी हो ना? तीव्र पुरुषार्थी अर्थात् सोचा और किया। सोचने और करने में अन्तर नहीं। जैसे कई बातों में प्लैन बहुत बनाते हैं, प्रैक्टिकल में अन्तर हो जाता है, तो तीव्र पुरुषार्थी जो होगा वह जो प्लैन बनायेगा वही प्रैक्टिकल होगा। तो ऐसे तीव्र पुरुषार्थी हो ना? पराया राज्य होने के कारण परिस्थितियां तो आपके तरफ बहुत आती हैं, लेकिन जो सदा बाप के साथ है उसके आगे परिस्थिति भी स्व-स्थिति के आधार पर परिवर्तन हो जाती है। पहाड़ भी राई बन जाता है। ऐसे अनुभव करेंगे जैसे कई बार यह सब बातें पार कर चुके हैं, नथिंग न्यु। नई बातों में घबराना होता है लेकिन नथिंग न्यु। ऐसा अनुभव करने वाले सदा कमल पुष्प के समान रहते हैं। जैसे पानी नीचे होता है, कमल ऊपर रहता है, इसी प्रकार परिस्थिति नीचे है, हम ऊपर हैं, नीचे की बात नीचे। कभी कोई बात आवे तो सोचो बापदादा हमारे साथ है। आलमाइटी के आगे कितनी भी बड़ी परिस्थिति चींटी के समान है। कैसी भी परिस्थिति हो लेकिन जो बाप के बने हैं उनका बाप जिम्मेवार है। सोचो नहीं - कहाँ रहेंगे, कैसे रहेंगे, क्या खायेंगे। सच्चे दिल का साथी बाप है। जब तक बाप है तब तक भूखे नहीं रह सकते। जब भक्तों को अनेक प्रकार के अनुभव होते हैं, वह तो भिखारी हैं उनका भी पेट भर जाता है तो आप तो अधिकारी हैं, आप भूखे कैसे रह सकते! इसलिए जरा भी घबराओ नहीं, क्या होगा? जो होगा वह अच्छा होगा। सिर्फ छोटा सा पेपर होगा कि कहाँ तक निश्चय है? पेपर सारे जीवन का नहीं होता, एक या दो घण्टे का पेपर होता है। अगर बापदादा सदा साथ है, पेपर देने के टाइम पर एक बल एक भरोसा है तो बिल्कुल ऐसे पार हो जायेंगे जैसे कुछ था ही नहीं। जैसे स्वप्न होता है ना, स्वप्न की जो बातें होती वह उठने के बाद समाप्त हो जाती, तो यह भी दिखाई बड़ा रूप देता लेकिन है कुछ नहीं। तो ऐसे निश्चयबुद्धि हो? हरेक के मस्तक के ऊपर विक्टरी का तिलक लगा हुआ है तो ऐसी आत्मायें जो हैं ही विजय के तिलक वाले, उनकी हार हो नहीं सकती। मेहनत करके आये हो, परिस्थिति पार करके आये हो इसलिए बापदादा भी मुबारक देते हैं। यह भी ड्रामा में है। जैसे स्टीमर टूट जाता है तो कोई कहाँ, कोई कहाँ जाकर पड़ते हैं, तो यह भी द्वापर में सब बिछुड़ गये, कोई विदेश में कोई देश में, अभी बाप बिखरे हुए बच्चों को इकट्ठे कर रहे हैं। अभी बेफिकर रहो। कुछ भी होगा तो पहले बाबा के सामने आयेगा। महावीर हो ना। कहानी सुनी है ना भट्ठी के बीच पूंगरे बच गये। क्या भी हो लेकिन आप सेफ हो, सिर्फ माया प्रूफ की ड्रेस पड़ी होनी चाहिए। ड्रेस तो सदा साथ रहती है ना माया प्रूफ की? प्लैन में भी देखो एमर्जेन्सी में ड्रेस देते हैं कि कुछ हो तो पहन लेना। तो आपको बहुत सहज साधन मिला है।
एक-एक रत्न वैल्युएबल है क्योंकि अगर वैल्युएबल रत्न नहीं होते तो कोटों में कोई आप ही कैसे आते। जिसको दुनिया अपनाने के लिए तड़प रही है, उसने मुझे अपना लिया। एक सेकण्ड के दर्शन के लिए दुनिया तड़प रही है, आप तो बच्चे बन गये तो कितना नशा, कितनी खुशी होनी चाहिए, सदा मन खुशी में नाचता रहे। वर्तमान समय की खुशी का नाचना भविष्य चित्र में भी दिखाते हैं। कृष्ण को सदैव डान्स के पोज़ में दिखाते हैं ना।
जैसे बाप जैसा कोई नहीं, वैसे आपके भाग्य जैसा और कोई भाग्यशाली नहीं। अच्छा - जो नहीं पहुँच सके हैं उन्हों को भी बहुत-बहुत याद देना। बापदादा का स्नेह अवश्य समीप लाता है। अमृतवेले उठ बाप से रूह-रूहान करो तो सब परिस्थतियों का हल स्पष्ट दिखाई देगा। कोई भी बात हो उसका रेसपांस रूह-रूहान में मिल जायेगा। मधुबन वरदान भूमि से विशेष यह वरदान लेकर जाना तो और भी लिफ्ट मिल जायेगी। जब बाप बैठे हैं बोझ उठाने के लिए तो खुद क्यों उठाते? जितना हल्का होंगे उतना ऊपर उड़ेगे। अनुभव करेंगे कि कैसे हल्के बनने से ऊंची स्टेज हो जाती है।
बाप को जान लिया, पा लिया इससे बड़ा भाग्य तो कोई होता नहीं। घर बैठे बाप मिल गया। बाप ने ही आकर जगाया ना बच्चे उठो, देश कोई भी हो लेकिन स्थिति सदा बाप के साथ रहने की हो, चाहे देश से दूर है लेकिन बाप के साथ रहने वाले नजदीक से नजदीक हैं। कुमारियां निर्बन्धन हैं, किसलिए? सेवा के लिए। ड्रामा में यह भी एक लिफ्ट है। इस लिफ्ट का लाभ लेना चाहिए। जितना-जितना अपना समय ईश्वरीय सेवा में लगाती जायेगी तो लौकिक सर्विस का भी सहयोग मिलेगा, बन्धन नहीं होगा। कुमारियां बाप को अति प्रिय हैं क्योंकि जैसे बाप निर्बन्धन है वैसे कुमारियां हैं। तो बाप समान हो गई ना। अच्छा।
ट्रीनीडाड ग्याना :- वरदान भूमि में आकर अनेक वरदानों से स्वयं को सम्पन्न बनाया। मधुबन है ही कमाई से झोली भरने का स्थान। मधुबन आना अर्थात् अपने को वर्तमान और भविष्य के अधिकारी बनने का स्टैम्प लगाना। अधिकारी बनने का साधन है, माया की अधीनता को छोड़ना। तो अधिकारी हो ना। अच्छा।
कैनाडा :- कैनाडा ने कितने रत्न निकाले हैं। क्वान्टिटी नहीं तो क्वालिटी तो है। जब एक दीपक से दीपमाला हो जाती है तो एक से इतने तो बने हैं ना। इसलिए एक-एक को समझना चाहिए कि मुझ एक को अनेकों को सन्देश देकर माला तैयार करनी है। जो भी सम्पर्क में आये उन्हें बाप का परिचय देते चलो तो कोई न कोई निकल आयेगा। हिम्मत नहीं हारना कि कोई निकलता नहीं, निकलेंगे। कोई-कोई धरनी फल थोड़ा देरी से देती है कोई जल्दी से। इसलिए जहाँ भी ड्रामा अनुसार सेवा के निमित्त बने हो तो जरूर कोई रत्न है तभी निमित्त बने हो। लक्ष्य पावरफुल रखो कि अब हमें सेवा से सबूत देना ही है। तो मेहनत से सफलता हो ही जायेगी।
लेस्टर :- सदा अतीन्द्रिय सुख में झूमने वाले हो ना। बाप मिला, सब कुछ मिला, इसी स्मृति से अतीन्द्रिय सुख की अनुभूति ऑटोमेटिकली हो जायेगी। दु:ख की अविद्या, दु:ख का नाम निशान नहीं। जैसे भविष्य में दु:ख और अशान्ति का अज्ञान होगा वैसे अभी भी अनुभव करेंगे कि दु:ख अशान्ति की दुनिया ही और है। वह कलियुगी है, हम संगमयुगी हैं। संगमयुगी के पास दु:ख अशान्ति का नाम नहीं, दु:खी को देख तरस आयेगा। दु:ख का अनुभव तो बहुत समय किया। अब संगमयुग है ही अतीन्द्रिय सुख में रहने का समय, यह अनुभव सतयुग में भी नहीं होगा। जैसा समय वैसा लाभ लो। सीजन है अतीन्द्रिय सुख पाने की, तो सीजन में न पाया तो फिर कब पायेंगे। बाप की याद ही झूला है, इस झूले में ही झूलते रहो, इससे नीचे नहीं आओ। लेस्टर का भी सर्विस में नम्बर आगे है। लन्दन में लेस्टर की महिमा भी अच्छी है। रहमदिल हैं जो हमजिन्स को बढ़ाते जाते। कुमार, कुमारियाँ, युगल सब वृद्धि को पाते जा रहे हैं, रिजल्ट अच्छी है, लेकिन और भी बढ़ाओ। ऐसी संख्या बढ़ जाये जो जहाँ देखो वहाँ ब्राह्मण ही दिखाई दें।
मॉरीशियस :- सदा स्वयं बाप द्वारा सर्व प्राप्तियों से सम्पन्न समझते हो? जैसे बाप सागर है, सागर अर्थात् सम्पन्न, वैसे ही अपने को सम्पन्न समझते हो? अगर सम्पन्न नहीं हो तो माया का वार किसी न किसी रूप में होता रहेगा। सम्पन्न अर्थात् माया जीत। संगम पर ही मायाजीत बनने की बात है, सतयुग में नहीं। मायाजीत वर्तमान का टाइटिल है, उसका अभी अनुभव करना है, जितनी लगन उतना निर्विघ्न। अच्छा।
हांगकांग :- सदा एक ही लगन रहती है? अपनी हमजिन्स को जगाने की। अपने बिछड़े हुए परिवार की माला में पिरोयें यही लगन रहती है? इसके सिवाए और जो कुछ भी करते हैं वो निमित्त मात्र। लौकिक में रहते न्यारे और प्यारे बनना है। अज्ञानी आत्माओं से हिसाब-किताब चुक्तू करने हैं। सम्बन्ध सम्पर्क में रहते बिल्कुल पानी से ऊपर, कीचड़ से ऊपर कमल समान रहना है। ऐसी स्थिति रहती है कि थोड़ा सा मोह है? नष्टोमोहा बनने का तरीका है अपनी जिम्मेवारी नहीं समझो, जिम्मेवारी समझते तो मोह हो जाता, जिम्मेवारी छोड़ना अर्थात् नष्टोमोहा। खुद स्वयं को बच्चा समझो, बड़ा नहीं। बच्चा समझना अर्थात् नष्टोमोहा होना। बड़ा समझते तो बाप भूल जाता। बच्चा समझने से बाप की याद स्वत: आयेगी। हांगकांग की धरनी कम नहीं है, फलीभूत धरनी है और अनेक फल निकल सकते हैं। सिर्फ शक्ति सेना महावीरनी बन स्टेज पर जाओ। खुशी का जो अखुट खज़ाना मिला है, इसी खज़ाने में सदा खेलते रहो। याद का रिटर्न यादगार बनकर दिखाओ।
लन्दन :- सदैव अपने को लाइट हाउस और माइट हाउस समझते हो? अनेक आत्माओं को अन्धियारे से रोशनी में लाना यह लाइट हाउस का कर्तव्य है। तो हर एक अपने को ऐसा लाइट हाउस अनुभव करते हो? जैसा बाप वैसा बच्चा। जो बाप का धन्धा, वही बच्चे का। तो बाप दाता है तो हरेक बच्चे को भी यही लक्ष्य रखना है कि हमें भी दाता बनना है। वरदान भूमि में पहुँचने वाली आत्मायें विश्व-कल्याण के निमित्त बन सकती हैं। यह अनुभव करते हो कि हम वरदान भूमि पर पहुंचे हुए हैं? नये-नये क्या समझते हैं? ऐसा भाग्य जो विदेश से इस भूमि पर अधिकारी बनकर आये हो। ऐसा भाग्य अब तक भक्त लोग गायन करते हैं कि ऐसा भाग्य कब मिल जाए तो ऐसे अपने को भाग्यशाली अनुभव करते हो? बाप तो हरेक बच्चे को अपने से भी ऊंचा बनाते हैं इसलिए बच्चे को कहते ही हैं सिरताज। ऐसा सिरताज अपने को समझते हो? माया से घबराते तो नहीं? माया को जन्म देने वाले भी आप हो। जब कमजोर होते तो माया को जन्म देते, कमजोर न हो तो माया जन्म ही ना ले। ना जन्म दो न घबराओ। मायाजीत बनने का वरदान संगम पर बाप द्वारा मिला है। यह तो अनुभव करते हो कि हम कल्प पहले वाले हैं। जब यह याद है कि हम कल्प पहले वाले हैं तो कल्प पहले क्या किया था? कल्प-कल्प के विजयी हो, यह स्मृति रहे तो कोई भी बात बड़ी नहीं लगेगी, सहज लगेगी।
आस्ट्रेलिया :- पाण्डव सेवा और शक्ति सेना को देख बापदादा भी हर्षित होते हैं। हरेक ने मायाजीत बनने का दृढ़ संकल्प किया है ना। सारा ग्रुप चैलेन्ज करने वाला है। सब महावीर महावीरनियाँ हो ना? सदैव अपनी तकदीर को देखते हर्षित रहो तो आप सबको हर्षित देख अनेक दु:खी आत्मायें सुख अनुभव करेंगी। आपकी खुशी अनेकों को बाप का परिचय दिलायेगी। हरेक चलता फिरता म्यूजियम बन जाये। जैसे म्यूजियम के चित्र परिचय दिलाते हैं वैसे आपका चैतन्य चित्र अनेकों को बाप का परिचय दे या प्राप्ति कराये - ऐसे सर्विसेबुल बनो। हिम्मत बहुत अच्छी रखी है। अभी हिम्मत के साथ जो भी कदम उठाते हो वह योगयुक्त हों। पहले ईश्वरीय मर्यादा प्रमाण है या नहीं वह वेरीफाय कराकर अमल में लाते जाओ। फिर एक-एक एग्जाम्पल बन जायेंगे, और भी ज्यादा फुलवाड़ी को बढ़ाओ। जैसे अगले वर्ष से भी अभी बड़ा गुलदस्ता बनाया ना, अभी इससे बड़ा बनाना। कोई भी प्रकार की परिस्थिति आवे उसको पार करने का सहज साधन है बापदादा का साथ। अगर नहीं तो मुश्किल लगेगा। कितना भी कोई निर्बल है लेकिन सर्वशक्तिमान का साथ है तो शक्तिशाली बन जाता है। अकेला नहीं समझो एक-एक बहुत कमाल कर सकते हैं। जैसे दुनिया वाले बताते हैं कि एक-एक सितारे में दुनिया है, उन सितारों में तो दुनिया नहीं लेकिन आप जो लकी सितारे हो उन एक-एक सितारों में दुनिया अर्थात् अपनी-अपनी राजधानी है। तो एक-एक को अपनी-अपनी राजधानी स्थापन करनी है। कुमारियों को देख बापदादा हर्षित होते हैं, कुमारियाँ बहुत सर्विस में आगे जा सकती हैं। हरेक कुमारी को लक्ष्य रखना चाहिए कि मुझे विश्व सेवाधारी बनना है। यह लौकिक सर्विस तो निमित्त मात्र है। लक्ष्य यह रखो तो हम खुद जग करके जगत को जगाने वाली हैं। यह कुमारियों का संगठन बाप को प्रत्यक्ष कर सकता है। तो अगले वर्ष में विश्व कल्याणकारी की स्टेज लगी हुई हो। अच्छा।
ग्याना पार्टी :- (11-2-78) बापदादा तो हरेक को दिलतख्तनशीन देखते हैं। जैसे कोई बहुत प्रिय बच्चे होते हैं या सिकीलधे लाडले होते जो उनको कभी नीचे धरनी या मिट्टी पर पांव नहीं रखने देते। तो बापदादा भी लाडले बच्चों को दिलतख्त के नीचे उतरने नहीं देते वहाँ ही विराजमान रखते। इससे श्रेष्ठ स्थान और कोई है? तो सदा वहाँ ही रहते हो ना? नीचे तो नहीं आते हो? जब और कोई स्थान है ही नहीं तो बुद्धि रूपी पांव और कहाँ टिक सकते हैं? याद अर्थात् दिलतख्तनशीन। बापदादा को जो निरन्तर योगी बच्चे हैं वह सदा साथ रहते हुए नजर आते हैं। सहजयोगी हो ना। मुश्किल तो नहीं लगता? कोई भी परिस्थिति जो भल हलचल वाली हो लेकिन बाबा कहा और अचल। तो बाबा कहने में कितना टाइम लगता है। परिस्थिति के संकल्प में चले जाते हैं तो जितना समय परिस्थिति का संकल्प रहता उतना समय मुश्किल लगता। अगर कारण के बजाए निवारण में चले जाओ तो कारण ही निवारण बन जाये। ब्राह्मणों के आगे कोई परिस्थिति होती नहीं, क्योंकि मास्टर सर्वशक्तिमान हैं। उनके आगे यह परिस्थितियाँ चींटी समान भी नहीं। सिर्फ होता क्या है, जब कोई ऐसी बातें आती हैं तो उस समय उस कारण में समय लगा देते हैं। क्यों हुआ? कैसे हुआ? उसके बजाए यह सोचें जो हुआ उसमें कल्याण भरा हुआ है, सेवा समाई हुई है तो चेन्ज हो जायेगा। भल रूप सरकमस्टान्सेज का हो लेकिन समाई सर्विस है ऐसा सोचने से और इस रूप से देखने से सदा अचल रहेंगे। तो अभी मधुबन में क्या परिवर्तन करके जायेंगे? सदा कम्पलीट, कम्पलेन नहीं। अब तक जो रिजल्ट है उसका प्रमाण अच्छा है। अब चारों ओर आवाज फैलाने का बहुत जल्दी प्रयत्न करो क्योंकि अभी समय है फिर इच्छा होगी लेकिन सरकमस्टान्सेज ऐसे होंगे कि कर नहीं सकेंगे। इसलिए जितना जल्दी हो सके चक्रवर्ती बन सन्देश देते जाओ, बीज बोते जाओ। लकी हो जो ड्रामा अनुसार अपने जीवन से, वाणी से, कर्म से, सर्व रीति से सेवा करने के निमित्त हो और आगे भी बन सकते हो। हर कर्म में सबको ज्ञान का स्वरूप दिखाई दे - यही विशेष लक्ष्य रखो क्योंकि कर्म ऑटोमेटिक (स्वत:) सबका अटेन्शन खिंचवाते हैं। प्रैक्टिकल कर्म एक बोर्ड का काम करता है। कर्म देखते ही सबका अटेन्शन जाता है कि ऐसे कर्म सिखलाने वाला कौन। तो अभी नवीनता क्या करेंगे? लाइट हाउस बनेंगे? एक स्थान पर रहते भी चारों ओर लाइट फैलायें जो कोई भी उल्हना न दे कि इतना नजदीक लाइट हाउस थे और फिर भी हमको लाइट नहीं मिली। अच्छा
जर्मनी :- (13-2-78) बापदादा को क्वालिटी पसन्द आती है। क्वालिटी अच्छी है तो क्वान्टिटी बन ही जायेगी। मेहनत करते चलो सफलता जन्मसिद्ध अधिकार है। जर्मन की धरनी द्वारा भी कोई विशेष कर्म ज़रूर होना है। जर्मन की धरती में ऐसे विशेष व्यक्ति हैं जो एक भी बहुत नाम बाला कर सकता है, छिपे हुए रतन हैं जर्मनी में। चारों ओर आवाज फैलाओ तो निकल आयेंगे। अभी भी अच्छी मेहनत की है और भी चारों ओर फैलाओ। यही लक्ष्य रखो अगले वर्ष ग्रुप बनाकर लाना है वारिस क्वालिटी। लक्ष्य से सफलता हो ही जायेगी। अच्छा। और सब संकल्प छोड़ एक संकल्प में रहो, मैं कल्प-कल्प की विजयी हूँ, विजय हमारा जन्मसिद्ध अधिकार है, तो सफलता ही सफलता है। संकल्प किया और सफलता मिली। इसलिए ज्यादा नहीं सोचो। प्लान बनाओ लेकिन कमल फूल समान हल्का रहो। सोचा, किया और समाप्त। जितना एक संकल्प में रहेंगे उतनी टचिंग अच्छी होती रहेगी। ज्यादा संकल्प में रहने से जो ओरीज्नल बाप की मदद है वह मिक्सअप हो जाती है। इसलिए एक ही संकल्प कि मैं बाबा की, बाबा मेरा। मैं निमित्त हूँ, इस संकल्प से सफलता अवश्य प्राप्त होगी। चक्रवर्ती बनो तो बहुत अच्छा गुलदस्ता तैयार हो जायेगा। क्वान्टिटी भल न हो लेकिन जर्मन की धरनी से ऐस भी निकल आया तो नाम बाला हो जायेगा। अच्छा।